दुनिया का 5वां सबसे बड़ा रेयर अर्थ भंडार भारत के पास, फिर भी चीन से खरीदनी पड़ रही सप्लाई; जानिए ऐसा क्यों?
भारत के पास रेयर अर्थ मेटल्स का खजाना इतना है कि वह दुनिया में पांचवें नंबर पर आता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद भारत को आज भी रेयर अर्थ मैग्नेट्स (REPMs) जैसी अहम सामग्रियां चीन से आयात करनी पड़ती हैं।
भारत के पास रेयर अर्थ का खजाना है। अनुमान के मुताबिक, भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रेयर अर्थ रिजर्व रखता है। ये वही तत्व हैं जिनसे इलेक्ट्रिक वाहनों, कंप्यूटरों, मोबाइल फोन और एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी जैसे हाई-टेक प्रोडक्ट बनते हैं। बावजूद इसके, भारत को आज भी चीन से इन धातुओं की सप्लाई लेनी पड़ती है। ऐसे में आपके मन में भी सवाल उठता है कि जब हमारे पास खजाना है, तो हम इसके इस्तेमाल में इतने पीछे क्यों हैं?
1950 में हुई थी शुरुआत, लेकिन कहानी अधूरी रह गई
भारत की रेयर अर्थ यात्रा की शुरुआत 1950 में हुई थी, जब सरकार ने इंडियन रेयर अर्थ लिमिटेड (IREL) की स्थापना की थी। उस समय यह एक साहसी कदम था, क्योंकि तब पूरी दुनिया को रेयर अर्थ मेटल्स की अहमियत का अंदाजा नहीं था। मगर शुरुआती दौर में मांग कम थी और IREL ने अपना ध्यान बीच की रेत से मिलने वाले दूसरे खनिजों पर केंद्रित कर लिया। इसके अलावा, कड़े नियमों और लंबी मंजूरी प्रक्रियाओं ने इस सेक्टर की रफ्तार थाम दी।
चीन के मुकाबले भारत क्यों पिछड़ा?
भारत के रेयर अर्थ खनिज ज्यादातर मोनाजाइट रेत में पाए जाते हैं, जिसमें थोरियम नामक रेडियोधर्मी तत्व भी मौजूद होता है। इससे इन खनिजों को एटॉमिक मटीरियल की कैटेगरी में रखा गया है, जिसके चलते इनके खनन और प्रोसेसिंग पर सख्त सरकारी कंट्रोल है। यही कारण है कि निजी कंपनियों की भागीदारी बेहद सीमित रही है।
IREL देश की अकेली बड़ी कंपनी है जो नियोडिमियम-प्रासियोडिमियम (NdPr) ऑक्साइड बनाती है, जो इलेक्ट्रिक मोटर्स में इस्तेमाल होने वाले रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPMs) के निर्माण में जरूरी है। लेकिन भारत की सालाना उत्पादन क्षमता लगभग 3000 टन है, जबकि चीन अकेले सालाना 2.7 लाख टन रेयर अर्थ निकालता है।
चीन की पकड़ इतनी मजबूत क्यों?
चीन ने इस सेक्टर में दशकों पहले से निवेश करना शुरू किया और अब वह दुनिया की 70% से ज्यादा रेयर अर्थ उत्पादन का कंट्रोल रखता है। भारत के पास जहां संसाधन हैं, वहां चीन के पास बेहतर तकनीक, मजबूत संसाधन और स्थिर नीतियां हैं।
IREL की चुनौतियां और उम्मीदें
विजाग (आंध्र प्रदेश) में IREL का एक आधुनिक प्लांट है, जो देश में REPMs बनाने की दिशा में अहम कदम है। लेकिन कंपनी पिछले एक साल से बिना चेयरपर्सन और मैनेजिंग डायरेक्टर के काम कर रही है। इसके बावजूद, FY24 में कंपनी ने 1012 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। सरकार ने अब इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए 7300 करोड़ रुपये की स्कीम तैयार की है, जो रेयर अर्थ प्रोसेसिंग यूनिट्स और सप्लाई चेन के विकास के लिए है।
नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन से उम्मीदें
सरकार ने अप्रैल 2025 में नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) लॉन्च किया, जिसके तहत देश में 1200 नए एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट चलाए जाएंगे। राजस्थान के सिरोही और भीलवाड़ा में नियोडिमियम जैसे रेयर अर्थ तत्वों की खोज भी शुरू हो चुकी है। इस मिशन का मकसद सिर्फ घरेलू उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि विदेशों में खनन संपत्तियां अधिग्रहित करना भी है।
