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Hindi News भारत राष्ट्रीय EXCLUSIVE: मिसाइल, ड्रोन और AI हथियारों में कितना आत्मनिर्भर बन पाया भारत? परेड में इन्हें देखने से पहले एक्सपर्ट से जानिए एक-एक बात

EXCLUSIVE: मिसाइल, ड्रोन और AI हथियारों में कितना आत्मनिर्भर बन पाया भारत? परेड में इन्हें देखने से पहले एक्सपर्ट से जानिए एक-एक बात

भारत अब सिर्फ हथियार खरीदता नहीं, बल्कि खुद उसे डेवलप भी कर रहा है। लेकिन इसमें हम पूरी तरह आत्मनिर्भर कब बनेंगे, इसको लेकर INDIA TV ने मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के सीनियर फेलो डॉक्टर राजीव कुमार नारंग से खास बातचीत की।

India indigenous weapons- India TV Hindi Image Source : PTI भारत का सबसे खतरनाक स्वदेशी हथियार कौन?

Indian Defence Technology: भारत की ताकत परखने की हिमाकत जब दुश्मन करता है, तो उसको महज हथियार नहीं, बल्कि भारत की सोच से भी टक्कर लेनी पड़ती है। भारत आज सिर्फ हथियार खरीदने वाला नहीं, बल्कि अपने हथियार खुद डिजाइन करने वाला देश बन चुका है। हम खुद उसे डेवलप कर रहे हैं और साथ ही दुनिया को ये मैसेज भी दे रहे हैं कि हमको हल्के में मत लेना। भारत के पास आखिर वो कौन से स्वदेशी हथियार हैं, जिनका नाम सुनते ही दुश्मनों की रणनीति पर पानी फिर जाता है? हाइपरसोनिक मिसाइल LR-AShM मैक 10 से ब्रह्मोस और पिनाका तक, ड्रोन वॉरफेयर से रोबोटिक्स और AI तक भारत की सैन्य क्षमता किस दिशा में तेजी से बढ़ रही है? और क्या सच में हमारी सेना के पास ऐसा कोई हथियार है, जिसका जवाब आज दुनिया के पास नहीं है? इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए INDIA TV ने मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के सीनियर फेलो और रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन डॉक्टर राजीव कुमार नारंग से एक्सक्लूसिव बात की।

सवाल- भारत के कौन-कौन से स्वदेशी हथियार हैं जिनसे हमारे दुश्मनों को बचकर रहना चाहिए? हिमाकत करने से बाज आना चाहिए।

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा कि भारत अब अपने हथियारों को खुद डिजाइन और डेवलप करने की स्थिति में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, हमने अपने हेलिकॉप्टर्स बनाए हैं। हालांकि ये सीधे तौर पर कॉम्बैट वेपन नहीं हैं, लेकिन ये लॉजिस्टिक सप्लाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और इन्होंने विदेश पर हमारी निर्भरता कम की है। जब हमने 'एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर' (ALH) बनाना शुरू किया था, तो लगभग 30 साल लगे थे। लेकिन सीखने की प्रक्रिया के बाद, जब हमने 'लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर' (LCH) बनाया, तो उसमें करीब 15 साल लगे। विकास का पहला चरण मुश्किल था और लर्निंग स्लो थी, लेकिन एक बार जब हमने उस थ्रेशोल्ड को पार कर लिया, तो विकास तेज हो गया।

उन्होंने बताया कि यही स्थिति 'लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' (LCA) के साथ है; पहले समय ज्यादा लगा, लेकिन अब LCA-2 के विकास में, अगर बाहरी देशों ने बाधा नहीं डाली, तो यह बहुत तेजी से होगा। इसी तरह लैंड सिस्टम्स में ATAGS गन, 'पिनाका' और कई अनमैन्ड सिस्टम्स व ट्रेनर बन रहे हैं। यह एक ऊपर की ओर जाती हुई ट्रेजेक्टरी है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि भारत को दुनिया की 'लो वैल्यू, लो टेक्नोलॉजी असेंबली लाइन' नहीं बनना चाहिए, बल्कि हमें 'ओरिजिनल रिसर्च' करनी चाहिए ताकि हम यहीं तकनीक डिजाइन और विकसित कर सकें।

