अरुण जेटली: मेरे मित्र, मेरे आदर्श, मेरे मार्गदर्शक
अरुण जेटली मेरे लिए सिर्फ नेता नहीं थे, मेरे दोस्त थे, दोस्त से ज्यादा मेरे मार्गदर्शक थे, अच्छे बुरे वक्त में। हर स्थिति में साथ रहने का अहसास दिलाने वाले गाइड थे।

वकालत
1977 में अरुण जेटली ने कानून की पढाई पूरी की। चूंकि उनके पिता दिल्ली के जाने माने वकील थे इसलिए वो पिता के साथ प्रैक्टिस करने लगे। उस वक्त भी मेरा जेटली का साथ नहीं छूटा। हम अक्सर उनके घर जाते थे, उनके घर में ही खाना होता था और देश के सियासी माहौल पर चर्चा। जेटली वकालत के साथ साथ राजनीति में भी कदम बढ़ा रहे थे। दिल्ली में ABVP के अध्यक्ष थे और ABVP के अकिल भारतीय सचिव भी। 1980 में बीजेपी का जन्म हुआ, अरुण जेटली को दिल्ली बीजेपी का सचिव बनाया गया। उसके बाद बाइस साल तक लगातार पार्टी का काम करते रहे। बीजेपी के प्रस्ताव ड्राफ्ट करते रहे, रणनीति बनाते रहे लेकिन न लोकसभा के सदस्य बने, न राज्यसभा के। लेकिन उन्होंने कभी भी पद और प्रतिष्ठा पर ध्यान ही नहीं दिया। उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनके पास कोई पद है या नहीं।वो सिर्फ पार्टी के लिए काम करना चाहते थे और आखिरी वक्त तक करते रहे।
मल्टी टास्किंग
अरुण जेटली जैसे मल्टी टास्किंग मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं देखा। जेटली पार्टी का काम भी करते थे, वकालत करते थे, मीडिया के लिए आर्टिकल लिखते थे, क्रिकेट में पूरी दिलचस्पी रखते थे, क्रिकेट के प्रशासक थे, फिल्में देखते थे, पुराने गाने सुनते थे, साहिर लुधियानवी हो या शकील बदायूनी, उनकी शायरी की एक एक लाइन उन्हें याद थी। गोपाल दास नीरज की कविता सुना देते थे। अरुण जेटली को खाने का शौक था। देश के किस कोने में कौन-सा खाना कहां अच्छा मिलता है, किसका रोगन जोश सबसे अच्छा है, किसके चिकन विंग्स सबसे अच्छे हैं, कबाब कौन अच्छे बनाता है और दाल कहां की बेहतरीन होती है- अरुण जेटली को एक एक जगह, एक-एक कोना मालूम था। थोड़े दिन पहले की बात है जब वो वित्त मंत्री थे। मैं उनके साथ उनके दफ्तर में लंच कर रहा था। उन्होंने मुझसे अचानक पूछा कि बताओ सबसे अच्चा रोगन जोश कहां मिलता है। मैंने जवाब दिया, मैं एक शाकाहारी हूं, मुझे कैसे पता चलेगा। अरुण ने कहा- मोती महल में सबसे अच्छा मिल सकता है, और उससे भी अच्छा अपने घर पर। अरुण जेटली के दोस्त, परिवार वाले और पार्टी के नेता सब उनके खाने के शौक के बारे में जानते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी जेटली के इस शौक को अच्छी तरह जानते थे। जब 'आप की अदालत' शो के इक्कीस साल हुए, बड़ा प्रोग्राम हुआ, अरुण जेटली सामने बैठे थे., नरेन्द्र मोदी मंच पर पहुंचे तो मोदी ने पूछा कि कैसे दोस्ती है आप लोगों की? एक को खाने का शौक और दूसरा खाने से पहले सौ बार सोचता है।
सबसे कम उम्र के महाधिवक्ता
अरुण जेटली प्रतिभा के धनी थे, आकर्षक व्यक्तित्व था, कुशल वक्ता थे, हर विषय पर पकड़ थी, गहरी जानकारी थी, इसलिए हर कोई उन्हें पसंद करता था। जेटली दिल्ली हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट में बड़े बड़े केस लड़ रहे थे। उम्र सिर्फ पैंतीस साल थी। उस वक्त अरुण जेटली को दिल्ली हाईकोर्ट ने सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया था लेकिन ये तो अरुण जेटली के लिए सिर्फ एक छोटा सा पड़ाव था। वो मेहनत से पीछे नहीं हटते थे, केस की स्टडी करते थे, हर बारीकी को देखते थे। जेटली की खूबी ये थी कि वो केस की बात करते वक्त परिवार की बात कर लेते थे, खाने के बारे में पूछ लेते थे, क्रिकेट को डिस्कस कर लेते थे, सामने वाले को लगता था कि वो उसकी बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, लेकिन जब बात खत्म होती थी, तो वे सवाल पूछना शुरू करते थे। तब समझ में आता था कि केस की एक-एक बारीकी उन्हें पता है। एक वक्त में कई सारे काम एक साथ करना उनकी बड़ी खूबी थी, इसीलिए वो देश के सबसे सफल वकील बने। चाहते तो चार-पांच केस लड़ते और एक करोड़ रुपया रोज कमा सकते थे लेकिन ज्यादातर केस वो फ्री में लड़ते थे और जिस दिन मौका लगा करोड़ों की कमाई छोड़ने का, उन्होंने एक मिनट भी नहीं सोचा, क्योंकि राजनीति उनका पहला पैशन (जुनून) थी। जब वह प्रतिपक्ष के नेता बने तो उन्होंने वकालत छोड़ दी। जेटली ने इतनी कम उम्र में बड़ी-बड़ी सफलताएं हासिल की। आप अरुण जेटली की काबलियत का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि जब वो सिर्फ 37 साल के थे, उस वक्त देश के एडिशनल सॉलीसिटर जनरल बन गए थे। ये अपने आप में एक रिकॉर्ड है। 1989 में वीपी सिंह की सरकार बनी। वीपी सिंह ने अरुण जेटली को सॉलीसिटर जनरल बनाया। बोफोर्स केस अरुण जेटली ने लड़ा, और सिर्फ अदालत में नहीं लड़ा, इस केस को जनता की अदालत में ले गए। इसके बाद कांग्रेस का क्या हाल हुआ, वो इतिहास है।