Holika Dahan Ki Katha (होलिका दहन की कथा): होली सनातन धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि पर होलिका दहन किया जाता है। इस साल भारत के कुछ हिस्सों में होलिका दहन 2 मार्च को होगा और कुछ जगहों पर 3 मार्च को किया जाएगा। फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। होलाष्टक के दौरान होली का डंडा गाढ़ा जाता है। इसके बाद पूर्णिमा पर होलिका दहन की शाम को शुभ मुहूर्त में गोबर और लकड़ियों से बने ढेर में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। देश-दुनिया और परिवार की मंगल कामना के साथ होलिका की परिक्रमा की जाती है। इस दौरान श्रद्धालु अग्नि में नई फसल और पकवान अर्पित करके धन-धान्य की बरकत, निरोगी काया और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। तो आइए जानते हैं कि क्यों होलिका दहन किया जाता है। यहां पढ़िए होलिका दहन की परंपरा क्यों और कब से शुरु हुई इससे जुड़ी एक प्रचलित कथा।
होलिका दहन की कथा (Holika Dahan Ki Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक शक्तिशाली असुर राजा था, जिसका नाम हिरण्यकश्यप था। वह घमंडी और दुष्ट राजा स्वयं को ही सबकुछ समझता था। हिरण्यकश्यप की परम इच्छा और कठोर आदेश था कि उसके राज्य में ईश्वर के तौर पर केवल उसी की पूजा होनी चाहिए। किसी और भगवान को मानने वाली जनता को वह कठोर दंड देता या मृत्यु के हवाले करने का आदेश दे देता था। एक बार की बात है हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया और उनसे अद्भुत वरदान प्राप्त किया। वरदान ऐसा था कि उसे न कोई मनुष्य मार सके, न पशु; न दिन में, न रात में; न घर के भीतर, न बाहर; और न किसी अस्त्र-शस्त्र से उसका अंत हो। इस अभूतपूर्व शक्ति ने उसे अहंकारी बना दिया।
हिरण्यकश्यप स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगा और उसने अपने राज्य में आदेश जारी कर दिया कि कोई भी भगवान विष्णु की आराधना नहीं करेगा। राज्य में भय का वातावरण छा गया। लोग मन ही मन पूजा करते, पर खुलकर विरोध करने का साहस किसी में नहीं था। किंतु राजा के अपने महल में ही एक ऐसी आत्मा थी जो उसके आदेश के आगे झुकने को तैयार नहीं थी उसका पुत्र प्रह्लाद।
प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। पिता के क्रोध, गुरुओं की शिक्षा, मित्रों के तर्क कुछ भी उनके हृदय से नारायण का नाम नहीं मिटा सका। वे हर परिस्थिति में भगवान का स्मरण करते रहते। यह देखकर हिरण्यकश्यप क्रोधित हो उठा। हिरण्यकश्यप ने पहले तो अपने पुत्र को समझाया लेकिन वह नहीं मान तो उसे धमकाया और अंततः दंड देना शुरू किया।
कथाओं के अनुसार, प्रह्लाद को विषैले सर्पों के बीच डाला गया, हाथियों से कुचलवाने का प्रयास किया गया, ऊंचे पर्वत से गिराया गया, यहा तक कि समुद्र में भी फेंका गया। परंतु हर बार वे सुरक्षित बच निकले। लोगों को विश्वास होने लगा कि कोई दिव्य शक्ति उनकी रक्षा कर रही है। जब सभी उपाय असफल हो गए, तब हिरण्यकश्यप को अपनी बहन होलिका की याद हो आई कि अब उसी के मदद से प्रह्लाद का अंत संभव है। होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। योजना बनी कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठेगी, जिससे प्रह्लाद जल जाएगा और होलिका सुरक्षित रहेगी।
फाल्गुन पूर्णिमा की रात अग्नि की विशाल चिता सजाई गई। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। प्रह्लाद शांत भाव से भगवान का नाम जपते रहे। तभी घटनाओं ने अप्रत्याशित रूप ले लिया। अग्नि से रक्षा करने वाला दिव्य वस्त्र उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गया और होलिका अग्नि में जलने लगी। कुछ ही समय में वह भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आ गए।
इस घटना को लोगों ने दैवी न्याय के रूप में देखा अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है, जबकि सच्ची भक्ति और आस्था की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं। इसी स्मृति में हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
अगले दिन रंगों का उत्सव मनाया जाता है, जिसे होली कहा जाता है। मान्यता है कि प्रह्लाद की रक्षा की खुशी में लोगों ने रंग और गुलाल उड़ाकर आनंद मनाया था। आज भी कई स्थानों पर होलिका की राख को पवित्र मानकर घर लाया जाता है और उसे शुभ संकेत के रूप में माथे पर लगाया जाता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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