Rajat Sharma's Blog | बेज़ुबान जानवर: मीलॉर्ड, आपका आदेश ज़ुल्म का रास्ता है
मैं आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर कमेंट नहीं करता, जिसका केस है, वह बोलता है, पर अगर फैसला बेज़ुबान के खिलाफ हो, तो उनकी आवाज तो उठानी पड़ेगी। कोर्ट का आज का आदेश व्यावहारिक नहीं है, अमानवीय है।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सड़कों पर घूमने वाले रेबीज़ संक्रमित, खतरनाक आवारा कुत्तों को पकड़ पर उन्हें इंजेक्शन देकर मौत की नींद सुला दिया जाए। कोर्ट ने पशुप्रेमियों की तमाम अपीलों का खारिज करते हुए साफ कह दिया कि आवारा कुत्तों को पकड़ने को लेकर जो पुराना आदेश था, वही लागू होगा और अगर किसी को दिक्कत है, तो वह हाईकोर्ट जाए।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने कहा कि जिस तरह से देश भर में कुत्तों के काटने के मामले बढ़ रहे हैं, उसके बाद सार्वजनिक स्थानों से उन्हें हटाना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि अगर जानवरों को जीने का अधिकार है तो आम लोगों को भी कुत्तों के काटने के डर से आज़ाद रहकर जीने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स से कहा है कि अगर आवारा कुत्तों के मामले में अफसरों के खिलाफ शिकायत आती है तो उस पर तब तक विचार न करें जब तक कोई गंभीर मामला न हो।
मैं आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर कमेंट नहीं करता, जिसका केस है, वह बोलता है, पर अगर फैसला बेज़ुबान के खिलाफ हो, तो उनकी आवाज तो उठानी पड़ेगी। कोर्ट का आज का आदेश व्यावहारिक नहीं है, अमानवीय है। कल रात जब मैं हैदराबाद से लौटा तो दिल्ली एयरपोर्ट के टर्मिनल पर तीन आवारा कुत्तों को देखा, भीषण गर्मी थी, जब एयरपोर्ट का exit gate खुलता था तो वहां से ठंडी हवा आती थी, वहां पर वे तीनों बड़े आराम से लेटे थे। सैकड़ों लोग वहां से आ जा रहे थे, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। अब ऐसे आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाने का क्या मतलब है? कोई उन्हें कल आक्रामक मार डालेगा तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? कौन सा आवारा कुत्ता आक्रामक है, इसका फैसला कौन करेगा? इसलिए मुझे लगता है कि कोर्ट का आज का आदेश बेजुबान जानवरों पर जुल्म का रास्ता खोलेगा।
एनिमल एक्टिविस्ट मेनका गांधी का विचार ठीक है। अगर आवारा कुत्तों की आबादी को कम करना है तो रास्ता एक ही है। बड़े पैमाने पर नसबंदी की जानी चाहिए। अच्छा तो होगा कोर्ट इस बारे में सरकारों को युद्धस्तर पर काम करने का आदेश दे।
NEET: कॉस्मेटिक सर्जरी से कुछ नहीं होगा
NEET पेपर लीक मामले में जितने लोग मराहाष्ट्र से गिरफ्तार हुए हैं, उन सबका कनेक्शन RCC कोचिंग क्लासेस के मालिक शिवराज मोटेगांवकर से निकला। मोटेगांवकर का नेटवर्क तगड़ा था, वह डंके की चोट पर पेपर लीक कराता था, उसके कोचिंग इंस्टीट्यूट के बच्चों का सिलेक्शन ज्यादा हो रहा था, और कारोबार सौ करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया था।
कैमिस्ट्री के रिटार्यर्ड लेक्चरर पीवी कुलकर्णी ने मोटेगांवकर तक पेपर पहुंचाया। पेपर कुलकर्णी ने ही सेट किया था। पुणे के कॉलेज में बॉटनी की लेक्चरर मनीषा मंधारे भी NTA के पैनल में थी और वो अनुवाद का काम करती थी। NEET पेपर का मराठी में अनुवाद करती थी। मनीषा पंधारे ने बायोलॉजी के प्रश्न लीक किए।
