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Hindi News भारत राष्ट्रीय EXCLUSIVE: गणतंत्र दिवस की झांकी के पीछे कितनी मेहनत और बारीकी, कितना आता है खर्च? पढ़िए इसे बनाने वाले से खास बातचीत

EXCLUSIVE: गणतंत्र दिवस की झांकी के पीछे कितनी मेहनत और बारीकी, कितना आता है खर्च? पढ़िए इसे बनाने वाले से खास बातचीत

कर्तव्यपथ पर निकलने वाली झांकी के पीछे महीनों की मेहनत होती है। उसको बनाने में सैकड़ों कारीगर अपना पसीना बहाते हैं लेकिन उनका नाम कभी सामने नहीं आता। उनकी बात को दुनिया को बताने के लिए INDIA TV ने गणतंत्र दिवस की झांकी बनाने वाले से बात की।

republic day tableau- India TV Hindi Image Source : INDIA TV पढ़िए गणतंत्र दिवस की झांकी बनाने वाले से खास बातचीत।

Republic Day Tableau Making: 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस की परेड में जब कोई झांकी कर्तव्यपथ पर निकलती है, तो उसके पीछे सैकड़ों कारीगरों की तपस्या, महीनों की मेहनत और दर्जनों बैठकों की माथापच्ची छुपी होती है। इस बार उत्तर प्रदेश की झांकी किस सोच के साथ बनी, उसकी थीम क्या है और वह कैसे तय हुई, किन चुनौतियों से निपटकर यह कर्तव्य पथ पर 26 जनवरी को उतरेगी, इन्हीं सवालों के जवाब हासिल करने के लिए INDIA TV ने एक्सक्लूसिव बात की इस बार यूपी की झांकी बनाने वाली वेंडर सवीना जेटली से, जिन्होंने हमें झांकी के हर पहलू के पीछे की कहानी के बारे में विस्तार से बताया।

सवाल- इस बार यूपी की झांकी की थीम क्या है, कितने दिन पहले आपको इसके बारे में पता चला और ये थीम तय करने का पूरा प्रोसेस क्या होता है?

जवाब- वेंडर सवीना जेटली ने बताया इस बार की थीम 'कालिंजर फोर्ट' है। कालिंजर फोर्ट के बारे में हम लोग शुरुआत में ज्यादा आश्वस्त नहीं थे क्योंकि अभी वहां कॉरिडोर बनना शुरू नहीं हुआ है, यह उनका एक आगामी प्रोजेक्ट है। हमने एक्सपर्ट कमेटी को 'विकसित यूपी' सहित कई थीम्स डिजाइन करके दिखाई थीं। लेकिन एक बार में ही उन्हें हमारी यह कालिंजर फोर्ट की थीम बहुत पसंद आ गई। फिर इसकी डिटेलिंग पर काम शुरू हुआ। हमारी टीम वहां गई और वहां से विस्तार में सारी फोटोग्राफी की।

उन्होंने कहा, 'यह एक बहुत बड़ा किला है। काफी फैला हुआ है, इसलिए इसे एक छोटे से Tableau में उतार पाना बड़ा मुश्किल काम था। इसलिए टीम वहां गई और फोटोग्राफर्स ने ऐसी जगहों की तस्वीरें लीं जिन्हें हम अपनी संस्कृति और पुरातन म्युरल्स के रूप में प्रोजेक्ट कर सकें। हमने यहां आकर एक्सपर्ट कमेटी को नए डिजाइन के साथ वो तस्वीरें दिखाईं कि हम यह तैयारी कर रहे हैं। फिर एक मैराथन प्रक्रिया शुरू हुई। कमेटी ने सुझाव दिए कि साइड में कौन सा म्युरल होना चाहिए और आगे क्या होना चाहिए। कुछ हमारे भी सुझाव थे। करीब 6 मीटिंग्स के बाद हम लोगों का एक डिजाइन फाइनल और अप्रूव हुआ।'

वेंडर ने बताया, 'हमने नवंबर में शुरुआत की थी और अब जनवरी चल रहा है, 26 जनवरी को फाइनली वो दुनिया के सामने प्रेजेंट होगी। इस बीच म्यूजिक पर भी काम शुरू हुआ। इसमें कंपोजर्स के साथ बैठकर ओरिजिनल साउंड ट्रैक बनवाया जाता है, जो कई टेक्स और री-टेक्स में बनता है। कमेटी में ऐसे एक्सपर्ट्स हैं जो बताते हैं कि इसमें तबला कम होना चाहिए, डमरू ज्यादा होना चाहिए, या इसमें 'ओम नमः शिवाय' होना चाहिए या नहीं। इस तरह उस पर बहुत सारी चर्चाएं हुईं। आखिरकार 29 दिसंबर को हमें चिट्ठी आई कि यूपी गणतंत्र दिवस परेड में हिस्सा लेने जा रहा है।'

सवाल- झांकी में हमें जो कलाकार भी दिखते हैं, उनका चयन कैसे होता है, इन्हें आप ही लोग तय करते हैं या एक्सपर्ट कमेटी सुझाव देती है?

