'धुरंधर' स्टार अक्षय खन्ना संग शुरू हुआ इन 4 एक्टर्स का करियर, 3 हुए गायब, लेकिन एक का अब भी चलता है सिक्का, पूरा बॉलीवुड ठोकता है सलाम
'धुरंधर' में अक्षय खन्ना की सराहनीय परफॉर्मेंस ने 90 के दशक के उन अभिनेताओं की याद दिला दी, जिन्होंने साथ शुरुआत की थी। इनमें से कई अब फिल्मों से दूर हैं, कुछ को काम के लाले पड़ गए हैं, लेकिन एक अब भी चमक रहा है और सभी पर अकेले ही भारी पड़ता है।

अक्षय खन्ना की 'धुरंधर' बॉक्स ऑफिस पर थमने का नाम नहीं ले रही है और तेजी से 500 करोड़ क्लब में शामिल हो गई है। कमाई के रिकॉर्ड बनाते हुए फिल्म ने दुनियाभर में 552 करोड़ की कमाई कर ली है। लार्ज स्केल, हाई-ऑक्टेन एक्शन और स्टार-स्टडेड कास्ट के बीच एक नाम ऐसा है जिसने बिना शोर मचाए सबसे ज्यादा तालियां बटोरी हैं और ये नाम है अक्षय खन्ना का। रहमान डकैत के रूप में उनका सधा हुआ, खामोश और खतरनाक अभिनय, साथ ही एक वायरल हुक स्टेप, दर्शकों को यह याद दिला रहा है कि 90 के दशक में उन्हें इंडस्ट्री के सबसे भरोसेमंद कलाकारों में क्यों गिना जाता था। वो उस दौर के चार्मिग एक्टर थे, लेकिन अक्षय खन्ना जब बॉलीवुड में आए थे, तब वह अकेले नहीं थे। 80 के दशक के आखिरी सालों और 90 की शुरुआत में इंडस्ट्री में कई नए चेहरे उतरे सुमीत सहगल, अयूब खान, विवेक मुशरान और सलमान खान। सभी में टैलेंट था, सभी के पास मौके थे, लेकिन वक्त ने हर किसी के लिए अलग कहानी लिखी।
सुमीत सहगल
सुमीत सहगल ने 'इंसानियत के दुश्मन' (1987) से आत्मविश्वास से भरा डेब्यू किया। इसके बाद 'ईमान धरम', 'तमाचा', 'लश्कर', 'बहार आने तक' और 'गुनाह' जैसी फिल्मों में नजर आए। उनका चार्म और स्क्रीन प्रेजेंस उन्हें जल्दी पहचान दिला गया और उन्होंने संजय दत्त, गोविंदा, जितेंद्र और मिथुन चक्रवर्ती जैसे बड़े सितारों के साथ काम किया। मगर समस्या यह थी कि ज्यादातर बार वह सेकंड लीड तक सीमित रह गए। जैसे-जैसे गोविंदा सुपरस्टार बनते गए, सुमीत धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। 'साजन की बाहों में' (1995) के बाद उनका फिल्मी सफर लगभग थम गया। बाद में उन्होंने हॉरर फिल्म 'रोक' (2010) से निर्देशन में हाथ आजमाया, लेकिन वह भी खास असर नहीं छोड़ सकी। आज सुमीत कैमरे के पीछे हैं और साउथ इंडियन फिल्मों की हिंदी डबिंग से जुड़ा बिजनेस संभाल रहे हैं।
अयूब खान
दिलीप कुमार के भतीजे अयूब खान से इंडस्ट्री को काफी उम्मीदें थीं। 'मशूक' (1992) से डेब्यू करने के बाद उन्होंने 'सलामी', 'मृत्युदंड', 'जियो शान से' और 'मेला' जैसी फिल्मों में काम किया। अभिनय को सराहा गया, लेकिन बतौर हीरो बॉक्स ऑफिस ने उनका साथ नहीं दिया। 2000 के बाद अयूब ने समझदारी से अपना रास्ता बदला। 'गंगाजल', 'LOC: कारगिल' और 'अपहरण' जैसी फिल्मों में कैरेक्टर रोल किए और टीवी पर 'उत्तरण' व 'मुस्कान' जैसे शोज के जरिए खुद को एक्टिव रखा। काम लगातार मिला, मगर सुपरस्टार का तमगा नहीं।
विवेक मुशरान
सुभाष घई की 'सौदागर' (1991) ने विवेक मुशरान को रातों-रात स्टार बना दिया। 'इलू इलू' सिर्फ गाना नहीं था, वह एक सनसनी था। इसके बाद 'दिल है बेताब', 'सनम', 'बेवफा से वफा' और 'राम जाने' आईं, लेकिन कोई भी फिल्म पहले जादू को दोहरा नहीं सकी। 2005 के बाद विवेक लीड रोल्स से दूर हो गए। सालों बाद उन्होंने 'तमाशा', 'बेगम जान', 'वीरे दी वेडिंग' और 'दो पत्ती' में छोटे लेकिन अहम किरदार निभाए। टीवी और वेब की दुनिया में वह आज भी सक्रिय हैं, लेकिन बतौर रोमांटिक हीरो उनका दौर छोटा रहा।
सलमान खान
और फिर आए सलमान खान। 'मैंने प्यार किया' (1989) से शुरू हुआ उनका सफर कभी थमा ही नहीं। 'हम आपके हैं कौन', 'करण अर्जुन' से लेकर 'बजरंगी भाईजान', 'सुल्तान' और 'टाइगर' फ्रेंचाइजी तक, सलमान ने हर दौर में खुद को नए तरीके से पेश किया। मास अपील, स्टारडम और रीइन्वेंशन का ऐसा मेल बहुत कम देखने को मिलता है।
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