नई दिल्ली। चीन में सुस्ती और अपनी अर्थव्यवस्था की बढ़ती रफ्तार के कारण भारत दुनिया के लिए ऑयल डिमांड का सेंटर बनता जा रहा है। एक दशक पहले जैसे चीन अपनी ऊर्जा की जरूरत को पूरा करने के लिए हेज करता था, भारत भी उसी राह पर चल पड़ा है। इसी का नतीजा है कि भारत विदेशों और अपनी धरती पर उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश कर रहा है। एक्सपर्ट्स मानते है कि एक दशक पहले जब चीन तेजी से बढ़ रहा था उस वक्त के हालात से आज कहीं बेहतर माहौल है। ऐसे में भारत चीन को चुनौती दे सकता है। गौरतलब है कि चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तेल खपत करने वाला देश है। वहीं, भारत चौथे पायदान पर है।
भारत के लिए माहौल बेहतर
भारत को एक लाभ मिल रहा है, जो चीन को नहीं मिला। चीन की खपत 2008 में तेजी से बढ़ी थी। उस वक्त को कमोडिटी सुपर-साइकिल के नाम से जाना जाता है। 2008 में डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत 147.27 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया था, जबकि भारत ऐसे समय में है जब कमोडिटी की कीमतों में एतिहासिक गिरावट देखने को मिल रही है। डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमत 40 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे है। भारत ने 2014 के मुकाबले 2015 में कच्चे तेल के आयात पर 60 अरब डॉलर कम खर्च किया, जबकि 4 फीसदी अधिक तेल देश में आया।
तस्वीरों में देखिए क्रूड से जुड़े फैक्ट्स
Crude oil
Crude oil
IndiaTV Paisa
IndiaTV Paisa
Crude oil
Crude oil
IndiaTV Paisa
IndiaTV Paisa
Crude oil
Crude oil
IndiaTV Paisa
Crude oil
IndiaTV Paisa
Crude oil
IndiaTV Paisa
Crude oil
IndiaTV Paisa
Crude oil
IndiaTV Paisa
Crude oil
भारत बना 17 साल पुराना चीन
लंदन स्थित एनर्जी आस्पेक्ट्स के चीफ ऑयल एनालिस्ट अमृता सेन ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट के कारण सरकार स्ट्रक्चरल और पॉलिसी में बदलाव करने में सक्षम है। इन बदलावों के कारण भारत में ऑयल की डिमांड बढ़ेगी। 1990 के दशक में चीन में तेल की खपत उतनी थी जितनी आज भारत की है। 1999 में चीन की अर्थव्यवस्था अभी के 10 खरब डॉलर का दसवां हिस्सा थी और शंघाई जैसे प्रमुख शहरों की सड़कों पर साइकिल, टैक्सी और बसों की भीड़ रहती थी। इससे अगले 17 वर्षों में चीन की अर्थव्यवस्था 7वें पायदान से दूसरे स्थान पर पहुंच गई। वाहन बिक्री बढ़ी और तेल की मांग लगभग उसके बाद से तीन गुनाअधिक हो गई। भारत भी उसी राह पर है।
Latest Business News