वैश्विक तनाव का असर अब भारत के निर्यात कारोबार पर साफ दिखने लगा है। पश्चिम एशिया में जारी जंग के बीच अमेरिकी खरीदारों ने भारतीय निर्यातकों के सामने नई शर्त रख दी है। अब वे 15% टैरिफ का पूरा भुगतान भारतीय कंपनियों से ही कराने पर अड़े हैं। पहले यह बोझ दोनों पक्षों के बीच बांटने की बात थी, लेकिन अब अमेरिकी कंपनियां अपने रुख से पीछे हटती नजर आ रही हैं। निर्यातकों के मुताबिक, अमेरिकी खरीदारों ने साफ कर दिया है कि जब तक 100% टैरिफ नहीं दिया जाएगा, वे भारतीय माल नहीं खरीदेंगे। इतना ही नहीं, वे यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि अगर उनकी शर्तें नहीं मानी गईं तो वे यूरोप, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से सामान मंगाएंगे। इससे भारतीय कारोबारियों पर दबाव बढ़ गया है।
कई सेक्टरों पर मंडरा रहा संकट
इस नई शर्त का सबसे ज्यादा असर लेदर, गारमेंट, हैंडीक्राफ्ट, इंजीनियरिंग और केमिकल सेक्टर पर पड़ रहा है। कानपुर, आगरा, नोएडा, वाराणसी और मुरादाबाद जैसे बड़े निर्यात केंद्रों के कारोबारी इस स्थिति को गंभीर चुनौती मान रहे हैं। इन उद्योगों में पहले से ही लागत बढ़ी हुई है, ऐसे में ज्यादा टैरिफ का बोझ उन्हें और कमजोर कर सकता है।
कारोबार पर पड़ सकता है बड़ा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर टैरिफ का पूरा भार भारतीय निर्यातकों पर डाला गया, तो उनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता घट जाएगी। इससे ऑर्डर कम हो सकते हैं और कारोबार को बड़ा नुकसान हो सकता है। भारतीय निर्यात परिषद से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि इस स्थिति में कई छोटे और मध्यम कारोबारी मुश्किल में आ सकते हैं।
यूपी के कारोबार पर सबसे ज्यादा असर
उत्तर प्रदेश से हर साल करीब 35 हजार करोड़ रुपये का निर्यात अमेरिका को होता है। नई शर्तों के कारण इस कारोबार पर सीधा असर पड़ने की आशंका है। स्थानीय निर्यातकों का कहना है कि अमेरिकी कंपनियां मौजूदा हालात का फायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर जल्द ही इस मुद्दे पर कोई समाधान नहीं निकला, तो भारत के निर्यात सेक्टर को बड़ा झटका लग सकता है। सरकार और उद्योग संगठनों को मिलकर इस चुनौती का समाधान निकालना होगा, ताकि कारोबार और रोजगार दोनों को बचाया जा सके।
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