स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता के स्तर के अनुकूल हो फीस का दायरा
देश में दिनोंदिन महंगी होती स्कूली शिक्षा, दाखिला प्रक्रिया पर हर साल होने वाले विवाद पर जाने माने शिक्षाविद् अशोक के पांडेय का कहना है कि स्कूलों की फीस वहां प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता के अनुरूप तय होनी चाहिए।

नयी दिल्ली: देश में दिनोंदिन महंगी होती स्कूली शिक्षा, दाखिला प्रक्रिया पर हर साल होने वाले विवाद और शिक्षा की गुणवत्ता के गिरते मापदंडों के बीच जाने माने शिक्षाविद् अशोक के पांडेय का कहना है कि स्कूलों की फीस वहां प्रदान की जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता के अनुरूप तय होनी चाहिए। पांडेय अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब ए पैडगोजिकल लाइफ में शिक्षा से जुड़े कुछ ऐसे ही तमाम पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं । वह कहते हैं कि स्कूली शिक्षा की जब भी बात आती है तो भारत में अभिभावकों के बीच एक प्रकार की निराशा दिखाई देती है । कुछ समय पहले कई निजी स्कूलों द्वारा फीस में बढ़ोतरी के लिए अदालत का रूख अपनाए जाने और शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक स्तर में गिरावट काफी बहस का मुद्दा रही थी। इस परिदृश्य में यह अपने आप में रोचक है कि शिक्षण व्यवस्था से जुड़े सभी पक्ष यानी शिक्षक, माता पिता और छात्र मौजूदा व्यवस्था के प्रति तटस्थ नजर आते हैं।(भारत का एक गांव जहां 5 दिनों तक निर्वस्त्र रहती हैं शादीशुदा महिलाएं!)
नेशनल प्रोग्रेसिव स्कूल्स कांफ्रेंस के अध्यक्ष अशोक पांडेय अपनी इस किताब के माध्यम से एक सुझाव पेश करने का प्रयास करते दिखते हैं कि एक बच्चे की पहुंच बेहतर शिक्षा तक सुनिश्चित करने के लिए समाज और नीति निर्माताओं को क्या कदम उठाने होंगे । किताब को विभिन्न हिस्सों में बांटा गया है और शिक्षण जगत में तीन दशकों से अधिक का अनुभव रखने वाले अशोक पांडेय कहते हैं कि बेहतर शिक्षा उपलब्ध करवाने के लिए सबसे पहला मापदंड शिक्षकों को तैयार करना है । इसके लिए उन्हें न केवल उच्च स्तरीय शिक्षण कौशल विधियों से खुद को लैस करना पड़ेगा बल्कि छात्रों और पर्यावरण के प्रति भी बेहद संवेदनशील रूख अपनाना होगा।
इसी संदर्भ में अशोक पांडेय कहते हैं, हमारे देश में शिक्षकों को प्रशिक्षित करना एक बड़ी चुनौती है । टीचर ट्रेनिंग कार्यक्रमों की बदहाली को देखते हुए शिक्षक बनना हमारी युवा पीढ़ी में से किसी की पहली पसंद नहीं होता । इसीलिए शिक्षण कार्य के दौरान इन हाउस ट्रेनिंग का महत्व बहुत बढ़ जाता है । इसके लिए निजी क्षेत्र और सरकार को शिक्षकों की शिक्षा और उनके पेशेवराना विकास के लिए निवेश करने की जरूरत है । हर साल बहस का मुद्दा बनने वाले फीस वृद्धि के विषय में पांडेय किताब में कहते हैं कि कुछ स्कूल फीस वृद्धि का कोई तार्किक आधार प्रदान करने में विफल रहते हैं । अभिभावकों और शिक्षण संस्थान के बीच नियमित संवाद की जरूरत पर बल देते हुए वह कहते हैं कि दोनों को एक दूसरे की स्थिति को समझना जरूरी है ।
जाने माने शिक्षाविद होने के साथ ही पूर्वी दिल्ली के प्रतिष्ठित एहल्कान इंटरनेशनल स्कूल में प्रिंसिपल अशोक पांडेय कहते हैं, फीस स्कूल द्वारा उपलब्ध करायी जा रही सेवाओं के अनुपात से अधिक नहीं होनी चाहिए। यह जरूरी है कि निजी स्कूल स्वायत्तता के साथ काम करें लेकिन साथ ही उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही भी होनी चाहिए। रियायती दरों पर जमीन हासिल करने के बावजूद समाज के गरीब तबके के बच्चों को शिक्षा मुहैया कराने में विफल रहने वाले स्कूलों के संबंध में वह कहते हैं, रियायती भूखंड की बात को छोड़ भी दें तो किसी भी सूरत में निजी स्कूल आर्थिक रूप से कमजोर तबके के बच्चों को 25 फीसदी सीटें उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । शिक्षा के अधिकार कानून को अक्षरश: लागू करवाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है ।
अध्यापकों द्वारा छात्र छात्राओं को दी जाने वाली कड़ी सजा और उसके गंभीर परिणामों के लिए अशोक पांडेय शिक्षकों की प्रशिक्षण व्यवस्था को जिम्मेदार मानते हैं जहां टीचर ट्रेनिंग प्रोग्राम टीचरों को संवेदनशील बनाने और उनमें एक दूरदृष्टि पैदा करने में विफल रहता है । अशोक पांडेय कोरपोरल मिथ चैप्टर में लिखते हैं, टीचर यह समझने में विफल रहते हैं कि प्राथमिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग होने के नाते भविष्य के बेहतर नागरिक तैयार करने की शक्ति केवल उनके हाथों में है । उन्हें इस शक्ति का अहसास नहीं होता और इसीलिए वे इसका इस्तेमाल करना भी नहीं जानते । वह कहते हैं कि टीचरों को अपने छात्रों में विचार, मूल्य और भावनात्मक उर्जा पैदा करने के लिए अपने समय का एक बड़ा हिस्सा और दृष्टिकोण का निवेश करने की जरूरत है ।
वह इस बात को स्वीकार करते हैं कि सरकारी स्कूल शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग हैं लेकिन उन्हें इन स्कूलों में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर बेहद अफसोस होता है । प्रतिस्पर्धा के युग में सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर में सुधार की जरूरत को रेखांकित करते हुए वह अपने समय को याद करते हुए कहते हैं, मेरी पीढ़ी के लोग सरकारी स्कूलों की देन हैं । मुझे आज तक कोई एक भी ऐसा निजी स्कूल नहीं मिला जो हमारे समय के सरकारी स्कूलों जैसी श्रेष्ठ गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करता हो । यह किताब उनके गहन शोध और अनुभव का नतीजा है जिसमें देश में छात्रों का सर्वांगीण विकास करने वाली शिक्षा मुहैया कराने के लिए ढांचागत सुधार, शिक्षा के क्षेत्र में बौद्धिक और नैतिक मूल्यों का निवेश और अनुकूल माहौल प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है ।
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