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3 दशक की दोस्ती पर भारी 5 दशक लंबी दुश्मनी, जानिए ईरान-इजरायल का पूरा इतिहास, खामेनेई ने कैसे सब बदल दिया

ईरान और इजरायल के रिश्तों में अमेरिका का अहम प्रभाव रहा है। हालांकि, खामेनेई की उदय के साथ ईरान पूरी तरह बदल गया और मौजूदा हालातों के लिए भी खामेनेई बहुत हद तक जिम्मेदार हैं।

इजरायल-ईरान युद्ध की...- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV इजरायल-ईरान युद्ध की कहानी

ईरान और इजरायल के बीच पांच महीने बाद दोबारा सीधी जंग शुरू हो चुकी है। दोनों देश एक-दूसरे पर लगातार हमले कर रहे हैं, जिनमें कई सैनिकों और नेताओं के भी मारे जाने की खबर है। इजरायल के पास अमेरिका का समर्थन है। वहीं, ईरान अकेले अपने पड़ोसी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है। इसके साथ कई आतंकी संगठनों की मदद से हमला कर रहा है। इनमें हिजबुल्लाह, हूती समेत कई अन्य संगठन शामिल हैं।

इजरायल और ईरान एक समय पर अच्छे दोस्त हुआ करते थे। ईरान दूसरा इस्लामिक देश था, जिसने इजरायल को एक देश के रूप में मान्यता दी थी। वह अन्य इस्लामिक देशों से छिपकर इजरायल की मदद करता था। इजरायल की जरूरत का 40 फीसदी तेल ईरान से जाता था। यहां तक कई ईराक के खिलाफ युद्ध में इजरायल ने दिल खोलकर ईरान को हथियार दिए थे। हालांकि, अताउल्लाह खामेनेई के उदय के साथ ईरान में हालात बदले और अब दोनों देशों के बीच पांच महीने में दूसरी बार सीधा युद्ध शुरू हो चुका है। इस बार इजरायल के साथ अमेरिका खुले तौर पर है। ऐसे में यह लड़ाई लंबी खिंच सकती है। यहां हम दोनों देशों के संबंधों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

ईरान की मदद से बना इजरायल

1948 के पहले इजरायल का अस्तित्व ही नहीं था। ये पूरा इलाका फिलीस्तीन था। जिस पर कभी ऑटोमन साम्राज्य का राज था। 14 मई 1948 को इजरायल अस्तित्व में आया। संयुक्त राष्ट्र ने 1947 में फिलीस्तीन को अरब और यहूदी राज्य में बांटने का प्रस्ताव दिया। अरब नेताओं को ये प्रस्ताव मंजूर नहीं था। इसका विरोध करने वाले 13 मुस्लिम देशों में ईरान भी शामिल था। 1949 में जब इजरायल को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाने के लिए वोटिंग हुई तब भी ईरान ने इसका विरोध किया था। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान भले ही इजरायल का विरोध कर रहा था, लेकिन जियोपॉलिटिकल और रणनीतिक फायदे के लिए दोनों देशों के बीच गुप्त संबंध बन गए। 1950 में ईरान ने विरोध का पर्दा हटा दिया। तुर्की के बाद ईरान दूसरा मुस्लिम देश बन गया जिसने इजरायल को मान्यता दी। 

