EXCLUSIVE: 114 नए राफेल की डील से क्या खत्म हो जाएगा चीन-PAK के 'टू फ्रंट वॉर' का खतरा? एक्सपर्ट ने समझाया
फ्रांस से 114 नए Rafale की डील अगर Make In India के तहत होती है तो यह भारत के डिफेंस सेक्टर के लिए कितना फायदेमंद होगा। दुश्मन के लिए राफेल फाइटर जेट कितना खतरनाक है, यह सबकुछ MP IDSA के सीनियर फेलो डॉक्टर राजीव कुमार नारंग से विस्तार से समझिए।

क्या 114 नए Rafale जेट्स पाकिस्तान और चीन के 'टू फ्रंट वॉर' के खतरे से निपटने के लिए काफी होंगे? 'ऑपरेशन सिंदूर' में जहां एक ओर राफेल ने अपना लोहा मनवाया, वहीं हमारे स्वदेशी फाइटर जेट्स- LCA तेजस मार्क 2 और AMCA अभी किस फेज में हैं? INDIA TV के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में, मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के सीनियर फेलो और भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन डॉक्टर राजीव कुमार नारंग ने इंडिया के डिफेंस सेक्टर की कामयाबी और चुनौतियों पर खुलकर बात की है। उन्होंने बताया कि कैसे भारत 'ब्लॉक मॉडल' और 'स्पाइरल डेवलपमेंट' के माध्यम से दुनिया को टक्कर दे सकता है। साथ ही जानिए कि राफेल फाइटर जेट में वो कौन सी खासियत है जो इसे दुनिया में सबसे भरोसेमंद बनाती है।
सवाल- जब नए 114 राफेल भारत आ जाएंगे, तो हमारी भारतीय वायुसेना और कितनी मजबूत हो जाएगी?
जवाब- राजीव कुमार नारंग ने बताया कि भारतीय वायुसेना को बहुत पहले से 42 स्क्वाड्रन की आवश्यकता थी। हालांकि पहले के मुकाबले जहाज बहुत सक्षम हो गए हैं, उनकी रेंज बढ़ गई है और लॉन्ग रेंज वेपन सिस्टम आ गए हैं, लेकिन हम 'टू फ्रंट वॉर' की स्थिति को कभी भी नजरअंदाज नहीं कर सकते।
उन्होंने कहा, 'दूसरी चुनौती यह है कि हमारे पुराने जहाज रिटायर हो रहे हैं। हमारी उम्मीद थी कि LCA मार्क 1A का प्रोडक्शन सालाना 24 जहाज तक पहुंच जाएगा, लेकिन इंजन और सिस्टम इंटीग्रेशन की वजह से इसमें देरी हुई। इस देरी की भरपाई और 'अंतरिम रिक्वायरमेंट' को पूरा करने के लिए हमें राफेल जैसे तैयार सिस्टम की जरूरत थी।'
राजीव कुमार नारंग ने आगे कहा कि राफेल ने 'ऑपरेशन सिंदूर' में अपनी क्षमता साबित की है। राफेल सिर्फ एक जहाज नहीं है, बल्कि उसके सेंसर और सिस्टम्स का एक बेहतरीन पैकेज है, जो वायु सुरक्षा के लिए हमें एक मजबूत विकल्प देता है। इसी बीच, हम LCA मार्क 2 को डिजाइन कर रहे हैं, जिसके इस साल ग्राउंड टेस्ट होने की संभावना है। LCA मार्क 2 भी राफेल की तरह 4.5 जनरेशन का जहाज है, लेकिन राफेल एक ट्विन इंजन, लंबी रेंज और बेहतर एम्युनिशन सिस्टम वाला जहाज है।
उन्होंने आगे कहा, 'जब तक LCA मार्क 2 और AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) पूरी तरह तैयार होकर प्रोडक्शन में आएंगे, तब तक हमारी घटती स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को संभालने के लिए राफेल एक बेहतरीन 'स्टॉप गैप अरेंजमेंट' है। इसके बाद हमारा पूरा जोर LCA मार्क 1, मार्क 2 और AMCA के प्रोपल्शन सिस्टम्स को भारत में इंटीग्रेट करने पर होना चाहिए।'
सवाल- दुनिया में और भी बहुत सारे फाइटर जेट हैं, हम राफेल पर ही इतना भरोसा क्यों करते हैं? इसमें ऐसी क्या खास बात है जो इसे सबसे अलग बनाती है?
