सरकारी सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी संभव है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दामों में तेज उछाल और पिछले करीब चार वर्षों से खुदरा ईंधन कीमतों को स्थिर रखने के कारण तेल कंपनियों पर लगातार घाटे का दबाव बढ़ रहा है। पीटीआई की खबर के मुताबिक, हाल ही में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो चार साल का उच्चतम स्तर है। हालांकि इसमें थोड़ी गिरावट आई है, लेकिन कीमतें अभी भी 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। इसकी बड़ी वजह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर असर और अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है।
पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी की कीमत में नहीं हुई बढ़ोतरी
इस बीच इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा लागत बढ़ने के बावजूद फिलहाल पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। हालांकि, सरकारी तेल कंपनियों ने लागत बढ़ने के चलते कमर्शियल एलपीजी, औद्योगिक डीजल, 5 किलो वाले गैस सिलेंडर और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए जेट फ्यूल की कीमतों में इजाफा किया है।
25 से 28 रुपये प्रति लीटर बढ़ सकते हैं दाम
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद पेट्रोल और डीजल के दाम 25 से 28 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं। तेल कीमतों में यह उछाल 28 फरवरी को संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमले और उसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई के कारण आया, जिससे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रभावित हुआ। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम है और दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है।
प्रति लीटर फ्यूल पर हो रहा बड़ा नुकसान
तेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, मौजूदा स्थिति में सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 20 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 100 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। कीमतों को लंबे समय से स्थिर रखने की वजह से यह घाटा बढ़ा है, हालांकि फिलहाल कीमतें बढ़ाने का कोई तत्काल फैसला नहीं लिया गया है। पिछले साल कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़कर इस महीने 114 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई है। अप्रैल 2022 से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। इस दौरान जब वैश्विक कीमतें घटीं, तो तेल कंपनियों ने मुनाफा कमाया और उसी से बाद में हुए नुकसान की भरपाई की।
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