दिल्ली में स्थित है एक ऐसी दरगाह जहां मनाई जाती है बसंत पंचमी, 700 सालों से चली आ रही परंपरा
भारत की राजधानी दिल्ली में एक ऐसी दरगाह है जहां माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर बसंत पंचमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। आज हम आपको इसी दरगाह के बारे में जानकारी देंगे।

बसंत पंचमी का त्योहार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है और इस दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा आराधना की जाती है। इस दिन हिंदू मंदिरों में धूमधाम होती है लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि इस दिन दिल्ली की एक दरगाह में भी बसंत पंचमी की रौनक देखने को मिलती है। बसंत पंचमी पर इस दरगाह में मुस्लिम धर्म के लोग पीले वस्त्र पहनते हैं और यहां उत्सव का माहौल होता है। आज हम आपको बताएंगे इस दरगाह के बारे में और उस कहानी के बारे में जिसके चलते पिछले 700 सालों से यहां बसंत पंचमी मनाई जा रही है।
बसंत पंचमी पर इस दरगाह पर होता है उत्सव
दिल्ली की वह दरगाह जहां बसंत पंचमी का उत्सव मनाया जाता है वो है हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर हर साल उत्सव मनाया जाता है और हिंदू-मुस्लिम मिलकर यहां बसंत पंचमी मनाते हैं। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर बसंत पंचमी मनाने की शुरुआत आज से 700 साल पहले हुई थी। इसके पीछे की कहानी भी बेहद रोचक है।
इसलिए हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर मनाया जाता है बसंत पंचमी का त्योहार
निजामुद्दी दरगाह पर बसंत पंचमी मनाने के पीछे की कहानी एक भावुक घटना से जुड़ी है। दरअसल इस कहानी के मुख्य पात्र हजरत निजामुद्दीन और उनके प्रिय शिष्य अमीर खुसरो हैं। एक बार की बात है कि हजरत निजामुद्दीन के भांजे की मृत्यु हो गई और हजरत साहब गम में डूब गए। हजरत निजामुद्दीन को देखकर उनके शिष्य अमीर खुसरो भी परेशान हो रहे थे। एक दिन शिष्य ने देखा कि हिंदू लोगों की टोली पीले कपड़े पहनकर नाचते-गाते हुए बसंत पंचमी का त्योहार मना रही है। तब अमीर खुसरो ने सोच की बसंत पंचमी का यह उल्लास उनके गुरु के उदास मन में भी नई तरंगें भर सकता है।
इसके बाद अमीर खुसरो ने भी पीले वस्त्र धारण किए और हाथों में पीले फूल लेकर गाते हुए उन्होंने एक जुलूस निकाला। बसंत पंचमी के उल्लास के साथ अमीर खुसरो अपने गुरु हजरत निजामुद्दीन के पास पहूंचे और उनके चरणों में फूल अर्पित कर दिए। यह देखकर हजरत निजामुद्दीन की आंखें भर आईं। कुछ समय बाद उन्हें अपने शिष्य के द्वारा किए गए इस कार्य के पीछे की वजह समझ आई और उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने अपने शिष्य के प्रेम को स्वीकृति दी और खुद भी बसंत पंचमी के उत्सव में शामिल हो गए। माना जाता है कि तभी से हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर हर वर्ष बसंत पंचमी का उत्सव मनाया जाता है। यह दरगाह बसंत पंचमी के मौके पर हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश करती है।
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