मोटेगांवकर कहता था, उसके पास ईश्वर प्रदत्त शक्ति है। 3 मई को नीट परीक्षा में जब वही सवाल आये तो RCC कोचिंग सेंटर के टीचर कहने लगे कि मोटेगांवकर का भगवान से सीधा कनेक्शन है। उन्हें सपने में ही पता चल जाता है कि कौन से सवाल परीक्षा में आने वाले हैं। सरकार की कोशिश है कि कम से कम 21 जून को होने वाले रीएक्जाम में कोई गड़बड़ी न हो।
शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने चार बड़े अफसरों को NTA में तैनात किया है। लेकिन ये बीमारी इस तरह की कॉस्मेटिक सर्जरी से ठीक नहीं होगी। मेजर सर्जरी की जरूरत है। क्योंकि NEET पेपर लीक में सब कुछ है, शिक्षकों की बेईमानी और बदमाशी, कोचिंग चलाने वालों का लालच और धोखाधड़ी, NTA की नालायकी, बेकसूर छात्रों को बेबात की सज़ा, मां-बाप के पैसे और समय की बर्बादी का दर्द। हर रोज होने वाले खुलासे बताते हैं कि सब कुछ खुल्लमखुल्ला हो रहा था, किसी को पकड़े जाने का डर नहीं था। जिन्हें पहरेदारी का काम दिया गया था, वही लुटेरे बन गए। इसलिए पूरा का पूरा सिस्टम सड़ गया है। अब वक्त है कि पेपर लीक की इस बीमारी को जड़ से खत्म किया जाए।
अडानी: सारे केस खत्म हुए
अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने मान लिया है कि उद्योगपति गौतम अडानी और उनकी कंपनियों के खिलाफ कोई केस नहीं बनता, अडानी के खिलाफ अमेरिकी जांच एजेंसियों को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिसके आधार पर उनके खिलाफ केस चलाया जा सके। गौतम अडानी के ग्रुप की मार्केट वैल्यू इस खबर के बाद बढ़कर 17 लाख करोड़ रुपये हो गई। पिछले दो दिनों में अडानी ग्रुप का मार्केट कैप 1.2 लाख करोड़ रुपये बढ़ चुका है। इसकी एक ही वजह है अमेरिका में गौतम अडानी के खिलाफ सारे मामलों का बंद होना।
ये करिश्मा कैसे हुआ? अडानी के खिलाफ पहला केस था अमेरिका के निवेशकों को गुमराह करना। आरोप ये था कि अडानी ग्रुप ने भारत में सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए अमेरिकी निवेशकों से 17.5 करोड़ डॉलर की रक़म जुटाई लेकिन निवेशकों को इन प्रोजेक्ट्स की पूरी जानकारी नहीं दी। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ने अडानी के खिलाफ सिविल केस फाइल किया। चूंकि अमेरिका में सिविल सूट के मामले आउट ऑफ कोर्ट फाइनेंशियल डील से भी सेटल हो जाते हैं, इसलिए अडानी ने SEC के साथ 1.8 करोड़ डॉलर में डील की, केस को सेटल किया।
सबसे बड़ी बात ये थी कि सेटलमेंट में अडानी ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया लेकिन कानूनी लड़ाई से बचने के लिए डील कर ली। इसलिए ये केस तो यहां खत्म हो गया। चूंकि इसी केस के आधार पर डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने आपराधिक कार्यवाही शुरू की थी तो अब उस केस को आगे बढ़ाना संभव नहीं था। इसलिए डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने कोर्ट से अडानी ग्रुप के ख़िलाफ़ मामलों को हमेशा के लिए डिसमिस करने की गुज़ारिश की।
न्यूयॉर्क के कोर्ट ने गौतम अडानी और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट को with prejudice ख़ारिज करने का आदेश दे दिया। इसका मतलब ये है कि ये मामला अब दोबारा नहीं खोला जा सकेगा। ये समझना ज़रूरी है कि गौतम अडानी के खिलाफ केसेज बंद कैसे हुए। ये केसेज बंद करते समय अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने कहा कि Dismiss with prejudice इसका मतलब है कि केस बंद किए जाएं और इस तरह बंद किए जाएं कि उन्हें दोबारा खोलने की कोई गुंजाइश न बचे।
