नई दिल्ली: आज के समय में निवेश के लिए SIP (Systematic Investment Plan) सबसे फेमस ऑप्शन बनता जा रहा है। छोटे-छोटे निवेश के जरिए बड़ा फंड तैयार करने का सपना हर कोई देखता है, लेकिन बिना सही जानकारी के SIP शुरू करना नुकसान का कारण भी बन सकता है। अगर आप भी SIP शुरू करने जा रहे हैं, तो कुछ जरूरी बातों को समझना बेहद जरूरी है।
सेबी के नियमों के अनुसार, हर म्यूचुअल फंड को अपने डॉक्यूमेंट में पूरी जानकारी देनी होती है। अगर आप भी अपनी मेहनत की कमाई को SIP के जरिए बढ़ाना चाहते हैं, तो ऑटो-डेबिट का बटन दबाने से पहले इन 7 महत्वपूर्ण पैमानों पर अपनी योजना को जरूर परख लें।
- निवेश का लक्ष्य और समय: SIP शुरू करने से पहले खुद से पूछें कि मैं यह पैसा क्यों जोड़ रहा हूं? क्या यह बच्चों की पढ़ाई के लिए है, घर खरीदने के लिए या रिटायरमेंट के लिए? अगर आपको जल्दी पैसों की जरूरत है, तो डेट फंड चुनें। वहीं, आप लॉन्ग टर्म में इन्वेस्ट करना चाहते हैं तो हाइब्रिड फंड या इक्विटी फंड को चुनना बेहतर होगा।
- रिस्क लेने की क्षमता: हर म्यूचुअल फंड के साथ एक रिस्क ओमीटर होता है, जो 1 से 5 के पैमाने पर जोखिम बताता है। शेयर बाजार (इक्विटी) वाले फंड आमतौर पर 4 या 5 के स्तर पर होते हैं, यानी इनमें जोखिम ज्यादा होता है। इसके अलावा, फंड का पोर्टफोलियो टर्नओवर रेशियो भी देखें। अगर फंड मैनेजर बार-बार शेयर खरीद और बेच रहा है, तो इससे आपकी लागत बढ़ सकती है।
- फंड का पिछला प्रदर्शन: केवल पिछले एक साल का रिटर्न देखकर किसी फंड को न चुनें। फंड का 3, 5 और 10 साल का प्रदर्शन देखें। क्या इस फंड ने बुरे वक्त में भी खुद को संभाला था? क्या यह अपने बेंचमार्क (जैसे निफ्टी 50) से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है? याद रखें, लगातार औसत से बेहतर प्रदर्शन करने वाला फंड उस फंड से बेहतर है जिसने सिर्फ एक साल में बहुत ऊंचा रिटर्न दिया हो।
- एक्सपेंस रेशियो: म्यूचुअल फंड कंपनियां आपके पैसे को मैनेज करने के बदले एक सालाना फीस लेती हैं, जिसे एक्सपेंस रेशियो कहते हैं। यह 0.3% से 2.5% तक हो सकता है।यहां फीस कम होती है क्योंकि कोई एजेंट नहीं होता। यहां एजेंट का कमीशन भी आपकी जेब से जाता है। महज 1% का अंतर भी 20 साल बाद आपके मुनाफे में लाखों रुपये का फर्क डाल सकता है। इसलिए कम एक्सपेंस रेशियो वाला फंड चुनना बुद्धिमानी है।
- फंड मैनेजर का एक्सपीरिएंस: आपका पैसा कौन मैनेज कर रहा है, यह जानना बेहद जरूरी है। फंड मैनेजर का कम से कम 3 साल का ट्रैक रिकॉर्ड देखें। अगर फंड मैनेजर बार-बार बदल रहा है, तो फंड की इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी भी बदल सकती है, जो आपके रिटर्न को प्रभावित कर सकती है। एक एक्सपीरिएंस मैनेजर बाजार के उतार-चढ़ाव को बेहतर तरीके से संभाल सकता है।
- पोर्टफोलियो की बनावट: फंड के फैक्टशीट को गौर से पढ़ें। आपका पैसा किन कंपनियों और किन सेक्टरों में लगा है? अगर फंड ने अपना 30% से ज्यादा पैसा एक ही सेक्टर में लगा रखा है, तो वह रिस्क भरा हो सकता है। एक अच्छी तरह से डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो आपके निवेश को सुरक्षा देता है।
- एग्जिट लोड और लिक्विडिटी: कई बार जरूरत पड़ने पर जब आप पैसा निकालते हैं, तो कंपनियां एग्जिट लोड (0.5% से 2%) काट लेती हैं। अक्सर 1 साल से पहले पैसा निकालने पर यह चार्ज लगता है। निवेश से पहले यह जरूर देख लें कि आपकी हर SIP किस्त पर यह नियम कैसे लागू होगा। साथ ही, पैसा निकालने के बाद वह आपके खाते में कितने दिनों (T+1 या T+3) में आएगा, इसकी जानकारी भी रखें।
स्मार्ट टूल्स का करें इस्तेमाल
आजकल कई मोबाइल ऐप्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध हैं जो आपको SIP कैलकुलेटर की सुविधा देते हैं। आप देख सकते हैं कि 12% या 15% के रिटर्न के साथ 20 साल में आपकी कितनी संपत्ति बनेगी।
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