Left Politics In India: भारत की सियासत में आज वह वक्त आ गया है जब नक्शे से वाम दलों के लाल रंग की छाप फीकी पड़ने लगी है। एक जमाना था कि कुछ राज्यों में CPI(M) के बिना सरकार की कल्पना नहीं की जा सकती थी लेकिन आज वहां लेफ्ट पार्टी अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है। पश्चिम बंगाल, जहां वाम दल ने 34 साल तक बिना रुके सरकार चलाई। और त्रिपुरा, जहां 25 साल तक लेफ्ट शासन में था, आज इन दोनों ही मजबूत गढ़ों में लेफ्ट पॉलिटिक्स लगभग खत्म होने की तरफ बढ़ चुकी है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की हार सिर्फ चुनावी पराजय की गाथा नहीं, यह वाम दलों के धीरे-धीरे सियासत से गायब होने की कहानी है, जो कभी मजदूर-किसान आंदोलन और वाम विचारधारा के प्रतीक माने जाते थे। एक वक्त था जब पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु, स्थिरता का दूसरा नाम थे, और त्रिपुरा में माणिक सरकार वामपंथ के भरोसे की मिसाल मानी जाती थी लेकिन अब वही पार्टी इन 2 राज्यों में खत्म होने की कगार पर पहुंच गई है। और उसका आखिरी किला केरल भी 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले काफी प्रेशर में है। क्या यह सिर्फ सियासी बदलाव है? या फिर यह इशारा है कि देश में वामपंथ की धुरी ही हिल गई है? आंकड़े बताते हैं कि ये गिरावट एकदम से नहीं आई है, ये धीरे-धीरे कम होते जनाधार, खराब रणनीतियों, और बदलते सामाजिक समीकरणों का परिणाम है।
पश्चिम बंगाल में वाम दलों ने कैसे खोया आधार?
पश्चिम बंगाल में CPI(M) सन् 1977 से 2011 तक सरकार में रहा लेकिन अब वहां उसकी स्थिति बेहद नाजुक है। 2016 विधानसभा चुनाव में तो उसने कांग्रेस के साथ तक गठबंधन किया लेकिन इसके बावजूद, पार्टी को सिर्फ 26 सीटें मिलीं जो 2011 वाले चुनाव में मिली 40 सीटों से भी कम थीं। इस दौरान, CPI(M) के कई पुराने लीडर्स को हार का सामना करना पड़ा, इसकी वजह से पार्टी संगठन के राजनीतिक विस्तार और उसकी संगठनात्मक मजबूती पर प्रश्न खड़े हो गए। फिर आया 2021 का चुनाव और बंगाल के इस इलेक्शन में वाम दल 0 सीट तक पहुंच गया। उनका वोटिंग प्रतिशत भी बुरी तरह गिर गया। गौरतलब है कि यह गिरावट सिर्फ चुनाव के नतीजों तक सीमित नहीं है। खेतिहर मजदूरों, किसानों और ग्रामीणों के समर्थन में भी पहले से कमी आई है। भूमि सुधार जैसे कदमों ने पहले लेफ्ट पार्टियों को मजबूती दी थी। लेकिन बाद में 2007 की नंदीग्राम हिंसा और फिर सिंगूर आंदोलन जैसे मुद्दों ने किसानों और ग्रामीणों के बीच वाम दलों के प्रति विश्वास को डगमगा दिया।
पश्चिम बंगाल में ऐसे गिरे CPI(M) के आंकड़े
| विधानसभा चुनाव | वोट प्रतिशत | सीटें |
| 2011 | 30.1% | 40 |
| 2016 | 20.1% | 26 |
| 2021 | 4.8% | 0 |
त्रिपुरा में ढहा वामपंथ का 25 साल पुराना किला
वहीं, त्रिपुरा की बात करें तो यहां लेफ्ट पार्टी की मजबूती कम हो चुकी है। साल 2018 में यहां 25 साल की पुरानी सरकार उखड़ गई। बीजेपी के जमीन पर संघर्ष और सामाजिक आधार बदलने से वाम दल अपने उस पूल को खो बैठे, जिससे वह दशकों तक मजबूती से सरकार में थे। 2018 के विधानसभा चुनाव में, यहां लेफ्ट फ्रंट को 43.2 फीसदी वोट मिले थे जो कि पहले के मुकाबले में कम था। उस चुनाव में वाम दल सिर्फ 16 सीटें ही जीत पाए और सत्ता से बाहर हो गए। 1993 से लेकर 2018 तक करीब 25 साल तक लेफ्ट की सरकार रही, लेकिन 2018 में हार के बाद वह लंबा दौर खत्म हो गया। अगले यानी 2023 के चुनाव में भी वामदल वापसी नहीं कर पाए और तीसरे नंबर की पार्टी बन गए। इस बार वह सिर्फ 11 सीटें ही जीत पाए। इस तरह, वे राज्य जो वाम दलों के मजबूत और पुराने गढ़ रहे हैं वहां बड़े पैमाने पर जनाधार खो गया है।
त्रिपुरा में ऐसे गिरे वाम दल के आंकड़े
| विधानसभा चुनाव | वोट प्रतिशत | सीटें |
| 2018 | 43.2% | 16 |
| 2023 | 24.62 | 11 |
क्यों गिर रहा है वामपंथ का ग्राफ?
वाम दल अब जब ये दो पुराने गढ़ खो चुके हैं तो उनके पास सिर्फ केरल बचा है। लेकिन यहां भी चुनाव से पहले उनपर दबाव बढ़ रहा है। विधानसभा चुनाव 2026 नजदीक आ गया है, और उसके सामने बीजेपी-आरएसएस की पैठ, वाम दल के आंतरिक मतभेद और Anti-incumbency जैसे बड़े मुद्दे हैं। 10 साल सरकार में रहने के बाद वाम दलों को सत्ता विरोधी भावना का सामना करना पड़ सकता है। वाम दलों की रणनीतिक और संगठनात्मक कमजोरी इसकी वजह हो सकती है। वाम दल तेजी से बदलती इस दुनिया में खुद को नए सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में ढालने में नाकामयाब रहे हैं। खासकर त्रिपुरा में, जहां BJP ने तेजी से पैठ बना ली। गठबंधनों और वोट बैंक पॉलिटिक्स में कमी भी इसका एक कारण हैं। वाम दल अपने पुराने वोट बैंक यानी किसान, मजदूर, ग्रामीणों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दे पा रहे हैं। ये वोटबैंक दूसरे विकल्पों की ओर जा रहे हैं। तेजी से बदलते आर्थिक-सामाजिक असंतुलन ने लेफ्ट पार्टियों की विश्वसनीयता घटा दी है।
देश में वाम दल की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में हार ने उसकी जड़ें हिला दीं। अब सबकी निगाहें केरल के आगामी विधानसभा चुनाव पर हैं कि क्या वहां से वामपंथ अपनी नई दिशा खोजने में कामयाब होगा, या उसका आखिरी किला भी ढह जाएगा।
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