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Hindi News भारत राष्ट्रीय EXCLUSIVE: बांग्लादेशी नेताओं की नॉर्थ ईस्ट छीनने की धमकी ‘शेख चिल्ली के सपनों’ जैसी या खतरनाक साजिश? पढ़िए विदेश मामलों के एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव से बातचीत

EXCLUSIVE: बांग्लादेशी नेताओं की नॉर्थ ईस्ट छीनने की धमकी ‘शेख चिल्ली के सपनों’ जैसी या खतरनाक साजिश? पढ़िए विदेश मामलों के एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव से बातचीत

बांग्लादेश से उठ रही भारत-विरोधी आवाजें सिर्फ सियासी बयानबाजी या कोई बड़ी साजिश, इस मुद्दे को INDIA TV से एक्सक्लूसिव बातचीत में विदेश मामलों के एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव ने डिकोड किया। इस आर्टिकल में पढ़िए पूरी बातचीत।

bangladesh india relation- India TV Hindi Image Source : AP बांग्लादेशी सिर्फ 'बयानवीर' या रच रहे बड़ी साजिश?

Robinder Sachdev Exclusive Interview: इन दिनों बांग्लादेश की राजनीति से उठती कुछ आवाजें भारत के खिलाफ सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि चेतावनी जैसी सुनाई पड़ रही हैं। भारत से ‘7 सिस्टर्स’ को अलग करने जैसे भड़काऊ बयानों ने नॉर्थ ईस्ट की सुरक्षा और बांग्लादेश से संबंधों पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या यह चुनावी सियासत और उकसावे की भाषा है, या फिर इसके पीछे कोई गहरी रणनीतिक साजिश है? इसी संवेदनशील मुद्दे पर INDIA TV ने विदेश मामलों के जानकार रोबिंदर सचदेव से एक्सक्लूसिव बात की। इस खास बातचीत में उन्होंने बांग्लादेश में बढ़ते भारत-विरोधी सेंटिमेंट, पहचान की बदलती सियासत, कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव और भारत के पास मौजूद कूटनीतिक विकल्पों पर बेबाक तरीके से अपना एनालिसिस पेश किया।

सवाल: बांग्लादेश की ओर से भारत के नॉर्थ ईस्ट को लेकर जो बयान सामने आए हैं, वहां 7 सिस्टर्स को अलग करने की बात हो रही है, क्या आप इसे सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी मानते हैं या इसे एक रणनीतिक चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए?

जवाब: रोबिंदर सचदेव ने कहा कि मैं इसे राजनीतिक बयानबाजी मानता हूं। कोई भी कुछ कह दे, यह एक राजनीतिक 'पोजिशनिंग' है। लेकिन जिस तरह से अलग-अलग राजनेताओं के बयान आ रहे हैं, चाहे वे छोटे स्तर के नेता ही क्यों न हों, यह संकेत देता है कि बांग्लादेश के अंदर भारत के खिलाफ सेंटीमेंट बढ़ता जा रहा है। यह केवल सरकार के बाहर के लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार के अंदर के लोग भी इस तरह के बयान दे रहे हैं। यह बांग्लादेश की राजनीतिक विचारधारा को दर्शाता है। अभी चुनाव आएंगे तो यह और बढ़ेगा। चुनाव में भारत की ऐसी छवि बनाई जाएगी कि वह बांग्लादेश के हित में नहीं है, ताकि भारत को काउंटर किया जा सके। दुर्भाग्य से, यह बयानबाजी अभी और बढ़ेगी।

सवाल: जो बांग्लादेश अपनी बंगाली अस्मिता और संस्कृति को लेकर पाकिस्तान से अलग हुआ था, वहां आज नारे लग रहे हैं कि हमें 'बाबर के रास्ते' पर चलना है। बंगाली अस्मिता के लिए लड़ने वाले लोग इतने कट्टरपंथी कैसे हो गए?

जवाब: उन्होंने कहा कि यह एक बहुत ही बुनियादी और दिलचस्प बिंदु है। पहले वहां के लोगों की पहचान यह थी कि वे पहले बंगाली थे और फिर मुस्लिम। अब बांग्लादेश में यह पहचान उलट रही है। अब यह भावना बलवती हो रही है कि 'हम पहले मुस्लिम हैं और बाद में बंगाली।'

दूसरा कारण यह है कि इसके लिए वे भारत को जिम्मेदार ठहराते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि शेख हसीना ने अपने कार्यकाल में काफी ज्यादतियां की। लेकिन बांग्लादेश में यह चलन रहा है कि जो पार्टी सत्ता में होती है, वह दूसरी को प्रताड़ित करती है। जब खालिदा जिया सत्ता में थीं, तब उन्होंने शेख हसीना की पार्टी पर अत्याचार किए थे।

बांग्लादेश में अब यह परसेप्शन बना दिया गया है कि शेख हसीना ने जो कुछ भी किया, वह भारत के समर्थन या शह की वजह से किया। इस कारण छात्रों और अन्य वर्गों में भारत के खिलाफ राय बनी है। इसमें कट्टरपंथी तत्व भी सक्रिय हैं जो इस स्थिति का फायदा उठा रहे हैं और यह प्रचार कर रहे हैं कि हसीना के कार्यकाल की हर घटना के पीछे भारत का हाथ था।

सवाल: बांग्लादेश के नेताओं का ऐसा बयान देना 'शेख चिल्ली के हसीन सपने' जैसे क्यों हैं? इसको भौगोलिक क्षेत्र और सैन्य शक्ति की तुलना करके समझाइए।