जवाब- वेंडर सवीना जेटली ने बताया कि यह भी एक प्रक्रिया है। हम लोग अपनी तरफ से सुझाव लेकर जाते हैं। चूंकि हम आगे शिवजी का म्युरल दिखा रहे हैं और म्यूजिक उनसे जुड़ा है, तो प्रॉप्स और डांस भी उनसे कनेक्टेड बुंदेलखंडी शैली का होना चाहिए। वहां इन सब चीजों पर चर्चाएं होती हैं और फिर हम आर्टिस्ट फाइनल करते हैं। हमारी कोशिश रहती है कि हम वहीं की लोकल टीम को लाएं जो परफॉर्म करे।

सवाल- आपकी पूरी टीम कितनी बड़ी है, कितने कारीगरों ने इसमें मेहनत की है और इस बार की झांकी बनाने में सबसे मुश्किल हिस्सा आपको क्या लगा?

जवाब- सवीना जेटली ने बताया कि हमारी टीम में मिट्टी का काम करने वाले सारे आर्टिस्ट बंगाल के हैं। वे शांति निकेतन से पढ़े हुए BFA और MFA हैं। वे हमारे साथ नवंबर के पहले दिन से ही इन्वॉल्व हो जाते हैं। वे स्केचेस बनाते हैं और टैबल्यू की बारीक डिटेलिंग करते हैं। हम इसका एक स्केल मॉडल भी बनाते हैं, ताकि कमेटी को एग्जैक्ट आइडिया हो जाए कि राजपथ पर चलने पर यह कैसा लगेगा। साथ में कारपेंटर टीम, लोहा, एलईडी और म्यूजिक वाले होते हैं। करीब 100 कारीगर होते हैं जो हमारे एक टैबल्यू पर इन्वॉल्व होते हैं। MOD से 100 लोगों का पास बनता है और हम उस पर काम करते हैं क्योंकि टारगेट टाइम बहुत कम होता है।

उन्होंने कहा, 'झांकी का सबसे मुश्किल हिस्सा उस शिवलिंग और मूर्ति को मैच करना था जो हमने यूपी की झांकी के आगे बनाया है। उसमें मूवमेंट करना था क्योंकि वह पूरा एक स्टैचू है। अगर उसे मूव करना है तो उसे बीच में से हमें काटना पड़ा। उसे काटकर, ज्वॉइन करके, नीचे लोहे की माउंटिंग प्लेट लगाना और 180 डिग्री पर उसे मूव करवाना एक बहुत कठिन कार्य था। बंगाल के करीब 40 आर्टिस्ट्स ने इस टैबल्यू पर काम किया है। उन्होंने एक-एक म्युरल और चीज निकाली है। जो पिलर्स बीच में लगाए हैं और नक्काशी है, वो हूबहू कालिंजर फोर्ट जैसी की गई है।'

सवाल- ये जितने भी कर्मचारी झांकी बनाने का काम करते हैं, ये सारे सरकारी विभागों से होते हैं या प्राइवेट?

जवाब- सवीना जेटली ने बताया कि यह सारी हमारी टीम होती है। सरकार की तरफ से एक नोडल ऑफिसर नियुक्त किए जाते हैं जो बार-बार आते हैं। वे लोकल लोग होते हैं जो देखते हैं कि उनकी झांकी पर क्या प्रोग्रेस चल रही है।

सवाल- ये झांकियां दिल्ली में कहां बनती हैं, इसमें क्या-क्या सामान लगता है, ये कहां से आता है?

