'डिजिटल डिटॉक्स' क्या है और क्या इससे सेहत बेहतर हो सकती है?
आजकल की तेज़ी से बदलती दुनिया में, सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव मानसिक और शारीरिक दोनों को बुरी तरह प्रभावित करता है। ऐसे में 'डिजिटल डिटॉक्स' इससे निपटने में कैसे कारगर है चलिए जानते हैं?

आजकल का दौर तेजी से बदल रहा है और इस बदलते दौर में सोशल मीडिया एक ऐसा डिजिटल माध्यम बन कर सामने आया है जो न सिर्फ लोगों को आपस में जोड़ता है बल्कि इसकी वजह से खान पान से लेकर रहन सहन तक, रोजमर्रा की कई चीजें बेहद आसान हो गई हैं। डिजिटल मीडिया का प्रभाव अब हम पर इतना हावी है कि हम हर छोटे बड़े हर काम के लिए टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहने लगे हैं। लगातार ऑन लाइन रहने से लोगों को अक्सर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है, दूसरों की लाइफ स्टाइल स्टाइल को देखकर लोग खुद को कमतर समझते हैं। इन चीजों के बारे में सोच सोचकर दिमाग के साथ हमारा शरीर भी थक जाता है। इसलिए सोशल मीडिया पर बढ़ते तनाव से ब्रेक लेने के लिए लोग "डिजिटल डिटॉक्स" का सहारा लेते हैं। यह एक ऐसी आदत है जिसमें लोग कुछ तय समय के लिए सोशल मीडिया से दूर रहते हैं। यह आइडिया ऑनलाइन काफी पॉपुलर हो रहा है। लेकिन क्या डिजिटल डिटॉक्स सच में काम करते हैं, या फिर ये बस एक और ट्रेंड हैं? चलिए जानते हैं।
ऑनलाइन ज्यादा रहने पर कौन सी दिक्कतें होती हैं?
सोशल मीडिया का ज़्यादा इस्तेमाल करने से अक्सर लोग अपनी तुलना दूसरों से करते हैं जिस वजह से लोगों में से तनाव, चिंता और अवसाद की समस्या बढ़ती है। देर रात तक स्क्रीन को स्क्रॉल करने से जल्दी नींद नहीं आती है और इस वजह से तनाव बढ़ता है और नींद की परेशानी बढ़ जाती है। स्क्रीन को लगातार देखने से आँखों की कई परेशानी जैसे- सूखापन, जलन और धुंधलापन बढ़ सकती है। बहुत ज़्यादा डेटा या जानकारी मिलने से लोग शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान या थका हुआ महसूस करते हैं। अधिक समय बैठकर ऑनलाइन रहने से मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। वर्चुअल दुनिया में रहने के कारण वास्तविक रिश्तों से दूरी बन जाती है।
क्या है डिजिटल डिटॉक्स?
डिजिटल डिटॉक्स शब्द 'डिटॉक्सिफिकेशन' से आया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति जान बूझकर कंप्यूटर, मोबाइल फोन जैसे उपकरण और सोशल मीडिया से ब्रेक लेता है। यह वैसी ही चीज है जैसे किसी व्यक्ति को शराब या ड्रग्स जैसी नशे वाली चीज़ों से दूर किया जाता है। तो डिजिटल डिटॉक्स का मतलब है टेक्नोलॉजी से कुछ समय के लिए दूर होना और असल दुनिया में लोगों से रिश्ते बनाना।
क्या डिजिटल डिटॉक्स वाकई काम करता है?
रिसर्च यह कहती है कि डिजिटल डिटॉक्स से कई फायदे हो सकते हैं। 2025 के एक मेटा-एनालिसिस में जाँच की गई। इसमें पाया गया कि सोशल मीडिया से कुछ समय के लिए ब्रेक लेने से लोगों की ज़िन्दगी पर पॉज़िटिव असर पड़ा है। हिस्सा लेने वालों ने यह भी बताया कि उन्हें कम बेचैनी, डिप्रेशन और अकेलापन महसूस हुआ।
2025 के एक और अध्ययन में, रिसर्च करने वालों ने हिस्सा लेने वालों के स्मार्टफ़ोन को इस तरह ब्लॉक कर दिया कि वे दो हफ़्ते तक सिर्फ़ कॉल और मैसेज ही रिसीव कर सकें। रिसर्च करने वालों ने पाया कि इसका हिस्सा लेने वालों की मानसिक सेहत पर एंटीडिप्रेसेंट दवाओं से भी ज़्यादा पॉज़िटिव असर पड़ा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हिस्सा लेने वालों ने अपने फ़ोन पर कम समय बिताया, बल्कि उस समय का इस्तेमाल उन्होंने फ़ायदेमंद कामों में किया, जैसे लोगों से आमने-सामने मिलना-जुलना, वर्कआउट करना और प्रकृति के बीच समय बिताना।
क्या है डिजिटल डिटॉक्स करने का सही तरीका?
डिजिटल डिटॉक्स करने से मानसिक सेहत बेहतर हो सकती है लेकिन आप इसे किस तरह से करते हैं, यह बहुत मायने रखता है। आपको टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं करना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि आप इस बदलाव को लंबे समय तक बनाए नहीं रख पाएँगे। 2023 के एक अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने अपने स्मार्टफ़ोन के रोज़ाना के इस्तेमाल को एक घंटे कम कर दिया, उन्हें उन लोगों के मुकाबले मानसिक सेहत के ज़्यादा फ़ायदे मिले, जिन्होंने स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया था।
डिजिटल डिटॉक्स को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए आज़माये ये उपाय
-
अपनी किसी भी ऐसी आदत को पहचानें जो आपके लिए फ़ायदेमंद नहीं है, जैसे कि बार-बार अपना फ़ोन देखना या उसे हर जगह अपने साथ ले जाना। उन आदतों को बदलने के लिए एक योजना बनाएँ।
-
कुछ खास लक्ष्य तय करें, जैसे कि एक हफ़्ते के लिए इंस्टाग्राम से ब्रेक लेना। अपने लक्ष्य अपने परिवार और दोस्तों के साथ शेयर करें, ताकि वे आपका साथ दे सकें
-
सोशल मीडिया पर से ब्रेक लेने के बाद कैसा महसूस हो रहा है इसपर नज़र रखें। जैसे- आपको अब पहले से कम घबराहट महसूस हो रही है या क्या आपको पहले से बेहतर नींद आ रही है।
-
डिजिटल डिटॉक्स का मकसद आपकी ज़िंदगी से टेक्नोलॉजी को पूरी तरह से हटाना नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल ज़्यादा सोच-समझकर करना है।