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Hindi News Explainers Explainer: दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा हैं जैविक हथियार? जयशंकर ने भी जताई है चिंता

Explainer: दुनिया के लिए कितना बड़ा खतरा हैं जैविक हथियार? जयशंकर ने भी जताई है चिंता

जैविक हथियार बेहद घातक हैं। ये ना केवल सैन्य, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण के स्तर पर विनाश ला सकते हैं। दुनिया को मिलकर प्रयास करने होंगे ताकि भविष्य में जैविक हथियार कभी भी मानवता को संकट में ना डाल सकें। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया को इसी के बारे में आगाह किया है।

Biological Weapons (Representational Image)- India TV Hindi Image Source : FREEPIK/AP Biological Weapons (Representational Image)

Biological Weapons: दुनिया ने जंग के कई रूप देखे हैं। परंपरागत हथियार, रासायनिक गैसें, परमाणु बम और साइबर अटैक। इन्हीं भयावह हथियारों की श्रेणी में एक और नाम जुड़ता है, जैविक हथियार। तकनीक के विकास ने मानव सभ्यता को उन्नत बनाया है तो वहीं यह संभावित खतरा भी पैदा किया है कि सूक्ष्मजीवों का उपयोग युद्ध के रूप में किया जाए। जैविक हथियारों का प्रयोग मानव जाति के लिए इतना विनाशकारी हो सकता है कि इससे लाखों लोग प्रभावित हो सकते हैं। खास बात यह है कि ना कोई धमाका होगा और ना ही किसी तरह की तबाही। इसी खतरे की ओर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुनिया को चेताया है। चलिए सबसे पहले जानते हैं कि जयशंकर ने क्या कहा है और फिर हम आपको इस लेख में यह भी बताएंगे कि जैविक हथियार क्या होते हैं और मानवता के लिए कितना बड़ा खतरा हैं।

'चिंता का विषय है जैविक आतंकवाद'

दरअसल, भारत ने अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा माहौल को देखते हुए जैविक हथियारों के संभावित दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए एक वैश्विक तंत्र की जरूरत बताई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि सरकार से इतर तत्वों द्वारा जैविक हथियारों का दुरुपयोग किया जाना अब दूर की बात नहीं है और ऐसी चुनौती से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है। उन्होंने जैविक हथियार संधि (BWC) की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘जैविक आतंकवाद एक गंभीर चिंता का विषय है, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पूरी तरह से तैयार रहना होगा। हालांकि, BWC में अब भी बुनियादी संस्थागत ढांचे की कमी है।’’ 

खामियों को दूर करना है जरूरी

जयशंकर ने कहा कहा, ‘‘इसमें कोई अनुपालन प्रणाली नहीं है, कोई स्थायी तकनीकी संस्था नहीं है और नए वैज्ञानिक घटनाक्रमों पर नजर रखने के लिए कोई तंत्र नहीं है। भरोसा मजबूत करने के लिए इन खामियों को दूर करना आवश्यक है।’’ मंत्री ने कहा कि भारत ने लगातार  BWC के अंदर मजबूत अनुपालन उपायों की मांग की है, जिसमें आज की दुनिया के अनुरूप सत्यापन भी शामिल है। उन्होंने कहा, ‘‘भारत शांतिपूर्ण इस्तेमाल के उद्देश्य से सामग्री और उपकरणों के आदान-प्रदान को संभव बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं मदद का मदद का समर्थन करता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमने वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की व्यवस्थित समीक्षा की मांग की है ताकि शासन वास्तव में इनोवेशन के साथ तालमेल बिठा सके।’’ 

क्या हैं जैविक हथियार?

भारत के विदेश मंत्री ने जैविक हथियारों के संभावित दुरुपयोग की बात कही है लेकिन आखिर ये कौन से हथियार हैं और कितना बड़ा खतरा हैं चलिए अब यह भी समझते हैं। दरअसल, जैविक हथियार वो हथियार हैं जिनमें बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या जैविक टॉक्सिन (जहर) का इस्तेमाल इंसानों, जानवरों, पौधों या पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है। इनमें एंथ्रेक्स, चेचक वायरस, प्लेग, बोटुलिनम टॉक्सिन, वायरल हेमरेजिक फीवर वायरस शामिल हो सकते है या फिर इनका कोई हाईब्रिड रूप। इनसे होने वाली बीमारियां घातक हो सकती हैं जो तेजी से फैलती हैं और इन्हें नियंत्रित करना बेहद कठिन हो सकता है। यही कारण है कि जैविक हथियारों को “साइलेंट किलर” कहा जाता है। हमले का पता भी तब चलता है जब संक्रमण कई गुना बढ़ चुका होता है।

