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लोहडी कल: जानिए क्यों मनाते है ये पर्व और इसकी कथा

मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार का उल्लास रहता है। रात में खुले स्थान में परिवार और आस-पड़ोस के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बना कर बैठते हैं। इस समय रेवड़ी, मूंगफली, लावा आदि खाए जाते हैं। इस बार लोहड़ी 13 जनवरी, बुधबार को हैं। इस दिन सब

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एक बार जब सभी लोग मकर संक्रांति का पर्व मनाने में व्यस्त थे। कंस ने बालकृष्ण को मारने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को गोकुल में भेजा, जिसे बालकृष्ण ने खेल-खेल में ही मार डाला था।

लोहिता नामक राक्षसी के नाम पर ही लोहड़ी उत्सव का नाम रखा। उसी घटना की स्मृति में लोहड़ी का पावन पर्व मनाया जाता है। सिंधी समाज में भी मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व 'लाल लोही' के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है।

पंजाबी समुदाय़ के साथ अन् समुदाय के लोग भी इस पर्व में बढ चढ़ कर हिस्सा लेते है।  इस दिन होली की तरह ही लोहड़ी की शाम को भी लकड़ियां इकट्ठी कर जलाई जाती हैं और तिल से अग्निपूजा की जाती है। इस त्योहार का रोचक तथ्य यह है कि इस त्योहार के लिए बच्चों की टोलियां घर-घर जाकर लकड़ियां इकट्ठा करती हैं और लोहड़ी के गीत गाती हैं।

इनमें से एक गीत खूब पसंद किया जाता है। इसके पीढे भी एक पौराणिक कथा है किवदंती के अनुसार, एक ब्राह्मण की बहुत छोटी कुंवारी कन्या को जो बहुत सुंदर थी, को गुंडों ने उठा लिया। दुल्ला भट्टी ने जो मुसलमान था, इस कन्या को उन गुंडों से छुड़ाया और उसका विवाह एक ब्राह्मण के लड़के से कर दिया। इस दुल्ला भट्टी की याद आज भी लोगों के दिलों में है और लोहड़ी के अवसर पर गीत गाकर दुल्ला भट्टी को याद करते हैं।

सुंदर मुंदरिए। ...हो
तेरा कैन बेचारा, ...हो
दुल्ला भट्टी वाला, ...हो
दुल्ले धी ब्याही, ...हो
सेर शक्कर आई, ...हो
कुड़ी दे बोझे पाई, ...हो
कुड़ी दा लाल पटारा, ...हो

लोहड़ी पर्व क्योंकि मकर-संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है तथा इस त्योहार का सीधा संबंध सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से होता है। सूर्य स्वयं आग व शक्ति के कारक हैं, इसलिए इनके त्योहार पर अग्नि की पूजा तो होनी ही है। किसान इसे रबी की फसल आने पर अपने देवों को प्रसन्न करते हुए मनाते हैं।

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