राजीव कुमार नारंग ने कहा, '2015 का मेक इन इंडिया पर जो उनका बयान है, वो इस दिशा में मार्गदर्शक है। तपस प्रोग्राम, नेवल फाइटर LCA, कावेरी इंजन, रुस्तम-1 (शॉर्ट रेंज UAV) जैसे प्रोजेक्ट्स में हम 70-90% स्तर पर हैं। हमें स्पाइरल डेवलपमेंट प्रोसेस के जरिए इंडस्ट्री के साथ मिल कर कमियों को दूर कर इन्हें सफल बनाना है।'

सवाल- नई हाइपरसोनिक मिसाइल LR-AShM मैक 10 की क्या खासियत है, क्या दुनिया में अभी कोई ऐसा डिफेंस सिस्टम है जो इसे रोक सके?

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा कि हाइपरसोनिक मिसाइल उसे कहते हैं जो ध्वनि की गति से पांच गुना से ज्यादा तेज (More than 5 times the speed of sound) चले। इसे रोकने के लिए फिलहाल दुनिया के पास ऐसा कोई भी 'प्रूवन' सिस्टम नहीं है। अभी दुनिया में इस पर और इसे रोकने की काउंटर टेक्नोलॉजी पर रिसर्च चल रही है।

उन्होंने कहा, 'यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन यह एक बहुत ही प्रॉमिसिंग क्षमता है जिसे रोकना किसी भी दुश्मन के लिए आसान नहीं होगा। वैसे भी हमला करना ही सबसे बड़ा बचाव होता है। जब आपके पास ऐसी क्षमता होती है, तो वह डिफेंस का काम करती है। फिलहाल इस तकनीक में भारत के पास एक एडवांटेज है क्योंकि अभी कोई उस स्तर पर नहीं है।'

सवाल- इस बार परेड में रोबोटिक्स डॉग्स भी दिखेंगे। क्या ये बॉर्डर पर तैनाती के लिए तैयार हैं? क्या इन्हें उन जगहों पर तैनात किया जा सकता है जहां हमारे जवानों को बड़ी मुश्किलें आती हैं?

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा कि देखिए, 'ऑटोनॉमी' एक जटिल विषय है। ऑपरेशनल यूटिलाइजेशन के लिए एक सीमित दायरे में और एक तय कॉन्सेप्ट के तहत इनका इस्तेमाल हो सकता है। लेकिन यह सोचना कि ये तुरंत इंसानों या सैनिकों को पूरी तरह रिप्लेस कर देंगे, अभी संभव नहीं है; इसमें समय लगेगा। दुनिया में कॉग्निटिव क्षमताओं पर काम हो रहा है, हमने भी शुरुआती प्रगति की है, लेकिन अभी काफी काम बाकी है।

सवाल- 'ऑपरेशन सिंदूर' और ड्रोन वारफेयर के समय हमने देखा कि स्वार्म ड्रोन्स अटैक हुए। हमारा जो भार्गवास्त्र एंटी-ड्रोन सिस्टम है, वह इनसे निपटने में कितना सक्षम है?

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा कि हमने अपने 'होम-ग्रोन' सिस्टम्स के जरिए क्षमता दिखाई है। लेकिन 'काउंटर स्वार्म ड्रोन' तकनीक अभी और विकसित होने की प्रक्रिया में है। मेरा मानना है कि बीएसएफ (BSF) और आईटीबीपी (ITBP) जैसी बॉर्डर गार्डिंग फोर्सेज को काउंटर ड्रोन क्षमताओं में तकनीकी रूप से और अपग्रेड होना पड़ेगा। उन्हें पहले अपना नेटवर्क बनाना होगा और फिर उसे आर्मी और एयरफोर्स के साथ इंटीग्रेट करना होगा। हमें 'मिलिट्री अनमैन्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट', नए डिटेक्टर्स और बेहतर 'हार्ड किल सिस्टम' चाहिए जो फिजिकली नष्ट करने वाले हों।

