Saturday, January 31, 2026
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Lalita Jayanti Vrat Katha: 1 फरवरी को मनाई जाएगी ललिता जयंती, पूजा के समय जरूर करें इस कथा का पाठ, खुलेंगे सुख-समृद्धि और मोक्ष के मार्ग

Lalita Jayanti Vrat Katha: माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर ललिता जयंती मनाई जाती है। इस दिन दस महाविद्याओं में से एक मां ललिता की पूजा-अर्चना की जाती है, जो तीसरी महाविद्या हैं। मान्यता है कि इसी तिथि पर देवी मां अवतरित हुई थीं। यहां पढ़िए ललिता जयंती की कथाएं।

Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse
Published : Jan 31, 2026 08:02 pm IST, Updated : Jan 31, 2026 08:02 pm IST
Lalita Jayanti Vrat Katha ललिता जयंती व्रत कथा- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV ललिता जयंती के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा

Lalita Jayanti Vrat Katha in Hindi: सनातन धर्म में देवी-देवताओं के प्राकट्य दिवस बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं। देवी-देवताओं को जन्म जयंतियां सिर्फ धार्मिक महत्व रखती हैं, बल्कि वे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम भी बनती हैं। ललिता जयंती इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण जयंती है। यह दिन 10 महाविद्याओं में से एक मां ललिता देवी को समर्पित है। माता को त्रिपुरा सुंदरी, षोडशी, राजराजेश्वरी और कामेश्वरी जैसे नामों से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और देवी की पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि, वैभव और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पूजा के समय मां ललिता की कथा का पाठ जरूर करें। 

ललिता जयंती का महत्व

माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को ललिता जयंती मनाई जाती है। इसे षोडशी जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस साल यह जयंती 1 फरवरी, रविवार के दिन मनाई जाएगी। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित इस जयंती को सौभाग्य और सिद्धियों की प्राप्ति का द्वार माना जाता हैं। 

ललिता जयंती की कथा 

पौराणिक ग्रंथों में ललिता जंयती की कुछ कथाएं का वर्णन मिलता है। इनमें से पहली कथा हैं भोलेनाथ और माता सती की। यह कथा हर सनातनी ने सुनी और पढ़ी होगी। चलिए जानते हैं देवी ललिता की कथा। कथा के अनुसार, एक बार नैमिषारण्य में यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें महादेव के ससुर दक्ष प्रजापति भी शामिल हुए। दक्ष प्रजापति के पहुंचने पर उन्हें देखकर सभी देवगण उनके सम्मान में खड़े हो गए, लेकिन भोलेनाथ अपने आसन पर विराजमान रहे। दक्ष ये यह सहा नहीं गया, वह पहले ही अपने जमाई को कुछ खास पसंद नहीं करते थे और यह घटना उन्हें दामाद द्वारा अपना अपमान लगी। इसके बाद प्रजापति दक्ष के घर एक शुभ मौका आया, उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया। सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन अपमान की अग्नि में जल रहे दक्ष ने अपनी बेटी और दामाद को न्योता नहीं भेजा।

इसके बावजूद माता पार्वती शिव जी से उस यज्ञ में जाने की बात करने लगीं। शिव जी ने मना करते हुए कहा कि जहां का बुलावा नहीं मिला है, वहां जाना उचित नहीं होगा। लेकिन वह पति की बात न मानते हुए बिना बुलाए ही पिता दक्ष के घर पहुंच गईं। जहां प्रजापति दक्ष ने शिव जी का बहुत अपमान किया, जिसे माता सती सह न सकीं और उन्होंने उसी पवित्र अग्नि कुंड में कूदकर प्राण त्याग दिए।

इस घटना के बारे में जब महादेव को चला, तो वह खुद को संभाल नहीं पाए। यज्ञ स्थल पर पहुंचकर उन्होंने हवन कुंड में से माता के शव को गोद में उठा लिया। बेबस और क्रोध की अग्नि में जल रहे शिव जी पूरे ब्रह्माण्ड में माता की देह को लिए भटकने लगे। पूरे विश्व में हाहाकार-सा मच गया। तब भगवान विष्णु ने शिव जी को शांत करने के भाव से अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े कर दिए।

माता के अंग धरती पर जहां-जहां गिरे वह उन्हीं आकृतियों में उस स्थान पर विराजमान हो गईं, जिन्हें आज हम 51 शक्तिपीठों के नाम से जानते हैं। कहते हैं कि नैमिषारण्य में माता का हृदय गिरा था। गौरतलब है कि शिव जी को हृदय में धारण करने पर माता सती नैमिष में लिंगधारिणीनाम से प्रसिद्ध हैं। इन्हें ही ललिता देवी के नाम से पुकारा जाता है। यह एक लिंगधारिणी शक्तिपीठ माना जाता है। जहां महादेव को लिंग स्वरूप में पूजा जाता है। 

माता ललिता की दूसरी पौराणिक कथा

ग्रंथ ब्रह्मांड पुराण में ललितोपाख्यान का विस्तृत वर्णन है। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, हमेशा की तरह शिव जी कैलाश पर ध्यानमग्न थे। तब एक बार कामदेव ने उन्हें मोहित करने का प्रयास किया, क्योंकि देवताओं को शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का इंतजार था, जो तारकासुर का वध कर सके। लेकिन शिव का ध्यान भंग करने से क्रोधित शिव ने जब नेत्र खोले तो कामदेव नहीं बच पाए। शिव की तीसरी आंख की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया। कामदेव की राख चारों ओर बिखर गई। उसी राख से एक शक्तिशाली दैत्य भंडासुर का जन्म हुआ। जिसने तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर अमरत्व और देवताओं को हराने की शक्ति का वरदान प्राप्त किया।

भंडासुर ने अपनी सेना के साथ स्वर्ग पर आक्रमण किया। उसने इंद्र, वरुण, अग्नि और अन्य देवताओं को पराजित कर दिया। देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु के पास गए, लेकिन विष्णु ने भी असमर्थता जताई। अंत में सभी देवता शिव जी के पास पहुंचे। उन्होंने एक यज्ञ करने की सलाह दी, जिसमें सभी देवताओं की शक्ति का समावेश हो। देवताओं ने यज्ञ प्रारंभ किया। इसमें से एक दिव्य ज्योति मां ललिता के रूप में अवतरित हुईं। लाल वस्त्र धारण किए, हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण लिए हुए माता का स्वरूप अत्यंत सुंदर था। साथ ही चारों ओर मनोमनी, बालाम्बिका, अपर्णा जैसी शक्तियां प्रकट हुईं। 

मां ललिता ने एक विशाल सेना का निर्माण किया, जिसमें देवियां, गण और योद्धा शामिल थे। भंडासुर की सेना में उसके पुत्र विशुक और विशंग जैसे शक्तिशाली दैत्य थे। युद्ध आरंभ हुआ। पहले दिन मां ललिता की सेना ने भंडासुर के सैनिकों को हराया। दूसरे दिन माता की शक्ति बालाम्बिका ने विशुक को पराजित किया। तीसरे दिन विशंग को अपर्णा ने मारा।

अंत में माता ललिता ने भंडासुर का वध किया। भंडासुर के मरते ही देवताओं में हर्ष की लहर दौड़ी। मां ललिता ने देवताओं को आशीर्वाद देते हुए कहा कि मेरी आराधना करने वालों को सुख-समृद्धि और मोक्ष मिलेगा। कहा जाता है कि भंडासुर वध के माता ने त्रिपुर नगर बसाया, जहां वे राजराजेश्वरी के रूप में विराजमान हैं।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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