जवाब: रोबिंदर सचदेव ने कहा कि निश्चित रूप से, ये 'मुंगेरी लाल' और 'शेख चिल्ली' जैसे सपने ही हैं। सैन्य रूप में बांग्लादेश का भारत से कोई मुकाबला नहीं है, वे कुछ नहीं कर सकते। परंतु, असल चिंता हमारे नॉर्थ ईस्ट की आंतरिक अशांति है। वे समझते हैं कि यह भारत की एक कमजोर नस है। मुख्य खतरा यह है कि वे हमारे नॉर्थ ईस्ट में उग्रवाद को बढ़ावा दे सकते हैं। चाहे वह धार्मिक कट्टरपंथ हो या एथनिक कट्टरपंथ- जैसे मणिपुर या नागालैंड में स्थितियां हैं। वे इन तत्वों को शह और बढ़ावा दे सकते हैं। ये हमारे लिए चिंता की बात हो सकती है।

सवाल: बांग्लादेश में जो कट्टरपंथी ताकतें हैं, चाहे वे सरकार के अंदर हों या सरकार के बाहर, वे विदेश नीति की भाषा को कैसे प्रभावित कर रही हैं? और यह भारत के लिए कितना बुरा या खतरनाक है?

जवाब: उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के अंदर जो ताकतें या आवाजें इस समय सक्रिय हैं, उनमें मुझे यह दिखता है कि शेख हसीना के खिलाफ 'पॉपुलर ओपिनियन' बहुत ज्यादा है, इसमें कोई शक नहीं है। वहां के छात्र सड़कों पर आए, जिनमें कट्टरपंथी और इस्लामिक तत्व भी मिल गए, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि शेख हसीना के खिलाफ जनता में भारी रोष है।

ये तत्व अब विदेश नीति को, विशेष रूप से भारत के प्रति, प्रभावित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और कुछ हद तक वे इसमें कामयाब भी हो रहे हैं। बांग्लादेश में एक आम धारणा बन गई है कि शेख हसीना ने अपने कार्यकाल में जो भी सख्तियां या ज्यादतियां की, उनके पीछे भारत का हाथ था। उनका मानना है कि अगर भारत का समर्थन न होता, तो शेख हसीना ऐसी हरकतें नहीं कर पातीं।

इसके अलावा, शेख हसीना द्वारा 2011-12 में पुनर्जीवित किए गए 'इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल' (ICT) के तहत जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई, उनके बारे में भी यह नैरेटिव सेट किया गया है कि यह भारत के कहने पर हुआ। हालांकि वे प्रमाणित आतंकी और कट्टरपंथी थे, लेकिन वहां यही प्रचारित किया गया कि भारत के दबाव में उन्हें मरवाया गया। इन सब चीजों का मिश्रण वर्तमान में भारत के प्रति उनकी विदेश नीति को प्रभावित कर रहा है।

सवाल: भारत अब तक संयमित प्रतिक्रिया देता रहा है। क्या भविष्य में भारत को ऐसी बयानबाजी पर और सख्त कूटनीतिक रुख अपनाना चाहिए? अगर ऐसे बयान बढ़ते हैं, तो भारत के पास कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक क्या-क्या विकल्प हैं?

जवाब: रोबिंदर सचदेव ने कहा कि भारत के पास विकल्प तो काफी हैं, लेकिन ईमानदारी से देखा जाए तो स्थिति चुनौतीपूर्ण है। हमारे सामने दो मुख्य रास्ते बनते हैं। पहला है 'इग्नोर करना'। जो गैर-सरकारी लोग बयान दे रहे हैं, उन्हें नजरअंदाज किया जाए। हम उन पर जितना अधिक प्रतिक्रिया देंगे, उनकी उतनी ही साख बढ़ेगी कि वे भारत को 'प्रेशराइज' कर रहे हैं। उनका मकसद ही भारत को परेशान करना है, इसलिए गैर-सरकारी तत्वों या किसी भी जमात के छोटे नेताओं को जवाब न देना ही बेहतर है।

हमारा दूसरा विकल्प है 'कूटनीतिक जवाब'। यदि बयान बांग्लादेश सरकार की तरफ से आता है, तो हमें निश्चित रूप से कूटनीतिक तौर पर कड़ा जवाब देना चाहिए। साथ ही, हमें बांग्लादेश सरकार से यह भी कहना होगा कि वे अपने स्तर पर ऐसी गैर-सरकारी बयानबाजी को नियंत्रित करें।

हमें अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना होगा, बिना किसी 'Knee Jerk Reaction' यानी हड़बड़ाहट में दी गई प्रतिक्रिया के। हमें शायद मालदीव वाले मामले जैसी विदेश नीति अपनानी चाहिए। अभी संयम बरतना चाहिए। समय बदलता है। वर्तमान सरकार भले ही 'प्रो-पाकिस्तान' या 'प्रो-चीन' दिखे, लेकिन अगर हम धैर्य और संतुलन बनाए रखते हैं, तो वक्त के साथ चीजें वापस पटरी पर आ सकती हैं। हालांकि, बहुत ज्यादा गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी होने पर भारत का अपनी कूटनीतिक शक्ति का परिचय देना जरूरी हो जाता है। अगर हमें दिखे कि ये नॉर्थ ईस्ट के एथनिक कॉन्फ्लिक्ट को बढ़ावा दे रहे हैं तो उस केस में हमें सख्त कदम उठाने की जरूरत है।

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