जवाब- वेंडर सवीना जेटली ने बताया कि हमारी झांकियां परेड ग्राउंड के पास 'राष्ट्रीय रंगशाला' में बनती हैं। वहां डिफेंस ने एक बहुत बड़ा कैंप लगाया हुआ है, जहां हमारा फैब्रिकेशन एरिया अलग है। अब हम भाग्यशाली हैं कि पिछले दो-तीन साल से ऊपर से कवर कर दिया गया है, वरना हम लोग कीचड़, बारिश और नीचे गीले में काम करते थे। ठंड में हमारे ऊपर कोई छत नहीं होती थी। वहां 30 झांकियां एक साथ बन रही होती हैं, मशीनें चल रही होती हैं, अंगीठी या हीटर जलाना मना है। हमने बहुत ठंड में काम किया है, लेकिन अब डिफेंस द्वारा शेड मिलने से बचाव हुआ है।

उन्होंने कहा, 'सामग्री में फाइबर बहुत इस्तेमाल होता है, लकड़ी, लोहा और पेंट्स लगते हैं। मुझे इस काम में 25 साल हो गए हैं, यह एक प्रतिष्ठित काम है, तो अब मुझे सोर्सिंग पता है कि कहां से क्या मिलता है। डिफेंस में अंदर जाने के पास बनते हैं और काम चलता है। यहां कुछ भी बना हुआ Readymade नहीं आता, फैब्रिकेट होकर नहीं आता। जैसे लकड़ी कीर्ति नगर हब से आती है, लोहा लोहा मंडी से आता है, लेकिन बाकी सारी चीजें यहीं बनती हैं। हम सब कुछ यहीं फैब्रिकेट करते हैं। अगर कोई छोटी सी गाय भी है या मुरादाबाद के ब्रास का मोर है, तो वह भी यहीं बनेगा। बाहर से खरीद की अनुमति नहीं है।'

सवाल- एक झांकी को बनाने में लगभग कितना खर्च आता है और आप वेंडर्स इसका कॉन्ट्रैक्ट कैसे लेते हैं?

जवाब- सवीना जेटली ने कहा कि यह बहुत मुश्किल होता है। इस काम को कोई करना नहीं चाहता क्योंकि नवंबर से इसकी पिचिंग चल रही है और 29 दिसंबर को पता चलता है कि हम काम कर रहे हैं या नहीं। वो एक महीने का खर्च, मेहनत, कालिंजर जाना, फोटोग्राफी, उसका हमें कोई पेमेंट नहीं मिलता। वह सब हमारी जेब पर होता है। इस बार कुल चार बिडर्स थे। मुझे यूपी की झांकी बनाते हुए 6 साल हो गए हैं और ईश्वर की कृपा से हर साल हमने यूपी के लिए प्राइज लिया है, या तो फर्स्ट या सेकंड।

उन्होंने कहा, 'झांकी बनाने में करीब 50 से 60 लाख रुपये तक खर्च होते हैं। लेकिन आजकल बाकी स्टेट्स बहुत महंगी झांकियां बनवा रहे हैं और बहुत अच्छे मटेरियल का इस्तेमाल चाहते हैं। डिफेंस की एक्सपर्ट कमेटी कहती है कि कुछ अलग लाइए। पहले सिंपल झांकियां बनती थीं, अब हर झांकी में मूवमेंट जरूरी है। आप देखेंगे कि हर झांकी में कोई न कोई मूवमेंट जरूर होगी।'

सवाल- झांकी के मामले में यूपी कितनी बार अवार्ड जीत चुका है और वेंडर के तौर पर आप पर फर्स्ट प्राइस लाने का कितना दबाव होता है?

जवाब- वेंडर सवीना जेटली ने बताया कि वेंडर के तौर पर बहुत दबाव होता है। हम 2019 से यूपी की झांकी बना रहे हैं और चार बार उन्हें फर्स्ट प्राइज दिलवा चुके हैं। बाकी समय हमने उन्हें सेकंड प्राइज दिलवाया है। अब यूपी को आदत हो गई है कि प्राइज मिलना ही है। अगर मैडम बना रही हैं तो प्राइज मिलेगा ही। तो हम पूरी कोशिश करते हैं कि बढ़िया काम हो। पिछली बार भी हमें फर्स्ट मिला था, उससे पहले महाकुंभ और राम मंदिर की झांकी पर भी फर्स्ट मिला था।

सवाल- इस बार की झांकी में 'एक्स-फैक्टर' क्या है जो लोगों को अपनी तरफ सबसे ज्यादा आकर्षित करेगा?