जानें जैविक हथियारों का इतिहास

जैविक हथियारों का इतिहास हजारों साल पुराना है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि पुराने समय में संक्रमित जानवरों या शवों का उपयोग दुश्मन के इलाकों में संक्रमण फैलाने के लिए किया जाता था। 1346 में काफा की लड़ाई के दौरान प्लेग से मरे शवों को किले में फेंककर महामारी फैलाई गई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की कुख्यात Unit 731 ने हजारों लोगों पर जैविक हथियारों के प्रयोग किए थे। शीत युद्ध काल में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने व्यापक जैविक अनुसंधान कार्यक्रम चलाए। 1972 में Biological Weapons Convention (BWC) बना, जिसने जैविक हथियारों के विकास, भंडारण और प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया। लेकिन, इसका पालन कितनी सख्ती से होता है, यह अब भी बहस का विषय है।

जैविक हथियार और दुनिया के देश

यहां यह बताना जरूरी है कि आज कोई भी देश आधिकारिक रूप से जैविक हथियार रखने की बात स्वीकार नहीं करता, क्योंकि BWC उस पर रोक लगाता है। लेकिन इतिहास, रिपोर्टों और खुफिया आकलनों से जो जानकारी सामने आती है वो कुछ इस प्रकार है। इनमें सबसे पहला नाम सोवियत संघ/रूस का आता है जहां शीत युद्ध के दौरान दुनिया का सबसे बड़ा जैविक हथियार कार्यक्रम “Biopreparat” चला था।1979 का स्वेर्द्लोवस्क एंथ्रेक्स हादसा इसी कार्यक्रम से जुड़ा माना जाता है।

अमेरिका और जापान

सोवियत संघ/रूस के बाद नाम आता है अमेरिका का द्वितीय विश्वयुद्ध और उसके बाद  अमेरिका ने जैविक हथियार कार्यक्रमों पर जोर दिया। 1969–70 में राष्ट्रपति निक्सन ने आधिकारिक रूप से इसे बंद कर दिया। अमेरिका अब केवल “रक्षा अनुसंधान” (Defensive Research) करता है, जो BWC के तहत अनुमति प्राप्त है। अमेरिका के बाद जापान का नाम आता है जिसकी Unit 731 ने  द्वितीय विश्वयुद्ध में प्लेग, एंथ्रेक्स, हैजा आदि को युद्ध में इस्तेमाल किया था।

उत्तर कोरिया, चीन और सीरिया

उत्तर कोरिया को लेकर कुछ अंतरराष्ट्रीय आकलनों में सक्रिय जैविक तैयारी रखने के आरोप लगे हैं लेकिन इसे लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके अलावा सीरिया पर भी रासायनिक हथियारों के साथ जैविक क्षमता विकसित करने का संदेह है। चीन BWC का सदस्य है। पश्चिमी खुफिया एजेंसियों की ओर से 'डुअल-यूज' अनुसंधान पर सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं। अधिकांश आरोप सुरक्षा एजेंसियों या ऐतिहासिक आकलनों पर आधारित हैं, और कई दावे राजनीतिक भी हो सकते हैं। इसलिए जैविक हथियारों की वास्तविक स्थिति को पूर्ण रूप से सत्यापित करना कठिन है।

कितना बड़ा खतरा हैं जैविक हथियार?

जैविक हथियारों का सबसे बड़ा खतरा यह है कि हमले का पता बहुत देर से चलता है। संक्रमित व्यक्ति कई और लोगों को संक्रमित कर सकता है, जिससे कुछ ही दिनों में महामारी फैल सकती है। एक छोटे लैब सेटअप में भी खतरनाक वायरस तैयार करना संभव है। संक्रमण एक बार हवा या पानी में फैल जाए, तो वो मित्र-दुश्मन का भेद नहीं करते। यह पूरे क्षेत्र, यहां तक कि वैश्विक महामारी में बदल सकता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं यह आतंकियों के हाथ ना पड़ जाएं। 2001 में अमेरिका में हुआ एंथ्रेक्स हमला इसका उदाहरण है।

क्या दुनिया सुरक्षित है?

आज 180 से अधिक देश Biological Weapons Convention के सदस्य हैं, लेकिन BWC की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें सख्त निरीक्षण प्रणाली नहीं है। उल्लंघन साबित करना मुश्किल होता है और कई जैविक लैब 'डुअल-यूज' होती हैं। 'डुअल-यूज' का मतलब चिकित्सा अनुसंधान और युद्ध दोनों में काम आने वाली लैब। साफ है कि ऐसे में इन घातक हथियारों से दुनिया को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं कहा जा सकता है।

संभव है जैविक हथियारों से बचाव?

जैविक हथियारों से बचाव का पहला कदम वैश्विक निगरानी प्रणाली मजबूत करना है। देशों के स्वास्थ्य तंत्र को ज्यादा सशक्त बनाना होगा ताकि किसी भी संदिग्ध प्रकोप का तुरंत पता चल सके। दुनिया की प्रमुख लैबों में पारदर्शी अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण जरूरी है। सिंथेटिक बायोलॉजी प्रयोगों के लिए सख्त नियम जरूरी हैं ताकि दुरुपयोग ना हो सके। हाल में कोरोना महामारी ने साबित किया कि वायरस सीमा नहीं मानते इसलिए देशों को मिलकर काम करना होगा।

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