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रेलवे के पैंट्री ब्वॉय की अनोखी कहानी जो घूमंतू होने के बाद भी नहीं हैं घूमंतू....

विनोद कुमार और सत्यप्रकाश हर रोज भारत की प्रीमियम रेलवे सर्विस में सफर करते हैं। मीलों की दूरियां पाटते हैं लेकिन कहीं पहुंचते नहीं। जहां थे वहीं लौटकर वापस आ जाते हैं।

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नई दिल्ली: विनोद कुमार और सत्यप्रकाश हर रोज भारत की प्रीमियम रेलवे सर्विस में सफर करते हैं। मीलों की दूरियां पाटते हैं लेकिन कहीं पहुंचते नहीं। जहां थे वहीं लौटकर वापस आ जाते हैं। विनोद और सत्यप्रकाश शताब्दी और राजधानी एक्सप्रेस के पैंट्री ब्वॉय हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो हजारों पैसेंजर्स का सफर में ध्यान रखने वाले केयरटेकर। घूमंतू होने के बाद भी ये घूमंतू नहीं हैं..यायावरों जैसा नसीब ये लिखाकर नहीं लाएं हैं। घूमने की कला इन्हें आती नहीं लेकिन सफर का अध्यात्म क्या होता है, कोई इन पैंट्री ब्वॉय से सीखे। चाहे तो कोई घूमने का जुनूनी इनसे ज्ञान ले लें। सफर खत्म  होने के बाद ट्रेन की कनेक्टिंग कोच में इधर उधर पड़े बिखरे सामान को समेटते हुए विनोद कुमार ने कहा, समय सबसे बड़ा होता है लेकिन सफर समय को मात देने की दौड़ है, इस दौड़ को जीतकर ही समय काबू में किया जा सकता है...(क्या आप बिना टिकट ट्रेन में कर कहे हैं यात्रा?...कोई बात नहीं, नहीं होगा जुर्माना)

चाय के हर कप के साथ..सूप के हर कटोरे के साथ और राइस, रोटी की हर थाली के साथ यात्रियों की राह बेहद आसान हो जाती है लेकिन पेंट्री ब्वाय की राह इतनी आसान नहीं है। प्रीमियम ट्रेनों के यात्रियों तक पहुंचने वाले एक एक फूड आइटम की जिम्मेदारी इनकी है। विनोद कुमार नई दिल्ली से काठगोदाम तक जाने वाली शताब्दी ट्रेन में पेंट्री ब्वॉय है। इस ट्रेन के चलने का समय सुबह छह बजे है लेकिन सभी पेंट्री ब्वॉय को सुबह पांच बजे स्टेशन पर पहुंचना होता है और अपने अपने कोच के लिए पैक फूड आइटम रिसीव करना पड़ता है। चंद मिनट की देरी का मतलब है, ड्यूटी का न मिलना लिहाजा उस दिन की सैलरी कट जाना लाजमी है। पांच बजे ड्यूटी पर पहुंचने के लिए विनोद को तड़के चार बजे उठना होता है। चलती ट्रेन में वो यात्रियों के लिए खाना लगाते हैं और सर्व करते हैं। एक कोच में करीब आधा दर्जन पेंट्री ब्वॉय तैनात होते हैं। करीब पांच घंटे के एक तरफा सफर में वो यात्रियों की हर फरमाइश पूरी करते हैं। इस दौरान कोई उनसे खुश होता है और कोई उनपर विफर पड़ता है।

