Shani Pradosh Upay: शनिवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोष व्रत के रूप में जाना जाता है। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का बहुत महत्व होता है। 5 नवंबर को शनि प्रदोष व्रत है। इस दिन शाम 5 बजकर 9 मिनट तक द्वादशी की तिथि रहेगी। शनि प्रदोष व्रत पर शनिदेव की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। शनिदेव जिस पर कुपित हो जाएं, उसे कोई नहीं बचा सकता। उनके अशुभ प्रभावों से व्यक्ति को कई तरह की आर्थिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में उन्हें खुश करने के लिए शनि प्रदोष व्रत पर शनिदेव को तेल अर्पित करें और विधि- विधान से उनकी पूजा-अर्चना करें।
भगवान शिव की भी करें पूजा
शनि प्रदोष होने के कारण इस दिन शनिदेव के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा भी की जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शनि देव, भगवान शिव के शबे बड़े भक्त हैं। भगवान शिव ने ही शनि देव को नवग्रहों में न्यायाधीश की उपाधि प्रदान की है।
शनि देव को खुश करने के लिए करें ये उपाय
इस शनिवार शनि देव की कृपा पाने के लिए ये उपाय ज़रूर करें- शनिवार के दिन शनि चालीसा का पाठ करें। पूजा पाठ के बाद शनि मंत्र का जाप करें। ब्राह्मणों और गरीबों में अनाज का दान करें। इसके साथ ही जरूरतमंद लोगों को काला कंबल, काला तिल और लोहा भेट करें। अगर आप इन उपायों को हर शनिवार करते हैं, तो शनि आप पर मेहरबान होंगे और अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखेंगे।
भूलकर भी न करें काम
शनिदेव को खुश रखने के लिए आप भूलकर भी ये काम न करें अन्यथा शनिदेव आप पर क्रोधित हो जाएंगे। अपने पद और धन को लेकर किसी को घमंड न दिखाएं। अमीर, गरीब, छोटे-बड़े किसी का अपमान न करें। जो लोग मेहनत करते हों उनका भूलकर भी निरादर न करें। मन में लालच का भाव लाकर किसी का धन हड़पने की कोशिश न करें वरना आपको शनि के प्रकोप से कोई नहीं बचा पाएगा
करें इस मंत्र का जाप
शनिदेव की कृपा पाने के लिए और उन्हें खुश करने के लिए दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ भी ज़रूर करना चाहिए। राजा दशरथ ने शनिदेव के लिए दशरथ कृत शनि स्तोत्र की रचना की थी।
राजा दशरथ कृत शनि स्तोत्र
नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।
नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तु ते।।
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिनी।।
नमस्ते सर्वभक्षाय वाली मुख्य नमोऽस्तुते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च।।
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तु ते।।
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:।।
ज्ञानचक्षु का नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।
देवासुरमनुष्याश्च सिद्घविद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नश्यन्ति समूलत:।।
प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत।
एवं स्तुतस्तद सौरिग्र्रहराजो महाबल:।।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इंडिया टीवी इस बारे में किसी तरह की कोई पुष्टि नहीं करता है। इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है।)