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वाहन उद्योग को फिलहाल नहीं मिलेगी चिप संकट से राहत, टाटा समूह के सेमीकंडक्टर संयंत्र की राह में कई अड़चनें

फिच सॉल्यूशंस की एक रिपोर्ट कहती है कि महामारी के दौर में डेटा एवं उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की मांग बढ़ने से सेमीकंडक्टर विनिर्माता पर्याप्त आपूर्ति कर पाने में खुद को नाकाम महसूस कर रहे हैं।

India TV Paisa Desk Edited by: India TV Paisa Desk
Updated on: December 06, 2021 10:44 IST
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Photo:FILE

वाहन उद्योग को मिलेगी चिप संकट से राहत, टाटा समूह के सेमीकंडक्टर संयंत्र की राह में कई अड़चनें

मुंबई। वाहन उद्योग के लिए चिप संकट खत्म होने की फिलहाल कोई संभावना नहीं दिख रही है। सेमीकंडक्टर की किल्लत दूर करने के लिए देश में ही 30 करोड़ डॉलर की लागत से एक सेमीकंडक्टर संयंत्र लगाने की टाटा समूह की योजना को घरेलू स्तर पर कच्चे माल की कमी और महामारी के दौर में विदेशों से भी आपूर्ति बाधित होने जैसी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। 

फिच सॉल्यूशंस की एक रिपोर्ट कहती है कि महामारी के दौर में डेटा एवं उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की मांग बढ़ने से सेमीकंडक्टर विनिर्माता पर्याप्त आपूर्ति कर पाने में खुद को नाकाम महसूस कर रहे हैं। इसके अलावा अमेरिका, ताइवान, कोरिया और जापान जैसे सेमीकंडक्टर विनिर्माता देश भी मौसमी एवं प्राकृतिक आपदाओं से परेशान रहे हैं। ऐसी स्थिति में भारत की कंपनियों को भी जरूरत के हिसाब से सेमीकंडक्टर नहीं मिल पा रहे हैं। इस परिदृश्य में देश का सबसे बड़ा कारोबारी समूह टाटा घरेलू स्तर पर एक सेमीकंडक्टर संयंत्र लगाने की योजना बना रहा है। इसके लिए जमीन की पहचान के बारे में उसकी कई राज्यों के साथ बातचीत भी चल रही है। 

रिपोर्ट के मुताबिक, संभावित ठिकानों के तौर पर तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना को चिह्नित किया गया है। टाटा समूह इसी महीने संयंत्र की जगह को अंतिम रूप दे देगा और वर्ष 2022 के अंत तक इसके शुरू हो जाने की भी उम्मीद है। फिच सॉल्यूशंस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि टाटा समूह इस संयंत्र में ताइवान से मंगाए गए सेमीकंडक्टर सिलिकॉन उपकरणों की असेंबलिंग और परीक्षण करेगा। महामारी के दौर में सेमीकंडक्टर की आपूर्ति लगातार बाधित हुई है। 

कोरोनावायरस के नए स्वरूप के सामने आने के बाद यह किल्लत बनी रहने की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा सेमीकंडक्टर निर्माण में टाटा के पास कोई अनुभव नहीं होने को भी एक जोखिम के तौर पर देखा जा रहा है। इस क्षेत्र में पूरी दुनिया में ताइवान, कोरिया और चीन का दबदबा है।

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