ये कैसे हुआ? अमेरिकी मीडिया में कहा गया कि अडानी ने ट्रंप के वकील को हायर किया। इसमें क्या गलत है? हर आदमी अपना केस लड़ने के लिए अच्छे से अच्छा वकील करता है। हमारे यहां भी मुकुल रोहतगी, कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वकील सब के केस लड़ते हैं। किसी ने कहा कि अडानी ने अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने का वादा किया। अमेरिका में जिनके खिलाफ केसेस नहीं चल रहे, ऐसे उद्योगपतियों ने भी अरबों डालर निवेश किए हैं।
सवाल तो ये है कि केस बंद करने वाले डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने क्या कहा। उसने कहा कि ये केस इसलिए बंद किए गए क्योंकि इनका अमेरिका से कोई लेना देना नहीं था। आरोपों को साबित करने के लिए न कोई प्रमाण था। न कोई सबूत। तो केस वापस लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इसी तरह एक और केस में गौतम अडानी का सेटलमेंट हुआ जिसमें गौतम अडानी को 1.8 करोड डॉलर देने पड़े। ये भी अमेरिका के सिस्टम में कोई नई या बड़ी बात नहीं है।
अडानी ग्रुप के खिलाफ अमेरिका में तीसरा केस था, अमेरिकी पाबंदियों के बावजूद ईरान से LPG खरीदने का। अमेरिका के ट्रैजरी डिपार्टमेंट की एजेंसी OFAC यानी ऑफ़िस ऑफ़ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल के मुताबिक़, अडानी ग्रुप ने 2023 से 2025 के दौरान दुबई के एक कारोबारी से LPG ख़रीदी थी, दुबई के कारोबारी ने अडानी को बताया था कि वो ओमान और इराक़ की LPG बेच रहा है लेकिन हकीकत में अडानी ग्रुप को बेची गई LPG ईरान से supply हो रही थी। अडानी ग्रुप ने इस LPG का भुगतान अमेरिकी वित्तीय संस्थानों से कराई थी। अमेरिका ने इस डील को ईरान पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन माना।
इस केस में भी गौतम अडानी ने बीच का रास्ता निकाला। अडानी ग्रुप ने अमेरिका को बताया कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि जो LPG सप्लाई की जा रही है, वो ईरान से आ रही है। इस मामले में अडानी ग्रुप ने OFAC के साथ डील की। 27।5 करोड़ डॉलर देकर मामले को निपटाया। इस तरह अब अमेरिका में गौतम अडानी और उनके ग्रुप के खिलाफ अब कोई केस नहीं है।
कानून के विशेषज्ञों का कहना है कि इस सेटेलमेंट के बाद, अब अडानी ग्रुप के लिए अमेरिका में कारोबार के दरवाजे भी खुल गए हैं। इन सारे मामलों में अडानी ग्रुप का कितना नुक़सान हुआ ये भी समझने की जरूरत है। 19 महीने पहले अडानी की कंपनी 19 लाख करोड़ रुपये की थी। जब अमेरिका में ये केस आए तो शेयर गिरे और वैल्यू 7.5 लाख करोड़ रुपये रह गई। यानी जो केस बाद में Withdraw कर लिया गया, उसकी वजह से एक झटके में 12 लाख करोड़ का नुकसान हुआ। किसी भी कंपनी के लिए इतना भारी नुकसान उठाना संभव नहीं होता, छवि खराब होती है वो अलग। जब मार्केट कैप घटता है तो निवेशक मुंह मोड़ लेते हैं, बैंक लोन मिलना मुश्किल हो जाता है। लेकिन गौतम अडानी घबराए नहीं। कंपनियां बंद नहीं होने दी, प्रोजैक्ट नहीं रुकने दिए। पिछले पांच साल में पांच लाख करोड़ रुपये का कैपैक्स किया, कारोबार को बढ़ाया और अब एक बार फिर कंपनी को 17 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया।
जहां तक गौतम अडानी के योगदान का सवाल है, एक उदाहरण काफी है। इस साल भारत में प्राइवेट सेक्टर का जितना निवेश हुआ है उसका 25 प्रतिशत अडानी ग्रुप ने किया है। ये बड़ी बात है। यहां बता दूं कि अमेरिका में जो केस हुए उनसे गौतम अडानी को व्यक्तिगत रूप से 88 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। तो क्या वो चुप बैठ कर तमाशा देखते? वैसे भी आज के जमाने में अमेरिका में कानूनी लड़ाई लड़ना, केस ड्रॉप करवाना, किसी चमत्कार से कम नहीं है। (रजत शर्मा)
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