उन्होंने कहा, 'जिस दिन हम एक शॉट से एक ड्रोन को गिराने लगेंगे एंटी-ड्रोन गन से, तभी हमारी क्षमता मजबूत मानी जाएगी। इसके लिए सेंसर्स में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) लगाकर सटीक प्रेडिक्शन और बेहतर क्वालिटी के एम्युनिशन की जरूरत है ताकि सटीकता बढ़े और समय बर्बाद न हो। मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम जो एयरक्राफ्ट के लिए हैं, उन्हें ड्रोन के लिए अपग्रेड करना होगा।'

सवाल- AI बहुत तेजी से बढ़ रहा है। क्या भविष्य में यह सैनिकों की जगह ले सकता है? अगर हां, तो इसमें कितने साल लगेंगे?

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा, 'जब भी कोई नई तकनीक आती है, तो नई जटिलताएं भी आती हैं जिन्हें मैनेज करने के लिए एक्सपर्ट्स चाहिए। मुझे लगता है, यह मेरा निजी विचार है कि एआई अभी पूरी तरह रिप्लेस नहीं करेगा, इसमें समय लगेगा। AI शायद आम आदमी के काम को बेहतर करेगा और इंसानों को 'कॉम्प्लीमेंट' करेगा। रिप्लेस करने में अभी काफी समय लगेगा।'

सवाल- ब्रह्मोस के अलावा और ऐसे कौन से स्वदेशी हथियार हैं जो दुनिया हमसे खरीदना चाहेगी और हम पूरी तरह आत्मनिर्भर कब बनेंगे?

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने बताया कि हमें ब्रह्मोस पर गर्व है, वैसे ही पिनाका, एटीएजीएस (ATAGS), एएलएच, एलयूएच, एलसीएच और एलसीए में भी बहुत क्षमता है। कुछ समय पहले हमारी एक अनमैन्ड बोट ने 1500 किलोमीटर की यात्रा की थी। लेकिन आत्मनिर्भर बनने के लिए अभी बहुत दूर जाना है। इसके लिए इंजन का इकोसिस्टम, टेस्टिंग सिस्टम, हाई एल्टीट्यूड विंड टनल्स और फ्लाइट टेस्ट बेड जैसी बुनियादी चीजों की आवश्यकता है। जिस दिन भारत का अपना कमर्शियल एयरक्राफ्ट उड़ेगा, अपना टैंक होगा और अपना अनमैन्ड फाइटर होगा, वह आत्मनिर्भरता का असली सूचक होगा।

उन्होंने कहा, 'चीन जैसे पड़ोसी तकनीक में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, इसलिए हमें रिसर्च, डिजाइन और डेवलपमेंट पर अधिक ध्यान देना होगा। रक्षा बलों और हेडक्वार्टर आईडीएस में रिसर्च एंड डेवलपमेंट वर्टिकल्स बनाने होंगे। हमें प्रोजेक्ट क्लोजर्स को कम करना होगा और स्पाइरल डेवलपमेंट पर ध्यान देना होगा।'

सवाल- पिछले 10 साल में स्वदेशी हथियारों के मामले में भारत कितना आगे बढ़ा है?

