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आईबीबीआई ने कॉरपोरेट दिवाला कार्यवाही में पारदर्शिता के लिये अधिनियम में संशोधन किया

 Edited By: India TV Paisa Desk
 Published : Jul 21, 2021 03:37 pm IST,  Updated : Jul 21, 2021 03:37 pm IST

संशोधित प्रावधान 14 जुलाई 2021 से लागू हो गये हैं। सरकार के मुताबिक संशोधन का उद्देश्य ‘‘कॉरपोरेट दिवाला कार्यवाही में अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही’’ को बढ़ाना है

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कॉरपोरेट दिवाला कार्यवाही में पारदर्शिता के लिये अधिनियम में संशोधन Image Source : FILE

नई दिल्ली। दिवाला प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) ने भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (कॉरपोरेट व्यक्तियों के लिए दिवाला समाधान प्रक्रिया) विनियमन में संशोधन किया है। बुधवार को जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया कि विनियमन में संशोधन का उद्देश्य ‘‘कॉरपोरेट दिवाला कार्यवाही में अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही’’ को बढ़ाना है। संशोधित प्रावधान 14 जुलाई 2021 से लागू हो गये हैं।

कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक कॉरपोरेट देनदार (सीडी) दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने से पहले अपना नाम अथवा पंजीकृत कार्यालय का पता बदल सकता है। ऐसे मामलों में हितधारकों को नए नाम या पंजीकृत कार्यालय के पते के साथ तालमेल बिठाने में कठिनाई हो सकती है। परिणामस्वरूप वे सीआईआरपी में भाग लेने में विफल हो सकते हैं। इस संशोधन के तहत सीआईआरपी का संचालन करने वाले दिवाला पेशेवर (आईपी) के लिए यह आवश्‍यक होगा कि वे सीडी के वर्तमान नाम एवं पंजीकृत कार्यालय के पते के साथ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने से दो वर्ष पूर्व तक की अवधि में उसके नाम अथवा पंजीकृत कार्यालय के पते में हुए बदलावों का खुलासा करे और सभी संचार एवं रिकॉर्ड में उसका उल्‍लेख करे।

वहीं अंतरिम समाधान पेशेवर (आईआरपी) या समाधान पेशेवर (आरपी) सीआईआरपी के संचालन में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए पंजीकृत मूल्यांकनकर्ताओं सहित किसी भी पेशेवर को नियुक्त कर सकता है। संशोधन के तहत यह प्रावधान किया गया है कि आईआरपी/आरपी पंजीकृत मूल्यांकनकर्ताओं के अलावा किसी अन्‍य पेशेवर को नियुक्त कर सकता है बशर्ते उन्‍हें लगता हो कि ऐसे पेशेवर की सेवाओं की आवश्यकता है और सीडी के पास ऐसी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। इस प्रकार की नियुक्तियां एक उद्देश्यपूर्ण और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन करते हुए निष्पक्ष आधार पर की जाएंगी। शुल्क के लिए चालान पेशेवर के नाम पर बनेगा और उसके बैंक खाते में भुगतान किया जाएगा।

साथ ही आरपी यह पता लगाने के लिए बाध्य है कि क्या सीडी तरजीही लेनदेन, कम मूल्य वाले लेनदेन, जबरन उधारी लेनदेन, खरीद-फरोख्‍त में धोखाधड़ी और गलत तरीके से खरीद-फरोख्‍त जैसे विवादित लेनदेन से संबंधित है। यदि ऐसा है तो वह उचित राहत की मांग के साथ एडजुकेटिंग अथॉरिटी यानी न्‍यायिक अधिकारी के पास आवेदन दायर करें। इससे न केवल ऐसे लेनदेन में खोए हुए मूल्य की वापसी होगी बल्कि इस प्रकार के लेनदेन को भी हतोत्साहित किया जा सकेगा ताकि सीडी पर दबाव न पड़े। इस प्रकार इससे समाधान योजना के जरिये सीडी के पुनर्गठन की संभावना बढ़ जाती है। 

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