नई दिल्ली: पर्यावरण को बचाने के सरकार 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती वाले दिन से सिंगल यूज प्लास्टिक (Single use Plastic) के खिलाफ अभियान चलाने जा रही है। यानी इसके बाद सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल करना हो हो जाएगा। बता दें, सिंगल यूज प्लास्टिक से पर्यावरण को नुकसान तो होता है ही साथ ही ये प्लास्टिक रिसाइकल भी नहीं होते हैं। प्लास्टिक कई माइक्रॉन में बनता है, लेकिन 40 माइक्रोमीटर (माइक्रॉन) या उससे कम स्तर के प्लास्टिक को सिंगल यूज प्लास्टिक कहते हैं। ये पर्यावरण में ही रहेंगे और इनका विनाश करना भी संभव नहीं होता है।
सिंगल यूज प्लास्टिक में सब्जी की पतली वाली पन्नी, जो आप सब्जी वाले से लेते हैं, सड़क पर ठेली पर मिलने वाले प्लास्टिक वाले चाय के कप, पानी की बोतल, कोल्ड ड्रिंक्स की बोतल, कोल्ड ड्रिंक की स्ट्रा, ऑनलाइन शॉपिंग में सामान को रैप के लिए इस्तेमाल की जाने वाली पॉलिथीन, बर्थडे पर केक के साथ मिलने वाला चाकू, चाट-पकोड़ी वाली प्लास्टिक की प्लेट्स, प्लास्टिक के चम्मच और कांटे और इसके अलावा डिस्पोजल आइटम्स।
अब मसला ये है कि जब ये सारी चीजें बैन हो जाएंगी तो इसके विकल्प के रूप में आप क्या इस्तेमाल करेंगे। पॉलीथिन और प्लास्टिक बैग का सबसे अच्छा विकल्प कपड़े या जूट से बना थैला है। हमें बस ये थैला मार्केट जाते वक्त कैरी करना है, आप अपने साथ मोबाइल रखना नहीं भूलते हैं वैसे ही अपने बैग में कपड़े का थैला रखना मत भूलिएगा। आप अपने टेलर से ऐसा बैग भी बनवा सकते हैं।
सिंगल यूज प्लास्टिक के विकल्प
ये तो हो गई घर की बात, लेकिन प्लास्टिक बैग में आने वाले दूध कोल्ड ड्रिंक्स या पानी की पैकेजिंग करने वाली कंपनियां प्लास्टिक की जगह कौन से विकल्प इस्तेमाल करेंगी?
प्लास्टिक के विकल्प से खतरा क्या है?
अमेरिकी केमिस्ट्री काउंसिल एवं पर्यावरण अनुसंधान करने वाली कंपनी ट्रूकॉस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर कोल्ड-ड्रिंक बनाने वाली कंपनियां प्लास्टिक की जगह कांच, एल्यूमिनियम या फिर टिन का इस्तेमाल करने लगेंगी तो पर्यावरण में प्रदूषण पहले से ज्यादा फैलेगा। इसके अलावा खाने पीने का सामान और दूध-दही जैसे उत्पादों को अगर प्लास्टिक की जगह किसी और विकल्प का इस्तेमाल करके देंगी तो वो ग्राहकों की जेब पर असर डालेगा। क्योंकि अन्य विकल्प महंगे भी हैं।
आपने मॉल में देखा होगा वहां फल और सब्जियां प्लास्टिक में लिपटे होते हैं, दरअसल प्लास्टिक में रैप करने से फल और सब्जियां ज्यादा दिन तक चलती हैं। अगर प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं होगा तो भोजन की बर्बादी रोकने का भी दूसरा विकल्प खोजना होगा। इतनी सारी दिक्कतें हैं लेकिन पॉलिथीन का इस्तेमाल करना भी ठीक नहीं है सभी को पता है कि प्लास्टिक एक तो पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं दूसरा प्लास्टिक में पाए जाने वाले केमिकल शरीर में कैंसर जैसी बीमारियां भी पैदा करते हैं।
फिलहाल वैज्ञानिक प्लास्टिक के विकल्प की तलाश में हैं।
क्या हैं नए विकल्प?
कोका-कोला अपने प्रोडक्ट की पैकेजिंग के लिए अब बायो-प्लास्टिक का यूज बढ़ा रही है। यह बायो-प्लास्टिक ब्राजील में पैदा होने वाले गन्ने से मिलकर तैयार होता है। हालांकि यह प्लास्टिक की बोतलों से काफी महंगा होगा। प्लास्टिक के कुछ और विकल्प सामने आ रहे हैं। आइए जानते हैं वो क्या हैं?
माइकोटेक्चर
सिंगल यूज प्लास्टिक के विकल्प
मशरूम खाने में तो बहुत टेस्टी लगते हैं, लेकिन इनमें ऐसी खासियत भी है कि हम इसका इस्तेमाल प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर भी आने वाले समय में कर पाएंगे। पेड़ों से चिपककर जो फफूंद उगते हैं वो प्लास्टिक का विकल्प बनने में वैज्ञानिकों के लिए काफी मददगार हैं। इनसे तैयार प्रोडक्ट, पैकेजिंग में प्रयोग होने वाले प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसके अलावा ध्वनियंत्र और फर्नीचर बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। माइकोवर्क्स नाम की एक कंपनी के इंजीनियर, डिज़ाइनर और वैज्ञानिक मिलकर फफूंद के रेशों से नए प्रोडक्ट बना रहे हैं। इनसे रबर-कार्क जैसी चीजें तैयार हो रही हैं। न्यूयॉर्क की एक और कंपनी इवोकेटिव डिज़ाइन फफूंद के अंकुरण यानी माइसीलियम की मदद लेकर लकड़ी के पैनल जोड़ने में इस्तेमाल में ले रही हैं। इनसे तैयार मैटीरियल भी आग नहीं पकड़ता है।
सबसे अच्छी बात ये है कि माइसीलियम को किसी भी कृषि उत्पाद के कचरे पर उगाया जा सकता है। इसमें पिस्ते के छिलके से लेकर लकड़ी के बुरादे तक में इन फफूंद को विकसित किया जा सकता है। ये नेचुरल पॉलीमर होते हैं, जो मजबूत से मजबूत गोंद से भी ज़्यादा मज़बूती से चिपकाने और जोड़ने के काम आते हैं। इसलिए फफूंद को प्लास्टिक का अच्छा विकल्प माना जा रहा है।