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Hindi News धर्म Chandra Grahan Kaise Lagta Hai: चंद्र ग्रहण कैसे लगता है? सिर्फ पूर्णिमा पर ही ऐसा क्यों होता है, क्या हैं इसके वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

Chandra Grahan Kaise Lagta Hai: चंद्र ग्रहण कैसे लगता है? सिर्फ पूर्णिमा पर ही ऐसा क्यों होता है, क्या हैं इसके वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

Chandra Grahan Kaise Lagta Hai: चंद्र ग्रहण एक रहस्यमयी खगोलीय घटना है, जिसे विज्ञान और धार्मिक दृष्टि दोनों से समझा जाता है। इसके पीछे पौराणिक कथा और ग्रहों की स्थिति भी जुड़ी हुई है। चलिए जानते हैं कि चंद्र ग्रहण कैसे और क्यों लगता है।

Chandra Grahan चंद्र ग्रहण कैसे लगता है? - India TV Hindi Image Source : FREEPIK चंद्र ग्रहण कैसे लगता है? वैज्ञानिक और धार्मिक कारण

Chandra Grahan Kaise Lagta Hai (चंद्र ग्रहण कैसे और क्यों लगता है): चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) हमेशा से ही लोगों का ध्यान आकर्षित करता रहा है। यह केवल खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है। जब पूरनमासी का चांद अचानक अंधेरे में ढक जाता है, तो इसे देखना एक अलग ही रहस्यमय अनुभव देता है। साथ ही इसके पीछे विज्ञान और पौराणिक कथाओं की कहानी भी जुड़ी होती है। धार्मिक दृष्टि से इसे राहु और केतु से जोड़ा जाता है। साल 2026 का पहला चंद्र ग्रहण 3 मार्च को लगने जा रहा है, जो भारत में भी दिखाई देगा। पौराणिक कथा चंद्र ग्रहण के रहस्य को और रोचक बनाती है। तो आइए जानते हैं चंद्र ग्रहण कैसे और क्यों लगता है। 

चंद्र ग्रहण लगने का वैज्ञानिक कारण

चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है। इस स्थिति में पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और वह पूरी तरह या आंशिक रूप से ढक जाता है। यह केवल पूर्णिमा की रात को ही संभव होता है। जब पृथ्वी की छाया पूरी तरह चांद को ढक लेती है, तो इसे 'पूर्ण चंद्र ग्रहण' कहा जाता है। इस दौरान सूरज की रोशनी वायुमंडल से होकर गुजरती है और चांद पर हल्का लाल रंग पड़ता है, जिसे 'ब्लड मून' कहा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक है और इसमें कोई डरने या रहस्यमय होने वाली बात नहीं है।

चंद्र ग्रहण का राहु और केतु से क्या है संबंध?

धार्मिक दृष्टि से चंद्र ग्रहण राहु और केतु की क्रियाओं से जुड़ा माना जाता है। स्कंद पुराण के अवंति खंड में दी गई कथा में बताया गया है कि सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण का दंश देने वाले राहु-केतु का जन्म उज्जैन नगरी में हुआ था। आइए अब जानते हैं चंद्रग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा। 

चंद्रग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा 

स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, समुद्र में छुपे कीमती खजाने को पाने के लिए समुद्रमंथन किया गया। इसमें देवताओं और दानवों दोनों भागीदारी की थी, क्योंकि केवल देवताओं के लिए समुद्रमंथन कर लेना नामुमकिन था। इस दौरान कई बेशकीमकी रत्नों की प्राप्ति हुई। समुद्रमंथनसे निकले अमृत को दानवों में बांटना पूरी जगत को अंधकारमय करने के समान था। किसी भी तरह अमृत की एक बंदू भी उन्हें मिल जाती, तो अमरत्व का वरदान पाकर वे पूरे संसार में त्राहिमाम कर देते। ऐसे में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर बड़ी चतुराई से अमृत देवताओं को पिलाना शुरू कर दिया। यह बात स्वरभानु नाम के एक राक्षस को पता लग गई और वो देवताओं का रूप धारण कर देवताओं की कतार में बैठ गया। इसके बाद स्वरभानु अमृत का पान करने लगा। यह बात सूर्य और चंद्रमा को पता लगी तो उन्होंने विष्णु जी को उनका भेद बता दिया। 

यह जानकर भगवान विष्णु क्रोध में आ गए और उन्होंने अपने चक्र से स्वरभानु के धड़ को सिर से अलग कर दिया। हालांकि, स्वरभानु अमृतपान कर चुका था, इसलिए उसकी मृत्यु तो नहीं हुई, लेकिन उसका शरीर दो भागों में बंट गया। स्वरभानु के सिर को ही राहु कहा जाता है और धड़ को केतु। 

पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य और चंद्रमा ने ही स्वरभानु का भेद खोला, जिसके कारण उसे दो हिस्सों में बंटना पड़ा था। इसी घटना के बाद से राहु और केतु चांद और सूरज के शत्रु माने जाते हैं। राहु-केतु सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगाते हैं। कहते हैं कि ये दोनों जब चंद्रमा को निगलने की कोशिश करते हैं, तो यह घटना ही चंद्र ग्रहण के नाम से जानी जाती है। 

सावधानियां और महत्व

ग्रहण के दौरान सूतक काल माना जाता है। इस समय पूजा, शुभ कार्य और अन्य मांगलिक क्रियाएं टालने की सलाह दी जाती है। ग्रहण का धार्मिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह होलिका दहन जैसे पर्व के साथ जुड़ा होता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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