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Hindi News भारत राष्ट्रीय Rajat Sharma's Blog: क्या अफगान सेना के प्लेन, ड्रोन और तमाम हथियार तालिबान के कब्ज़े में हैं?

Rajat Sharma's Blog: क्या अफगान सेना के प्लेन, ड्रोन और तमाम हथियार तालिबान के कब्ज़े में हैं?

अफगान सेना के जिन हथियारों के जखीरे तालिबान के हाथ लग सकते हैं उनमें M16A4 असॉल्ट राइफल और M240 मीडियम मशीनगन शामिल हैं।

Rajat Sharma Blog, Rajat Sharma Blog on Taliban, Rajat Sharma Blog on Taliban Weapons- India TV Hindi Image Source : INDIA TV India TV Chairman and Editor-in-Chief Rajat Sharma.

आज मैं आपके साथ अफगान फौज के पास मौजूद उन हथियारों और जंगी साजो-सामान के ज़खीरे का ब्योरा साझा करना चाहता हूं, जो तालिबान के हाथों में पड़ने का पूरा अंदेशा है। भारत में जो लोग ‘साफ्ट’ और ‘मॉडर्न’ तालिबान के मुरीद बन रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि अगर तालिबान के कब्जे में वे हेलीकॉप्टर, टैंक, तोप, राइफल और रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड आ जाते हैं जो अमेरिका ने अफगान सेना को दिए थे, तो यह नया तालिबान और भी ज्यादा खतरनाक रूप में सामने आ सकता है।

यह नया तालिबान 20 साल पहले वाले तालिबान से ज्यादा खतरनाक, ज्यादा खूंखार और ज्यादा घातक है। इस नए तालिबान के लड़ाके मोटरसाइकिल पर मशीनगन लेकर नहीं चलते। आपने देखा होगा कि अब तालिबान के लड़ाके अमेरिका में बनी हमवीज़ में घूम रहे हैं और उनके हाथों में ऑटोमैटिक अमेरिकन राइफल हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अफगान सेना के घुटने टेकने के बाद 2,000 से ज्यादा बख्तरबंद गाड़ियां तालिबान के हाथ लगने का अंदेशा है। इनके अलावा हमवीज़, यूएच-60 ब्लैक हॉक्स, ए-29 सुपर टुकानो स्काउट अटैक हेलीकॉप्टर और स्कैनईगल मिलिट्री ड्रोन समेत लगभग 40 विमानों पर भी तालिबान का कब्जा होने का अंदेशा है।

2003 से 2016 तक अमेरिका ने अफगान सेना को 208 प्लेन दिए थे, जिनमें से 40 से 50 प्लेन को अफगान पायलट तालिबान से बचाकर उज्बेकिस्तान ले गए। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इनमें से कई हेलीकॉप्टर अत्याधुनिक हैं, जिन्हें लगातार रखरखाव की जरूरत होती है और उचित प्रशिक्षण के बिना  कोई पालट इन्हें उड़ाया नहीं सकता।

अफगान सेना के जिन हथियारों के जखीरे तालिबान के हाथ लग सकते हैं उनमें M16A4 असॉल्ट राइफल और M240 मीडियम मशीनगन शामिल हैं। तालिबान लड़ाके इनमें से कुछ राइफलों को अफगानिस्तान के शहरों की सड़कों पर गश्त लगाते वक्त शान से दिखा रहे हैं।

पिछले 2 दशकों में अफगान सेना को खड़ा करने और हथियारों से लैस करने के लिए लगभग 83 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च किए गए थे। अमेरिकी सरकार के अकाउंटेबिलिटी ऑफिस (हमारे CAG की तरह) के मुताबिक, अमेरिका ने अफगान सेना को 75,000 से ज्यादा वाहनों के साथ-साथ लगभग 6 लाख हथियार, 1,60,000 कम्युनिकेशन इक्विपमेंट और 200 से ज्यादा विमान दिए। इनमें से ज्यादातर हथियार और इक्विपमेंट तालिबान के हाथ लग सकते हैं।

तालिबान के पास पहले से ही एके47, एके56 राइफलें और रॉकेट से चलने वाले ग्रेनेड थे, लेकिन अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद अफगान सैनिकों द्वारा छोड़े गए हथियारों का एक बड़ा जखीरा उसके हाथ लग सकता है। इनमें अमेरिका की ओर से अफगान सेना को दी गई एम4 कार्बाइन और एम16 असॉल्ट राइफल शामिल हैं।

अमेरिका ने अफगानिस्तान को इस साल अप्रैल से जुलाई तक हथियारों की बिल्कुल नई खेप दी थी। इन हथियारों में लगभग 10 हजार एक्सप्लोसिव रॉकेट्स, 40 एमएम के 61 हजार एक्सप्लोसिव राउंड्स, पॉइंट 5 कैलिबर की 9 लाख गोलियों के साथ करीब 21 लाख और गोलियां शामिल हैं। ये सारे हथियार तालिबान से लड़ने के लिए अफगान सेना को दिए गए थे। लेकिन अब इनमें से अधिकांश हथियार तालिबान के हाथ लग सकते हैं। इन में 60, 82 और 120 एमएम के मोर्टार के साथ-साथ 19 ऐसे हथियार शामिल हैं जिनके निर्माताओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है। तालिबान के पास 25 हजार से ज्यादा ग्रेनेड लॉन्चर्स भी हैं।