ट्रेन लगातार चलती रहती और इन्हें भी पूरे कोच में इधर से उधर भागदौड़ करनी होती है। विनोद कुमार को शुरूआत में चलती ट्रेन में चलने से चक्कर आता था लेकिन अब ट्रेन की झुक-झुक उनकी जिंदगी का तराना बन चुकी है। करीब चार घंटे के विराम के बाद ये ट्रेन फिर दिल्ली की तरफ रवाना होती है। इस ब्रेक में पेंट्री ब्वॉय का काम नहीं रूकता, उन्हें वापसी के सफर की तैयारी करनी होती है, हालांकि इस ब्रेक में से चुराया समय सोने का है। यात्रा के दौरान इनकी जिंदगी में खुशी, गम, संकोच, झिझक वाले पल भी आते है। विनोद और सत्यप्रकाश को कोच में उनके कई रिश्तेदार, दोस्त और जान पहचान वाले मिले हैं। किसी से मिलकर वो खुश हुए और किसी से उन्होंने मुश्किल से पीछा छुड़ाया है। अब सोचिए, किसी पेंट्री ब्वॉय को किसी कोच में अचानक बिछड़ा मीत मिल जाए तो वह जज्बात को काबू करता होगा या खाना सर्व करता होगा ??

एक रूट पर अक्सर यात्रा करने वाले कई पैसेंजर्स से इनकी जान पहचान हो जाती है। ऐसे यात्रियों के लिए टिकट की मारामारी के सीजन में पेंट्री ब्वॉय किसी फरिश्ते से कम नहीं होते। काठगोदाम से दिल्ली का सफर रात  करीब साढ़े नौ बजे खत्म होता है लेकिन इनकी ड्यूटी यहां खत्म नहीं होती। इन्हें सुबह रिसीव किए गए एक एक सामान को मालगोदाम में जमा कराना होता है। एक भी सामान गुम हुआ तो जिम्मेदारी इनकी ही मानी जाएगी। रेलवे स्टेशन से निकलते निकलते साढ़े दस या ग्यारह बज जाते हैं। विनोद कुमार पहाड़गंज में रहते हैं, वहां पहुंचते पहुंचते उन्हें रात के करीब साढे ग्यारह बज जाते हैं। दूसरे दिन सुबह उनका फिर वही रूटीन शुरू हो जाता है। करीब करीब सभी पेंट्री ब्वॉय का रूटीन ऐसा ही है।

विनोद कुमार की ड्यूटी करीब 16-17 घंटे की है लेकिन सत्यप्रकाश की ड्यूटी करीब पांच दिनों की है। वो दिल्ली से तिरूवनंतपुरम तक जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस में पेंट्री ब्वॉय हैं। ये ट्रेन करीब नौ राज्यों से गुजरती है और इसकी एक तरफा यात्रा ढाई दिनों की है। लंबी यात्रा होने की वजह से इनसे घुल मिल जाते हैं। उनमें से कई इन्हें अपना नंबर भी दे जाते हैं। इनकी ड्यूटी में भाषा कभी आड़े नहीं आती, जहां भाषा काम न करे वहां संकेत काम आ जाते हैं।

ये जॉब दुनिया के उन चुनिंदा रोजगारों में शुमार है, जहां सिर्फ 15 से 20 साल की नौकरी की जा सकती है। तेजी से काम करने की प्रकृति वाले इस फील्ड में बुजुर्गों की जरूरत महसूस नहीं की जाती। ट्रेन में खाना सर्व करने वाले कर्मचारियों में कोई बुजुर्ग ढूंढने से भी नज़र नहीं आता। ऐसे में इनके भविष्य का अंदाज लगा पाना आसान है। इन्हें वीकली ऑफ जैसी कोई सुविधा नहीं मिलती, काम पर न आने का मतलब है, उस दिन की पगार का कट जाना।

पेंट्री ब्वॉय रेलवे के कर्मचारी नहीं होते हैं। रेलवे में खाने का टेंडर जिस कंपनी का होता है। वो ठेके पर पेंट्री ब्वॉय रखवा लेती है। ठेके के कर्मचारियों को इंश्योरेंस, मेडिकल इंश्योरेंस, ESI, पीएफ जैसी कोई सुविधा नहीं दी जाती। सैलरी इतनी कम है कि परिवार को चला पाना मुश्किल। शायद इसीलिए इनके सामने टिप के लिए प्लेट में सौंफ-चीनी परोसने की मजबूरी है। बहरहाल कुछ मीठे के साथ यात्रियों का सफर खत्म हो जाता है लेकिन पेंट्री ब्वॉय का सफर खत्म होने वाला सफर नहीं है, ये दीर्घकालिक सफर है.....संजय बिष्ट

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