Image Source : India TVकभी अच्छे दोस्त थे ईरान-इजरायल

1953 से मजबूत हुई दोस्ती

दोनों देशों के रिश्तों ने बड़ा मोड़ 1953 के बाद लिया। 1953 में ईरान में तख्तापलट हुआ। मोहम्मद रजा शाह पहलवी की सत्ता में वापसी हुई। पहलवी अमेरिका और वेस्ट देशों के समर्थक थे। मिस्र और इराक जैसे देशों के बीच ईरान ने इजरायल की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। असल में इस दोस्ती में इजरायल का भी फायदा था और ईरान का भी। इसके साथ ही अमेरिका के लिए भी ये दोस्ती बेहद अहम थी। उस दौर में ईरान और इजरायल दोनों को अमेरिका का समर्थन था। सोवियत संघ को पश्चिमी एशिया से बाहर रखने के लिए अमेरिका दोनों की दोस्ती को और बढ़ा रहा था। दूसरी तरफ ईरान इस इलाके में खुद को सबसे बड़ी इस्लामी फोर्स के रूप में उभारना चाहता था। नए बने इजरायल को अपने पांव पर खड़े रहने के लिए ईरान के सपोर्ट की जरूरत थी।

ईराने के तेल पर आगे बढ़ा इजरायल 

इजरायल को तेल देने पर अरब देशों ने प्रतिबंध लगा रखा था। इजरायल को इंडस्ट्री और सैन्य जरूरतों के लिए तेल की जरूरत थी। तब इजरायल अपनी जरूरत का 40 परसेंट तेल ईरान से लेता था। 1968 में इलाट-अश्केलोन पाइपलाइन कंपनी का एक ज्वाइंट वेंचर हुआ। इसमें मिस्र के कब्जे वाले इलाके से बचते हुए ईरान से तेल इजरायल पहुंचाया गया। ईरान के तेल के बदले इजरायल ने ईरान को हथियारों, टेक्नोलॉजी और अनाज की सप्लाई की। ईरान और इजरायल ने मिलकर प्रोजेक्ट फ्लावर शुरू किया। ये हाईटेक मिसाइल सिस्टम डेवलप करने का प्रोजेक्ट था। ईरान की सीक्रेट पुलिस SAVAK को 1957 में मोसाद ने ट्रेन किया। मिडिल ईस्ट के सारे इस्लामिक देशों के विरोध के बावजूद ईरान ने इजरायल के साथ हाथ मिलाया।

Image Source : India TVतीन दशक तक दोस्त रहे इजराइल-ईरान

खामेनेई ने बदली तस्वीर

1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद पहलवी राजवंश को सत्ता से उखाड़ फेंका और अयातुल्ला खामनेई ने ईरान को इस्लामी गणराज्य बना दिया। इसके साथ ही ईरान की तस्वीर बदल गई। यहां महिलाओं की आजादी छिनने लगी और पश्चिम प्रभाव कम होने लगा। इस्लाम का असर दिखने लगा। लेकिन दोस्ती दुश्मनी में अचानक नहीं बदली, क्योंकि ये वो दौर था जब ईरान और इराक के बीच जंग के हालात तैयार हो रहे थे। ईरान और इजरायल दोनों को एक दूसरे की जरूरत थी क्योंकि दोनों का दुश्मन एक ही था। 1980 से 1988 तक 8 साल ईरान और इराक के बीच जंग चलती रही। इस युद्ध में इजरायल ने ईरान को हथियारों की सप्लाई की थी। कहा जाता है कि युद्ध के दौरान हर साल इजरायल ने 500 मिलियन डॉलर के हथियार ईरान को दिए।

खामेनेई ने अमेरिका-इजरायल के खिलाफ माहौल बनाया

अयातुल्ला खामनेई इजरायल को फिलीस्तीन की जमीन पर कब्जा करने वाला मानते थे। अमेरिका को वो बड़ा शैतान और इजरायल को छोटा शैतान कहते थे। खामनेई ईरान को मुस्लिम राष्ट्रों के लीडर के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहते थे। इसमें इजरायल से दोस्ती अड़चन पैदा करती इसलिए उनकी सरकार ने इजरायल से सारे रिश्ते तोड़ दिए। सिर्फ यही नहीं ईरान ने इजरायल विरोधी फिलीस्तीन आंदोलन को सपोर्ट करना शुरू कर दिया। ईरान और इजरायल के बीच प्रॉक्सी वॉर का ये सिलसिला उसी दौर में शुरू हुआ। इजरायल से लड़ने के लिए बने हिजबुल्लाह को ईरान ने मदद की। इजरायल ने हिजबुल्लाह के इन हमलों के पीछे ईरान का हाथ बताया था। इजरायल के खिलाफ ईरान के सपोर्ट से एक्सिस ऑफ रेज़िस्टेंस बना। इसमें फिलीस्तीन समर्थक शिया संगठन शामिल हुए। हिजबुल्लाह, हूती, सीरिया और इराक के संगठन शामिल थे।