अमेरिका ने कुछ हफ्ते पहले ही अफगान नेशनल डिफेंस और सिक्योरिटी फोर्स को 174 हाई मोबिलिटी मल्टी पर्पज व्हीकल्स दिए थे। इन्हें वॉरफेयर की भाषा में ‘हमवीज’ (Humvees) कहा जाता है। अफगान सेना के पास पहले से ही 303 हमवीज मौजूद थीं, जिनमें से 41 को तालिबान ने लड़ाई के दौरान नष्ट कर दिया था। माना जा रहा है कि फोर्ड रेंजर नाम के 256 मिलिट्री व्हीकल्स पर भी तालिबान का कब्जा हो चुका है। तालिबान के लड़ाके उन ट्रकों में घूमते हुए देखे गए हैं, जिनमें कुछ दिन पहले तक अफगान आर्मी का मूवमेंट होता था। तालिबान के पास नेवीस्टार इंटरनेशनल की मॉडर्न सीरीज वाले 133 ट्रक और 20 से ज्यादा M 117 आर्मर्ड व्हीकल्स भी आ चुके हैं जो अमेरिकी सेना ने अफगान आर्मी को दिए थे। कुल मिलाकर तालिबान के पास एक हजार से ज्यादा बख्तरबंद गाड़ियां आ चुकी हैं।

अफगानिस्तान की सेना के पास T-54 और T-62 सीरीज के कुल 40 से ज्यादा टैंक थे। माना जा रहा है कि ये सारे के सारे टैंक अब तालिबानियों के कब्जे में आ चुके हैं, हालांकि अभी इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। ये टैंक चीन ने अफगानिस्तान को दिए थे। अफगानिस्तान के पास 60 और मिलिट्री हाई ग्रेडेड व्हीकल्स थे, जिनमें से 9 नष्ट हो चुके हैं और बाकी के 51 अफगान सेनाओं के पास थे। अमेरिका ने अफगान सेना को 20 MaxxPro MRAP (माइन रेसिस्टैंट एम्बुश प्रोटेक्टेड) दिए थे, जिन्हें अमेरिकी कंपनी नेवीस्टार ने डिजाइन किया था। बैलिस्टिक हथियारों के हमले और माइन ब्लास्ट इनका बाल भी बांका नहीं कर सकतीं। तालिबान के हाथ ये माइन प्रोटेक्टेड व्हीकल्स भी लग सकते हैं।

इतना ही नहीं पहाडों की ऊंची चोटी पर भी कारगर माउंटेन डिविजन गन और होवित्जर तोप भी तालिबान के पास हैं। तालिबान के पास 76 एमएम वाली 3 डिविजन तोपें हैं। इनके साथ-साथ 132 एमएम वाली 35 होवित्जर तोपें भी थीं। कुल मिलाकर तालिबान के पास 775 तोपें हैं। भारत ने अफगान सेना को Mi-24 हेलीकॉप्टर दिए थे। लेकिन अब ये तालिबान के किसी काम के नहीं हैं क्योंकि कुंदुज की लड़ाई के बाद अफगान आर्मी ने इनमें से कई हेलीकॉप्टरों के अधिकांश हिस्से निकाल लिए थे। तालिबान के लड़ाके इनके साथ सिर्फ फोटो और सेल्फी खींचकर एंजॉय कर सकते हैं।

अफगान एयर फोर्स के पास 45 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर, 50 एमडी-530s और 56 एमआई-17 हेलीकॉप्टर थे। काबुल पर तालिबान का कब्जा होने के पहले अफगान एयर फोर्स के पास C-130J सुपर हरक्यूलिस ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, C-208 यूटिलिटी एयरक्राफ्ट, और AC-208 फिक्स्ड विंग एयरक्राफ्ट के अलावा Mi-35 हेलीकॉप्टर थे, जिनकी कीमत हजारों करोड़ रुपये थी। कुल मिलाकर अफगान वायु सेना के पास 211 एयरक्राफ्ट थे, जिनमें से 30 जून तक केवल 167 ही काम लायक थे। जंग के दौरान तालिबान ने 23 विमानों और 7 हेलीकॉप्टरों को बर्बाद कर दिया। इसका मतलब ये हुआ कि अभी भी 160 विमान और हेलिकॉप्टर अच्छी हालत में हैं।