जवाब- सवीना जेटली ने बताया कि एक्स-फैक्टर यह है कि हमने ODOP के तहत यूपी के प्रोडक्ट्स लगाए हैं, जो भी चीज दूर से समझ आए, वो उसमें लगाए हैं। इसके अलावा जो डांस ट्रूप है, वो शिवजी के बहुत बड़े डमरू लेकर चल रहा है, जो पहली बार वाराणसी से आ रहे हैं। आगे शिवलिंग की मूवमेंट एक बहुत बड़ा टास्क था जो हमने किया है। और एक खास बात यह है कि यह 'सिंगल टोन' की झांकी है। अक्सर झांकियों में नीले, पीले, हरे जैसे अलग-अलग रंग होते हैं, लेकिन हमारी झांकी में सिर्फ कालिंजर फोर्ट का सिंगल टोन है।

सवाल- झांकी बनाने वाले कारीगर अक्सर पर्दे के पीछे रह जाते हैं, हम उनकी मेहनत तो देखते हैं लेकिन उनके बारे में नहीं जान पाते हैं। क्या आप उन खास कारीगरों के नाम बता सकती हैं जिन्होंने बहुत बढ़िया काम किया?

जवाब- सवीना जेटली ने कहा कि बिल्कुल सही बात है। जैसे हमारे यहां प्रदीप पाल हैं। वे शांति निकेतन से पढ़े हुए एमएफए हैं। उन्होंने जो शिवजी का स्टैचू बनाया है, उसे देखकर प्रधानमंत्री की एक्सपर्ट कमेटी ने तारीफ की कि यह काबिले तारीफ बना है। वह करीब 8.5 फीट का है। हमारी झांकी में लकड़ी पर पेंट नहीं किया गया है, सब पर पूरे-पूरे म्युरल्स लगे हुए हैं। प्रदीप हैं, चंदन हैं, सोनाली हैं जो डिजाइनिंग करती हैं, ऐसे कई लोग हैं जो पर्दे के पीछे रहकर काम कर रहे हैं।

सवाल- 26 जनवरी से पहले झांकी निकालने का रिहर्सल कितनी बार होता है और फाइनल डे यानी 26 जनवरी तक यह पूरा प्रोसेस कैसा है?

जवाब- वेंडर सवीना जेटली ने बताया कि रिहर्सल का तरीका अब बदल गया है। पहले जिस झांकी पर हम काम कर रहे होते थे, वही रिहर्सल के लिए जाती थी और आर्टिस्ट भी साथ जाते थे। लेकिन अब रक्षा मंत्रालय ने अलग से ट्रेलर और ट्रैक्टर खड़े कर दिए हैं जिन पर यूपी, झारखंड आदि नाम लिखे होते हैं। अब सिर्फ आर्टिस्ट रिहर्सल करने जाते हैं। आर्टिस्ट 6 जनवरी से वहीं कैंप करते हैं। उनका बहुत अच्छा इंतजाम होता है। लड़के और लड़कियों के अलग टेंट्स, स्टेशन से रिसीव करना, खाना-पीना सब एमओडी देखता है। वहां बार्बर शॉप, कैंटीन सब है, उन्हें शैम्पू, हेयर कट, जूते, कंबल, गद्दे सब वहां मिलता है। हमारी झांकी 25 जनवरी की रात को फाइनल डे के लिए जाएगी।

सवाल- आज से 20 साल पहले और अब झांकी बनाने में क्या अंतर आया है, क्या आसानी हुई और पहले क्या मुश्किलें हुआ करती थीं?

जवाब- सवीना जेटली ने कहा कि पहले डिफेंस के पास कोई डेडिकेटेड जगह नहीं थी। कभी जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में तो कभी कहीं और काम होता था। अब पिछले चार साल से हम 'राष्ट्रीय रंगशाला' कैंप में एक पक्की जगह पर बना रहे हैं। पहले हम बारिश और कीचड़ में बिना छत के काम करते थे, अब हमारे सिर पर छत है। पहले डिजाइन में कोई मूवमेंट नहीं मांगता था, लेकिन अब हर टैबल्यू में मूवमेंट अनिवार्य है। डिजाइन अब बहुत चैलेंजिंग और अच्छे बन रहे हैं। हम आगे बढ़ रहे हैं। पहले एक टैबल्यू पर चार-पांच चीजें दिखाते थे, अब एक्सपर्ट कमेटी स्पष्ट कहती है कि 'सिंगल थीम' पर झांकी बनाओ ताकि वह रजिस्टर हो सके। क्योंकि राष्ट्रपति के सामने से निकलने में उसे सिर्फ 2 सेकंड लगते हैं।

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