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Hindi News भारत राष्ट्रीय जब भारत में पहली बार EVM से पड़े थे वोट, हारने वाला उम्मीदवार पहुंचा था सुप्रीम कोर्ट, दोबारा हुए थे चुनाव

जब भारत में पहली बार EVM से पड़े थे वोट, हारने वाला उम्मीदवार पहुंचा था सुप्रीम कोर्ट, दोबारा हुए थे चुनाव

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है। जब भारत में पहली बार ईवीएम से वोट डाले गए तो उम्मीदवार मात्र 123 वोटों से हार गया था। हारे हुए उम्मीदवार ने EVM वोटिंग को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। राष्ट्रीय मतदाता दिवस के अवसर पर जानिए ये पूरा किस्सा...

सांकेतिक तस्वीर- India TV Hindi Image Source : PTI AND INDIA TV GFX सांकेतिक तस्वीर

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) रविवार को नई दिल्ली में 16वां राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters' Day) मना रहा है। राष्ट्रीय मतदाता दिवस भारत में हर साल 25 जनवरी को मनाया जाता है। यह दिन भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्थापना की वर्षगांठ पर मनाया जाता है। चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई थी। इन 76 सालों में चुनाव में बहुत अधिक बदलाव आ गया है। पहले वोट बैलेट पेपर से होते थे, अब इनकी जगह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) ने ले ली है।

परवूर विधानसभा क्षेत्र का चुनाव

आज जब देशभर में ईवीएम पर भरोसा जताया जा रहा है, तो याद आता है वो पहला कदम जो 1982 में केरल के परवूर विधानसभा क्षेत्र में उठाया गया। मई 1982 में चुनाव आयोग ने इतिहास रचते हुए 84 मतदान केंद्रों में से 50 पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) का इस्तेमाल किया। यह देश में ईवीएम से वोट डालने का पहला आधिकारिक प्रयोग था।

मात्र 123 वोटों से रहा हार और जीत का अंतर

इस चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस के एसी जोस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के एन. शिवन पिल्लई के बीच था। नतीजे 20 मई 1982 को आए थे। पिल्लई को कुल 30,450 वोट मिले (जिनमें से 19,182 ईवीएम से और बाकी बैलट पेपर से), जबकि जोस को 30,327 वोट मिले थे। जीत का अंतर मात्र 123 वोट का था।

केरल हाई कोर्ट पहुंचा मामला

चुनावी परिणाम में मिली हार के बाद एसी जोस ने चुनाव को चुनौती दी। उन्होंने केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जहां चुनाव को वैध ठहराया गया। लेकिन जोस यहीं नहीं रुके। वह सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे और दिल्ली जाकर शीर्ष कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का किया दुरुपयोग- कोर्ट

मार्च 1984 को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच जस्टिस एम. फजल अली, ए. वरदराजन और रंगनाथ मिश्रा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि उस समय पीपुल्स रिप्रेजेंटेशन एक्ट, 1951 में ईवीएम के इस्तेमाल की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए बिना कानूनी आधार के मशीनों का प्रयोग किया।

अवैध घोषित की गई EVM से हुई वोटिंग

कोर्ट की सुनवाई का नतीजा ये रहा कि परवूर विधानसभा के उन 50 मतदान केंद्रों पर ईवीएम से हुए मतदान को अवैध घोषित कर दिया गया। कोर्ट ने आदेश दिया कि वहां बैलट पेपर से दोबारा मतदान कराया जाए। पूरे चुनाव को रद्द नहीं किया गया, लेकिन ईवीएम वाले हिस्से को अमान्य कर दिया गया, जिससे चुनाव की तस्वीर बदल गई। विधानसभा क्षेत्र में दोबारा मतदान (repoll) हुआ। उसमें एसी जोस ने जीत हासिल की थी।

1989 में EVM को माना गया वैध

सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी चुनाव आयोग पर सख्त टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 1989 में संसद ने कानून में संशोधन किया और चुनाव में ईवीएम के इस्तेमाल को वैध बनाया गया। इसके बाद 1998 में कुछ सीटों पर और 2004 में पूरे लोकसभा चुनाव में ईवीएम का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ। वहीं, आज ईवीएम से वोटिंग भारत की चुनाव प्रक्रिया का मजबूत हिस्सा है।

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