चुनाव नजदीक आते ही पटना में दर्जियों की दुकानों पर लौटी रौनक, बढ़ी कुर्ता-पायजामा की डिमांड
चुनाव नजदीक आते ही पटना में दर्जियों की दुकानें फिर से गुलजार हो उठी हैं। दर्जी कुर्ता-पायजामा बनाने में व्यस्त हैं क्योंकि नेताओं का यह पहनावा मतदाताओं के बीच उनकी पहचान बनाने में मदद करता है।
बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों के नजदीक आते ही पटना का बीरचंद पटेल पथ एक बार फिर से गुलजार हो उठा है। यह सड़क राज्य की तीन प्रमुख राजनीतिक पार्टियों भाजपा, जेडीयू और राजद के दफ्तरों को जोड़ती है जबकि थोड़ी दूरी पर ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) का कार्यालय स्थित है। राजनीतिक गतिविधियां तेज होने के साथ ही इस इलाके में नेताओं और मीडियाकर्मियों की आवाजाही बढ़ गई है। चुनाव नजदीक आते ही कुर्ता-पायजामा की मांग बढ़ गई है। नेता और समर्थक अपनी वेशभूषा को लेकर सजग हैं। दर्जी कुर्ता-पायजामा बनाने में व्यस्त हैं क्योंकि यह पहनावा मतदाताओं के बीच पहचान बनाने में मदद करता है।
इन सबके बीच एक और वर्ग ऐसा भी है, जिनका कार्य इस समय खूब चलता है। ये हैं सड़क किनारे अस्थायी रूप से बैठे दर्जियों और कपड़ा विक्रेताओं की दुकानें। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह केवल व्यापार नहीं बल्कि इन सड़कों पर जीवन, संघर्ष और विरासत की कहानी भी है।
जानें दर्जियों के जीवन, संघर्ष और विरासत की कहानी
कपड़ों की सिलाई दुकान चला रहे पटना निवासी 27 वर्षीय राजा कहते हैं, “हमारा यह काम 40 साल से यूं ही बदस्तूर जारी है। मेरे पिता और दादा यहीं बैठते थे, अब मैं बैठता हूं।” करीब 70 वर्षीय दर्जी अफताब खान पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, “पच्चीस साल पहले चुनाव के समय यहां भीड़ लगी रहती थी। कुर्ता-पायजामा सिलवाने के लिए नेता उमड़े रहते थे। अब हालात बदल गए हैं, ग्राहक कम हो गए हैं।” उन्होंने बताया कि वे आज भी नेताओं व आम लोगों दोनों के कपड़े सिलते हैं और अक्सर कुछ घंटों में ही कपड़े तैयार कर देते हैं।
भागलपुर निवासी 31 वर्षीय मोहम्मद फैय्याज बताते हैं कि वे पिछले दो दशकों से इस इलाके में काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैंने बचपन में ही काम शुरू किया था। यह जगह अब मेरे लिए घर जैसी है।” नाम न बताने की शर्त पर एक अन्य दुकानदार ने बताया कि उनके परिवार ने पुराने विधायक फ्लैटों के पास लगभग 70 वर्षों तक सिलाई की दुकान चलाई। उन्होंने बताया, “अब नई इमारतों के बनने के बाद जगह बहुत कम बची है लेकिन हम अभी भी काम कर रहे हैं।”
फैय्याज के पिता मोहम्मद जुबैर अंसारी कहते हैं, “नई इमारतों से अब ग्राहकों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। पहले दुकानें साफ दिखती थीं, अब नहीं।” उन्होंने बताया कि इसी पेशे ने उनके परिवार को सब कुछ दिया। जुबैर ने कहा, “फैय्याज मेरा सबसे छोटा बेटा है। बड़ा बेटा सरकारी स्कूल में शिक्षक है, दूसरा बेटा उच्च न्यायालय के पास कपड़े की दुकान चलाता है। चारों बेटियों को पढ़ाया है, वे सब अच्छा कर रही हैं।” अंसारी कहते हैं कि उनके पास पैतृक जमीन है लेकिन सरकार अगर सड़क किनारे काम करने वालों को औपचारिक पहचान दे तो राहत मिलेगी। उन्होंने कहा, “सरकार को हमें नियमित करने के लिए जगह देनी चाहिए ताकि नगर निगम की कार्रवाई से बच सकें।”
अंसारी अपने पेशे के महत्व पर मुस्कराते हुए बोले, “हम नेताओं के कपड़े सिलते हैं। टिकट मांगने के बाद जब नेता मंत्री बन जाते हैं, हम तब भी उनके कपड़े सिलते हैं।” अंसारी ने हंसते हुए कहा, “जब वे (नेता) बड़े बन जाते हैं, तो सूट सिलवाने के लिए मौर्यालोक चले जाते हैं।” पिछले पांच साल से यहां दुकान चला रहे वैशाली के रहने वाले मोहम्मद अफरोज कहते हैं, “यह जगह और चुनावी भीड़ हमें सालभर खर्चा चलाने लायक काम दे देती है।”
बिहार में चुनाव कब होंगे?
बिहार में दो चरणों में विधानसभा चुनाव होगा। 6 और 11 नवंबर को वोट डाले जाएंगे और 14 नवंबर को नतीजों का ऐलान होगा। इसके अलावा उम्मीदवारों के लिए पहले चरण की नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 17 अक्टूबर है और दूसरे चरण के लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 20 अक्टूबर है। (भाषा इनपुट्स के साथ)
यह भी पढ़ें-
बिहार चुनाव: महागठबंधन में सीट शेयरिंग फाइनल नहीं, लालू ने राजद के नेताओं को बांट दिया टिकट