1991 में ईरान ने न्यूक्लियर बम पर काम शुरू किया

1991 में गल्फ वॉर खत्म होने के बाद दोनों मुल्कों के रिश्ते खराब होते चले गए। लेकिन खुल्लमखुल्ला दुश्मनी का दौर तब शुरु हुआ जब कट्टरपंथी महमूद अहमदीनेजाद साल 2005 में ईरान के राष्ट्रपति बने। अहमदीनेजाद ने खुलकर इजरायल का विरोध किया। उसे खत्म करने की बात कही। इसके बाद ईरान ने न्यूक्लियर पावर बनने की दिशा में काम शुरू कर दिया। इजरायल के लिए खतरे की घंटी थी। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए कभी इजरायल ने साइबर अटैक किया। कभी उसके वैज्ञानिकों की हत्या की। अभी तक ईरान इजरायल के बीच प्रॉक्सी वॉर हो रही थी लेकिन हमास के हमले के बाद हालात बेहद खराब हो गए।

Image Source : India TVकैसे दुश्मन बने ईरान-इजरायल

2024 में शुरू हुई सीधी लड़ाई

अक्टूबर 2023 में ईरान के समर्थन वाले हमास ने इजरायल पर हजारों मिसाइलें दागी। इससे हालात, काफी तनावपूर्ण हो गए। हालांकि, दोनों देशों में सीधी लड़ाई नहीं शुरू हुई। इजरायल ने आतंकी संगठनों को निशाना बनाना शुरू किया। 14 अप्रैल 2024 को ईरान ने पहली बार सीधा बड़ा अटैक किया, लेकिन इससे ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। इजरायल ने भी इसका जवाबी हमला किया और ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इसके बाद इजरायल ने नसरुल्लाह और हानिया को मार गिराया। इसके जवाब में ईरान ने अक्तूबर में बड़ा हमला किया। इजरायल ने भी जवाबी कार्रवाई की, लेकिन किसी देश को बड़ा नुकसान नहीं हुआ। जून 2025 में सीधे तौर पर दोनों देशों की लड़ाई हुई। इजरायल ने ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला शुरू किया और बाद में अमेरिका इसमें शामिल हुआ। अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर बम गिराकर उन्हें खत्म कर दिया। इससे बाद ईरान ने जवाबी हमले किए, लेकिन जल्द ही सीजफायर हो गया। इस दौरान इजरायल में 28 और ईरान में एक हजार से ज्यादा मौतों की खबरें सामने आईं।

फरवरी 2026 में दोबारा शुरू हुई जंग

जून 2025 के बाद दोनों देशों के बीच छुटपुट संघर्ष जारी रहा, लेकिन कोई बड़ा हमला नहीं हुआ। 2026 की शुरुआत में अमेरिका ने अपने युद्धपोत ईरान के पास तैनात करने शुरू किए। ईरान में महिलाओं का प्रदर्शन भी जारी रहा। ऐसे में ट्रंप ने कहा कि जरूरत पड़ने पर वह ईरान के प्रदर्शनकारियों के समर्थन में हमले भी करेंगे। फरवरी के अंत में इजरायल ने ईरान पर सीधा हमला कर दिया। इसके जवाब में ईरान ने इजरायल पर मिसाइलें दागने के साथ ही अपने कई अन्य पड़ोसी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला किया है। यह जंग लंबी चलने की आशंका है।

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