नई दिल्ली: वैलेंटाइन डे से ठीक पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने एक वीडियो जारी किया है। इसमें बोर्ड के सेक्रेटरी मौलाना मोहम्मद उमर दीन ने मुसलमानों से अपील की है कि वे इस दिन को मनाने से पूरी तरह दूर रहें। मौलाना ने कहा कि वैलेंटाइन डे मनाना “अजाब-ए-इलाही” को दावत देने के समान है। मौलाना ने मुसलमानों को आगाह करते हुए कहा कि इस तरह के त्योहार इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ हैं और इन्हें अपनाने से बचना चाहिए। AIMPLB का यह संदेश सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
'महबूबा के साथ कत्ल किया गया था वैलेंटाइन'
वीडियो में मौलाना मोहम्मद उमर दीन ने विस्तार से बताया, 'वैलेंटाइन एक ईसाई शख्स था, जो बदकारी के जुर्म में अपनी महबूबा के साथ कत्ल कर दिया गया था। बाद के लोगों ने उसे शहीद-ए-मुहब्बत करार देकर उसकी यादगार के तौर पर वैलेंटाइन डे मनाना शुरू किया। मुसलमानों को ये बात जेब नहीं देती कि वे एक बदकार शख्स की यादगार के तौर पर कोई दिन मनाएं। मुसलमानों को इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि वैलेंटाइन डे मनाना अजाब-ए-इलाही को दावत देना है।'
क्या आपको पता है क्यों मनाते हैं वैलेंटाइन डे?
वैलेंटाइन डे हर साल 14 फरवरी को दुनिया भर में प्रेम और रोमांस का प्रतीक बनकर मनाया जाता है। इसकी जड़ें तीसरी शताब्दी के रोमन साम्राज्य में हैं। उस जमाने में संत वैलेंटाइन नाम के एक ईसाई पादरी थे जिन्हें सम्राट क्लॉडियस द्वितीय ने 14 फरवरी 270 ईस्वी को मौत की सजा दी थी। सम्राट ने सैनिकों के विवाह पर पाबंदी लगा रखी थी, क्योंकि वे शादीशुदा होने पर युद्ध में कमजोर पड़ जाते थे। संत वैलेंटाइन ने गुप्त रूप से कई जोड़ों का विवाह कराया जिसके लिए उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया गया और बाद में उन्हें कत्ल कर दिया गया।
धीरे-धीरे लोकप्रिय होता गया यह फेस्टिवल
एक कहानी यह भी है कि वैलेंटाइन ने जेलर की अंधी बेटी की आंखों की रोशनी लौटा दी और उसे एक नोट लिखा, जिसमें लिखा था 'आपका वैलेंटाइन'। बाद में मध्य युग में जॉफ्री चौसर जैसे कवियों ने इसे प्रेम दिवस से जोड़ दिया और यह धीरे-धीरे लोकप्रिय होता गया। 19वीं सदी में कार्ड्स, गुलाब और चॉकलेट की परंपरा शुरू हुई। आज के दौर में यह फेस्टिवल कई दिनों का होने लगा है और इसमें बाजार की भी बड़ी भूमिका है।
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