मुंबई में समंदर के किनारे पड़े पत्थर कहां से आए हैं, इनका क्या काम है; जवाब हैरत में डाल देगा
Interesting Facts : सोशल मीडिया पर आपने समुद्र से जुड़े कई अनोखे तथ्य पढ़े होंगे। मगर, आज हम आपको मुंबई के समंदर से जुड़े कुछ अनोखे फैक्ट बताएंगे।

Interesting Facts : जब भी आप कभी मुंबई गए होंगे तो वहां का मरीन ड्राइव तो देखा ही होगा। मरीन ड्राइव मुंबई की उन जगहों में शामिल है जहां पर सुबह से लेकर शाम तक लोगों की भीड़ लगी रहती है। 3.6 किलोमीटर लंबी इस जगह पर आप लोगों को समुद्र के किनारे साइकिल चलाते हुए और कुछ को मीलों दौड़ते हुए देख सकते हैं। जहां कुछ लोग यहाँ नियमित रूप से जॉगिंग करते हैं, वहीं कई नागरिक केवल समुद्र के किनारे सूर्यास्त देखने के लिए इस जगह पर आते हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो यहां पर आने के बाद हर किसी को लगता है मानो वक्त थोड़ी देर के लिए ठहर गया हो। इस जगह की एक खास बात ये भी है कि यहां पर समंदर किनारे बड़ी संख्या में बड़े—बड़े कंक्रीट के पथर पड़े रहते हैं। ये देखकर हर बाहरी शख्स सोच में पड़ जाता है कि आखिर इतने पत्थर आए कहां से हैं और इनका काम क्या है ? आज हम आपको बताएंगे कि मुंबई में मरीन ड्राइव के किनारे पड़े पत्थर कहां से आए हैं ?
क्यों फेमस है मरीन ड्राइव
मुंबई का मरीन ड्राइव स्थानीय लोगों, पर्यटकों और आस-पास के शहरों के निवासियों का केंद्र है। यहां रुकने के बाद लोगों को के मनमोहक दृश्यों में डूबने का अवसर मिलता है। मरीन ड्राइव पर मुंबई मैराथन, गणेश विसर्जन, और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है। यह 1940 में निर्मित एक ऐतिहासिक सड़क (आधिकारिक नाम: नेताजी सुभाष चंद्र बोस रोड) है, जो अपनी सुव्यवस्थित संरचना के लिए जानी जाती है। यहां से डूबते सूरज को देखना मुंबईकर और पर्यटकों के लिए एक यादगार अनुभव है।
मरीन ड्राइव में पड़े पत्थर और उनका काम
मुंबई मरीन ड्राइव के किनारे जिन चार पैर वाले पत्थरों को आप देखते हैं उन्हें 'टेट्रापॉड्स' कहा जाता है। फेसबुक पर @Aneeshspeaks नामक हैंडल से शेयर किए गए वीडियो के मुताबिक, मरीन ड्राइव के किनारे वर्षों से पहरा देते आ रहे 12,000 से अधिक टेट्रापोड्स तटरेखा पर फैले हुए हैं।
ये सैरगाह और आसपास की इमारतों को कटाव और लहरों से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इनका पहली बार उपयोग 1940 के दशक के अंत में फ्रांस में किया गया था।
कैसे काम काम करते हैं टेट्रापॉड्स
आपको बता दें कि, टेट्रापॉड कंक्रीट के भारी ब्लॉक होते हैं जिनमें चार पैर बाहर निकले होते हैं। इन्हें आपस में जुड़े हुए लेकिन छिद्रयुक्त पैटर्न में व्यवस्थित किया जाता है ताकि लहरों की गति धीमी हो जाए और उनका बल फैल जाए, जिससे तेज ज्वार से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। प्रत्येक टेट्रापॉड का वजन लगभग दो टन हो सकता है, और कभी-कभी 10 टन तक भी हो सकता है। इनकी अनोखी डिज़ाइन की वजह से पानी ठोस दीवार से टकराने के बजाय इनके चारों ओर से बह जाता है, जिससे तट पर लहरों का प्रभाव कम हो जाता है। इनके आपस में जुड़े होने से तूफ़ानों के दौरान भी ये स्थिर रहते हैं।
मुंबई कब पहुंचे ये टेट्रापॉड्स
मरीन ड्राइव पर बने इन टेट्रापॉड्स को सबसे पहले 1990 के दशक के अंत में दक्षिण मुंबई की रक्षा के लिए स्थापित किया गया था। बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने मरीन ड्राइव के किनारे बने पुराने चबूतरे (टेट्रापॉड) को बदलने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। दावा किया जाता है कि, मौजूदा चबूतरे 1960 से 1965 के बीच लगाए गए थे और 1982 से 2002 के बीच आंशिक रूप से बदले गए थे। ये एम20 ग्रेड सीमेंट से बने थे और इनकी जीवन अवधि लगभग 40 वर्ष थी। अब यह अवधि समाप्त हो चुकी है। पिछले कई सालों में प्राकृतिक हलचल से कुछ चबूतरे क्षतिग्रस्त हो गए थे और तटीय सड़क परियोजना के दौरान अन्य को हटाना पड़ा था।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी सोशल मीडिया और रिपोर्ट्स में किए गए दावों पर आधारित है। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।
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