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा कि हमने 'ड्रोन हब 2030' मिशन लिया जिससे सिविल और मिलिट्री दोनों ड्रोन तकनीक बढ़ीं। हालांकि सिविल ड्रोन के लिए आर एंड डी स्ट्रक्चर्स, US की FAA की तरह बनाने की जरूरत है। मिलिट्री एविएशन में हमने बहुत प्रगति की है- एलसीए, एएलएच, एलयूएच, एलसीएच, एचटीटी-40 और 'नेत्रा' (AEW) एयरक्राफ्ट अच्छे बन रहे हैं। आईजेटी (IJT) के ट्रायल चल रहे हैं।

लेकिन 'रुस्तम-1', 'तपस', 'घातक', एलसीए नेवी, 'सारस' और रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट जैसे प्रोजेक्ट्स पर अभी और मेहनत करने और इन्हें 'टाइम बाउंड' पूरा करने की जरूरत है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ये ग्लोबली कॉम्पिटिटिव प्रोडक्ट बनकर जल्दी इंडक्ट हों।

सवाल- भारत की ड्रोन तकनीक दुनिया के मुकाबले 1 से 10 के स्केल पर कहां है?

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा, 'अभी हम लगभग 6 के स्केल पर हैं। लेकिन यह नंबरिंग और परसेंटेज कन्फ्यूजन पैदा कर सकती है और गलत धारणा बना सकती है। हमें कोर टेक्नोलॉजीज पर ध्यान देना चाहिए। हमारा प्रॉमिस बहुत है, बस इंडक्शन और सपोर्ट पर ध्यान देने की जरूरत है।'

सवाल- ब्रह्मोस की तरह हमारी स्वदेशी पिनाका मिसाइल की दुनिया में इतनी मांग क्यों है?

जवाब- राजीव कुमार नारंग ने बताया कि पिनाका मूल रूप से रशियन तकनीक थी, जिसे हमारे भारतीय इनोवेटर्स ने इम्प्रूव करके ग्लोबली बेस्ट लेवल पर पहुंचाया है। भारतीय इनोवेशन के कारण ही दुनिया के देश इसमें रुचि दिखा रहे हैं। 'ब्रह्मोस' एक बहुत ही पोटेंट वेपन है, लेकिन हमें फ्यूचर के लिए इसके प्रोपल्शन सिस्टम और नई रेंजेस पर काम करते रहना चाहिए। 'ऑप्स सिंदूर' में भी पिनाका का कोई जवाब नहीं था।

उन्होंने कहा, 'ऐसे हमारे कई हमारे इंडियन इनोवेटर्स हैं जो गन्स बना रहे हैं, जो बड़ी अलग-अलग चीजें बना रहे हैं। तो हमें जो बेस्ट चीजें हैं, उनको हैंडहोल्ड करने के लिए आवश्यकता पड़ेगी। तो ब्रह्मोस एक बहुत ही पोटेंट वेपन है। लेकिन हमें फ्यूचर सोचकर उसके प्रोपल्शन सिस्टम, उसकी नई रेंजेस और नए-नए वेरिएंट्स के बारे में हमें सोचना पड़ेगा क्योंकि ये टेक्नोलॉजी प्रॉमिसिंग है। उसको नेक्स्ट लेवल पर ले जाने की जरूरत है।'

एक्सपर्ट ने कहा कि पिनाका का भी ऑपरेशन सिंदूर में कोई जवाब नहीं था। और ये एक अच्छी बात है, लेकिन याद रखिए कि हमें अगर हमें ग्लोबली एक आत्मनिर्भर देश बनना है, तो हमें उसको आगे बढ़ाते जाना है। जो लेवल हमने अचीव कर लिया, उसके नेक्स्ट लेवल के लिए भी सोचना है।

मेरा संदेश यह है कि भारत के इनोवेटर्स को 'असेंबलर्स' नहीं, बल्कि 'क्रिएटर्स' बनना चाहिए, जैसा डॉ. अब्दुल कलाम ने कहा था। हमें इंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर्स और पेलोड्स जैसी 'क्रिटिकल टेक्नोलॉजीज' पर अपना नियंत्रण रखना होगा। तभी हम दुनिया में खुद को स्थापित कर पाएंगे, वरना कोई भी देश हमारी 'आर्म ट्विस्टिंग' कर सकता है। अगर हम ऐसा नहीं करते, तो सारी मेहनत के बावजूद हम एक जगह रुककर वापस पीछे खिसक सकते हैं।

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