तालिबान अब विदेश भाग चुके अफगान पायलटों से बार-बार अपने वतन लौटने की अपील कर रहा है। उसके पास एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर चलाने के लिए अच्छे प्रशिक्षित पायलट नहीं हैं। जहां तक अटैक हेलीकॉप्टर और एयरक्राफ्ट की बात है, तो मेरी जानकारी के मुताबिक इनमें से ज्यादातर ताजिकिस्तान के एयर बेस पर चले गए हैं और सुरक्षित हैं।

किसी ने ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि अत्याधुनिक हथियारों से लैस अफगान सेना और वायुसेना तालिबान के सामने इतनी जल्दी घुटने टेक देगी। अफगान सेना के पास 6 अमेरिकी स्कैनईगल ड्रोन थे। यह बहुत चिंता की बात है। स्कैनईगल ड्रोन रेकी कर सकते हैं, और  हमले को अंजाम देने के बाद वापस आ सकते हैं, ये 150 किमी प्रति घंटे की तेज रफ्तार से 24 घंटे बिना रुके उड़ान भर सकते हैं। एक स्कैनईगल ड्रोन की कीमत 40 लाख अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 30 करोड़ रुपये है।

तालिबान के कब्जे में कंधार, काबुल, न्यू एंटोनिक, कैंप लिंकन और अन्य सैनिक ठिकानों को मिलाकर कुल 11 मिलिट्री बेस हैं। बगराम का सबसे बड़ा एयरबेस भी अब तालिबान के पास है। अगर ये हेलीकॉप्टर, अटैक एयरक्राफ्ट और स्कैनईगल ड्रोन तालिबान के कब्जे में आ जाते हैं तो वह जल्द ही पंजशेर घाटी में लड़ाई शुरू कर सकता है, जो अब तक अहमद मसूद और उनकी सेना के नियंत्रण में है। अफगान सेना के पास कुल 2086 ट्रक, सैन्य वाहन और जीपें थीं। इनमें से 106 को तालिबान ने बम से उड़ा दिया। 1980 ट्रक, सैन्य वाहन और जीप उनके कब्जे में हैं। इसके अलावा 6 फ्रंट स्किड लोडर, 2 बुलडोजर, 1 एक्सावेटर और एक एयरपोर्ट कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट भी तालिबान के कब्जे में है।

मैंने कुछ इंटरनेशनल रिपोर्ट्स देखी हैं जिनमें दावा किया गया है कि तालिबान के पास 2 लाख करोड़ रुपये की कीमत के हथियार आ चुके हैं। मेरी समझ में ये नहीं आता कि अमेरिका के रणनीतिकार इस बात का अंदाजा क्यों नहीं लगा पाए कि हथियारों का ये बड़ा जखीरा तालिबान के हाथ भी लग सकता है। और जब एक बार तालिबान के हाथ में इतनी बड़ी मात्रा में अत्याधुनिक हथियार आ जाएंगे तो वह पूरी दुनिया के लिए खतरा बन सकता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन से पूछा जा रहा है कि इतनी बड़ी खुफिया विफलता कैसे हुई। अफगान वॉर के एक्सपर्ट कहते है वहां से सेना हटाने की टाइमिंग भी गलत थी। अप्रैल से अक्टूबर अफगानिस्तान में 'जंग का मौसम' होता है, और इन महीनों के दौरान कोई भी सेना वापसी की सोच भी नहीं सकती। जाड़ों में जब बर्फ पड़ती है तो तालिबान के लड़ाके अपने अड्डों में घुसने को मजबूर हो जाते हैं, वे बाहर नहीं निकल सकते। कड़ाके की ठंड में तालिबान के लिए जंग लड़ना या इतनी बड़ी संख्या में हथियारों पर कब्जा करना काफी मुश्किल होता।

आज हालत ये है कि अमेरिका को अफगानिस्तान में फंसे अपने नागरिकों को निकालना मुश्किल हो रहा है। 20 साल तक जिन अफगानों ने अमेरिका का साथ दिया उनकी जिंदगी खतरे हैं। इतनी बड़ी संख्या में हथियारों से हाथ धोना न केवल अमेरिका के लिए एक बड़ी नाकामी है, बल्कि परोक्ष रूप से रूस, ईरान और चीन के लिए एक बड़ी रणनीतिक जीत है। अब मध्य एशिया में इन तीनों देशों का दबदबा बढने की संभावना है।

अमेरिका के आम नागरिक पूछ रहे हैं कि अगर 20 साल बाद अफगानिस्तान को तालिबान से लेकर वापस तालिबान को ही देना था तो फिर 2500 अमेरिकी सैनिकों की बलि चढ़ाने की क्या जरूरत थी? अफगान फौज के लिए हथियारों और उपकरणों पर अरबों डॉलर खर्च करने की क्या जरूरत थी? आज अफगानिस्तान में जो मौत का तांडव हो रहा है उसके लिए सारी दुनिया के लोग अमेरिका को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। (रजत शर्मा)

देखें: ‘आज की बात, रजत शर्मा के साथ’ 19 अगस्त, 2021 का पूरा एपिसोड

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