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इस्तेमाल किये जा चुके खाद्य तेल से तैयार होगा बायो-डीजल, FSSAI ने शुरू की कोशिशें

 Published : Jul 03, 2018 12:55 pm IST,  Updated : Jul 03, 2018 12:55 pm IST

एफएसएसएआई ने कहा है कि वह इस्तेमाल हो चुके खाना पकाने के तेल का संग्रह करने और उससे जैव-डीजल बनाने के लिए पारिस्थितिक तंत्र स्थापित करने के संबंध में भारतीय बायोडीजल एसोसिएशन के साथ बातचीत कर रहा है।

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नई दिल्ली। आप घर में पूडि़यां या पकौड़े तलने के बाद आप जिस जले हुए तेल को यूं ही फेंक देते हैं, वह आपकी गाड़ी भी चला सकता है। आप भले ही इसे अभी मजाक समझें लेकिन देश का प्रमुख फूड रेग्‍युलेटर एफएसएसएआई ने इसके लिए कवायद शुरू कर दी है। एफएसएसएआई ने कहा है कि वह इस्तेमाल हो चुके खाना पकाने के तेल का संग्रह करने और उससे जैव-डीजल बनाने के लिए पारिस्थितिक तंत्र स्थापित करने के संबंध में भारतीय बायोडीजल एसोसिएशन के साथ बातचीत कर रहा है। 

एफएसएसएआई ने एक बयान में कहा है कि खाद्य व्यवसायियों से थोड़ी बहुत मात्रा में इस्तेमाल हो चुके खाद्य तेल का पहले से ही वस्तु लेनदेन व्यवस्था या लागत पर एकत्रण किया जा रहा है लेकिन इस समूची व्यवस्था के विस्तार की काफी गुंजाइश है।  भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने कहा, ‘सालाना लगभग 2.3 करोड़ टन खाद्य तेल का भारत में उपभोग किया जाता है। इसमें से जैव-डीजल के उत्पादन के लिए 30 लाख टन तेल का संग्रहण और उपयोग में लाया जा सकता है।’ 

प्राधिकरण ने कहा कि इसका अनुमानित 18,000 करोड़ रुपये वार्षिक मूल्य होगा । खाद्य तेल को बायो-डीजल उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त और परामर्शयोग्य कच्चे माल के रूप में देखा जाता है। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, एफएसएसएआई ने खाद्य व्यापार परिचालकों के लिए एक जुलाई से खाद्य वस्तुओं को तेल में तलने के दौरान तेल की गुणवत्ता की निगरानी करने के लिए मानदंडों को अधिसूचित किया है। 

इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए , एफएसएसएआई के सीईओ पवन अग्रवाल ने कहा : "इस्तेमाल हो चुके खाद्यतेल के मानकों का प्रभावी कार्यान्वयन सार्वजनिक स्वास्थ्य , पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा सभी के लिए अच्छा है।" उन्होंने एक बयान में कहा कि राज्य खाद्य सुरक्षा आयुक्तों को इस संबंध में जागरूकता और शिक्षा कार्यक्रम, निगरानी और प्रवर्तन गतिविधियों को चलाने की सलाह दी जा रही है। बार-बार तलने के लिए खाद्य तेल के उपयोग से टीपीसी का गठन होता है जिससे यह मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो जाता है और इससे कई बीमारियां पैदा हो सकती हैं। 

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