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कृषि मंत्री ने यूरोपीय संघ के समक्ष भारत की बासमती चावल निर्यात संबंधी चिंताओं को उठाया

यूरोपीय संघ ने धान की फसल को 'ब्लास्ट' नामक बीमारी से बचाने के लिए भारत में इस्तेमाल होने वाले कवकनाशी ट्राईसाइक्लाज़ोल के अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) में कटौती की है।

India TV Paisa Desk India TV Paisa Desk
Published on: July 08, 2021 7:22 IST
बासमती चावल पर...- India TV Paisa
Photo:PTI

बासमती चावल पर यूरोपियन यूनियन के फैसले पर जताई चिंता

नई दिल्ली। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बुधवार को यूरोपीय कृषि आयुक्त जे वोज्शिचोवस्की के समक्ष ट्राईसाइक्लाजोल के लिए यूरोपीय संघ की अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) तय करने को लेकर चिंता जताई। इसके कारण भारत का बासमती चावल निर्यात प्रभावित हो रहा है। एक सरकारी बयान में कहा गया है कि इस ऑनलाइन बैठक में, दोनों ने यूरोपीय संघ की साझा कृषि नीति के साथ-साथ भारत में हाल ही में किए गए बाजार सुधारों पर चर्चा की। यूरोपीय संघ ने धान की फसल को 'ब्लास्ट' नामक बीमारी से बचाने के लिए भारत में इस्तेमाल होने वाले कवकनाशी ट्राईसाइक्लाज़ोल के अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) में कटौती की है। इसने बासमती चावल निर्यातकों को मुश्किल में डाल दिया है। कृषि से संबंधित अन्य मुद्दों के अलावा, तोमर ने बैठक में चावल की फसल में इस्तेमाल होने वाले ट्राईसाइक्लाज़ोल के अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) को ठीक करने का मुद्दा भी उठाया, जो भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। यह यूरोपीय संघ को भारत के बासमती चावल के निर्यात को प्रभावित कर रहा है। 

कृषि मंत्री ने कहा, ‘‘सभी आवश्यक अध्ययन और दस्तावेज मई -2021 में यूरोपीय संघ को दे दिये गए हैं और अधिकतम अवशेष सीमा अगले सत्र से पहले वर्ष 2022 की दूसरी तिमाही तक तय किया जाएगा । तब तक के लिए, इस मुद्दे को अन्य उपायों के माध्यम से सुलझाया जा सकता है।’’ बयान के अनुसार यूरोपीय कृषि आयुक्त ने बैठक में कहा कि इस तरह के मुद्दे उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने ‘‘भारतीय पक्ष को यूरोपीय आयोग में अपने संबंधित सहयोगियों के साथ मुद्दों को उठाने का आश्वासन दिया।’’ उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यूरोपीय संघ ने वर्ष 2030 तक यूरोपीय संघ के 25 प्रतिशत क्षेत्र को जैविक खेती के तहत लाने का लक्ष्य रखा है। केंद्रीय कृषि मंत्री ने भारत के कृषि परिदृश्य के बारे में बताया और किसानों की आय को बढ़ावा देने के लिए किए गए कई उपायों के बारे में जानकारी दी। इसमें 1,00,000 करोड़ रुपये के कोष के साथ कृषि-इन्फ्रा फंड का निर्माण और छोटे और सीमांत किसानों की उनके कृषि उपज के विपणन में मदद के लिए 10,000 एफपीओ (कृषि उत्पादक संगठन) के गठन जैसी योजनाएं शामिल हैं। 

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