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खूबसूरती में ऐश्वर्या राय को दी टक्कर, पर्दे पर दिखाई ग्लैमरस अदाएं, फिर हुआ मोह भंग तो चुना वैराग्य का रास्ता, अब बौद्ध भिक्षु बन काट रही जिंदगी

बॉलीवुड की एक हसीन एक्ट्रेस अब ग्लैमर की दुनिया से पूरी तरह दूर हो गई है। वो बौद्ध भिक्षु बनकर अपनी जिंदगी गुजार रही है। मुंबई की चकाचौंध से दूर उसका जीवन अब हिमालय की पहाड़ियों में बीत रहा है। चलिए आपको इस हसीना के बारे में बताते हैं।

Barkha madan- India TV Hindi
Image Source : BARKHA MADAN INSTAGRAM बरखा मदान।

ग्लेमर, शोहरत और रेड कार्पेट की चकाचौंध, एक ऐसी दुनिया जिसका सपना करोड़ों लोग देखते हैं। लेकिन इस जगमगाती भीड़ में कुछ ऐसे विरले कलाकार भी होते हैं, जो बाहर के शोर से दूर अपने भीतर की रोशनी तलाशने का साहस जुटा लेते हैं। कई स्टार्स ऐसे हैं जिन्होंने ग्लैमर की दुनिया को  छोड़कर नई राह चुनी और उस पर इतना आगे निकल गए कि अब बॉलीवुड में वापसी का कोई रास्ता नहीं छोड़ा। आज ऐसे ही एक एक्ट्रेस के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं। हम बात कर रहे हैं बरखा मदान की, जिन्होंने न केवल बॉलीवुड को अलविदा कहा, बल्कि पूरी तरह से वैराग्य धारण कर एक बौद्ध भिक्षु का जीवन चुन लिया।

सुष्मिता और ऐश्वर्या के साथ शुरू हुआ सफर

बरखा मदान की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है, लेकिन यह हकीकत है। उनके सफर की शुरुआत 1994 की उस ऐतिहासिक मिस इंडिया प्रतियोगिता से हुई, जिसमें सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय जैसी दिग्गज सुंदरियां शामिल थीं। उस मंच पर बरखा ने न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, बल्कि 'मिस टूरिज्म इंडिया' का खिताब भी जीता। इसके बाद मलेशिया में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य प्रतियोगिता में तीसरा स्थान हासिल कर उन्होंने साबित कर दिया कि वे ग्लैमर की दुनिया की एक उभरती हुई सितारा हैं।

बॉलीवुड में 'खिलाड़ियों का खिलाड़ी' से 'भूत' तक

सौंदर्य प्रतियोगिता के बाद बरखा ने बॉलीवुड का रुख किया। 1996 में उन्होंने अक्षय कुमार, रेखा और रवीना टंडन जैसे बड़े सितारों के साथ फिल्म 'खिलाड़ियों का खिलाड़ी' से अपनी पहचान बनाई। इसके बाद 2003 में राम गोपाल वर्मा की हॉरर फिल्म 'भूत' में उनके 'मंजीत' के किरदार ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। सिर्फ बड़े पर्दे पर ही नहीं, बल्कि टेलीविजन की दुनिया में भी बरखा एक जाना-माना नाम थीं। उन्होंने 'न्याय', 'सात फेरे' और '1857 क्रांति' जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों में काम किया। विशेष रूप से '1857 क्रांति' में रानी लक्ष्मीबाई की भूमिका निभाकर उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया।

सफलता के शिखर पर भीतर का खालीपन

जैसे-जैसे करियर का ग्राफ ऊपर जा रहा था, बरखा के मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। शोहरत, पैसा और फैंस का प्यार होने के बावजूद वे खुद को अकेला और अधूरा महसूस करती थीं। उनके मन में अक्सर एक सवाल उठता था,'क्या जीवन का उद्देश्य सिर्फ इतना ही है?' इसी दौरान वे तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के विचारों और बौद्ध दर्शन की ओर आकर्षित हुईं। किताबों और दर्शन के अध्ययन ने उनके सोचने का जरिया बदल दिया। जो बातें पहले सिर्फ शब्द थीं, अब वे उनके जीवन का अनुभव बनने लगी थीं।

जब अभिनेत्री बनीं ग्यालटेन समतेन

साल 2012 बरखा के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। उन्होंने वह कठिन फैसला लिया, जिसे लेने की कल्पना भी मायानगरी में रहने वाले लोग नहीं कर पाते। बरखा ने शोबिज को हमेशा के लिए त्याग दिया और बौद्ध भिक्षु बनने की दीक्षा ली। दीक्षा के बाद उनका नया नाम पड़ा ग्यालटेन समतेन। यह सिर्फ एक नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि एक नए जन्म की तरह था। ग्लैमरस ड्रेसेस की जगह लाल चोगे ने ले ली और मेकअप की जगह चेहरे पर सादगी और आत्मिक शांति ने।

साधना और सेवा का नया जीवन

आज बरखा मदान उर्फ ग्यालटेन समतेन हिमालय की शांत वादियों में एक संन्यासिनी का जीवन व्यतीत कर रही हैं। जिस अभिनेत्री के पास कभी लग्जरी सुविधाओं की भरमार थी, वह आज संयम और मौन के मार्ग पर चल रही हैं। वे सोशल मीडिया के माध्यम से भी सक्रिय रहती हैं, लेकिन अब उनका उद्देश्य अपनी तस्वीरें दिखाना नहीं, बल्कि लोगों को बौद्ध धर्म के प्रति जागरूक करना और उन्हें मानसिक शांति का मार्ग दिखाना है।

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