जवाब- राजीव कुमार नारंग ने बताया कि राफेल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह समय के साथ अपग्रेड होता रहता है। जैसे हमने ALH (ध्रुव) के मार्क 1, 2 और 3 बनाए, वैसे ही राफेल भी खुद को लगातार इम्प्रूव कर रहा है। इसके 'सेंसर्स' और 'मिसाइल सिस्टम्स' (एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड) दुनिया में बेहतरीन क्वालिटी के हैं।
उन्होंने कहा, 'आजकल एयर कॉम्बैट सिर्फ जहाज पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उसके सेंसर्स और अटैक सिस्टम्स पर निर्भर करता है। Su-57 या F-35 जैसे जहाजों की कॉस्ट, मेंटेनेंस और ट्रैक रिकॉर्ड को लेकर अभी कुछ शंकाएं हैं। वहीं, राफेल ने खुद को साबित किया है। चूंकि हमारी वायुसेना और नेवी दोनों के पास राफेल हैं या प्लान में हैं, तो उन्हें आपस में इंटीग्रेट करना आसान है।'
राजीव कुमार नारंग ने आगे कहा कि आजकल 'नेटवर्क सेंट्रिक वारफेयर' का जमाना है। अगर आपके जहाज, कम्युनिकेशन और डेटा लिंक आपस में जुड़े नहीं हैं, तो वे जानकारी साझा नहीं कर पाएंगे। हमारे पास पहले से मिराज हैं जो फ्रेंच मूल के हैं, इसलिए राफेल हमारे इकोसिस्टम में आसानी से घुल-मिल जाएगा। यह हमें वह बहुमूल्य समय देगा जिससे हम LCA मार्क 2 और AMCA को जल्दी ला सकें।
उन्होंने आगे कहा, 'सरकार ने AMCA के लिए इस बार प्राइवेट सेक्टर को भी आमंत्रित किया है। तीन प्राइवेट एंटिटीज ने कंसोर्टियम के रूप में प्रस्ताव दिया है। इससे अमेरिका की बोइंग और लॉकहीड मार्टिन की तर्ज पर भारत में भी एक 'पैरेलल प्रोडक्शन लाइन' खड़ी होगी। इससे HAL पर बोझ कम होगा और वे LCA मार्क 1 और 2 पर फोकस कर पाएंगे। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्राइवेट सेक्टर के आने से हम न केवल आत्मनिर्भर बनें बल्कि विश्व स्तर की प्रोडक्शन क्वालिटी और सपोर्ट सिस्टम भी दे पाएं।'
सवाल- राफेल की मिसाइलें, जैसे- स्काल्प और Meteor, कितनी खतरनाक हैं? दुश्मन इनसे क्यों डरता है?
जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा कि मॉडर्न वॉरफेयर में सबसे बड़ी बात होती है- दुश्मन के इलाके में जाए बिना उसे दूर से मारना। हमने देखा है कि कैसे पिनपॉइंट एक्यूरेसी के साथ आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया, बिना किसी सिविलियन नुकसान के। जब पाकिस्तान ने 7, 8 और 9 मई को ड्रोन और मिसाइल हमलों की कोशिश की, तो हमारे जवाबी हमले इतने सटीक थे कि उन्हें तुरंत 'युद्ध विराम' के लिए कॉल करना पड़ा। राफेल जब हमारे स्वदेशी सिस्टम्स- जैसे ब्रह्मोस, आकाश एयर डिफेंस, और लॉइटरिंग म्यूनिशंस के साथ मिलकर काम करता है, तो यह दुश्मन के लिए एक बहुत ही घातक पैकेज बन जाता है। यह एक 'डिसिसिव एज' है।
उन्होंने कहा कि हमें अपनी मिसाइलों के नए वर्जन लाने होंगे। जैसे 'अस्त्र' मिसाइल की रेंज बढ़ाई गई है, वैसे ही हमें LCA मार्क 2 और AMCA के लिए इंजन पर काम करना होगा। और मुझे लगता है इसमें बिल्ड करने के लिए हमारे साथ जो इंडीजीनस सिस्टम्स हैं, जैसे एयर डिफेंस सिस्टम है, काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, ऐसे ही हमारे जो मिसाइल सिस्टम्स हैं उनमें न्यूअर वर्शन लाने पड़ेंगे। हमारी एयर-टू-एयर मिसाइल जैसे आपने देखा अस्त्र जो है उसकी रेंज जो अभी-अभी इम्प्रूव की गई है, तो ये एक अच्छा एक संकेत है।
वे बोले, 'मुझे लगता है LCA मार्क 2 और LCA मार्क 1A, मुझे हिंदुस्तान फाइटर 24 (HF-24) की याद दिलाता है जिसे हम मारुत फाइटर कहते हैं, वो क्यों फेल हुआ था? वो फेल हुआ था एयरो इंजन से। और हमारी भारतीय सरकार ने डिसीजन लिया है कि फ्रांस के साथ हम एक 120 किलो न्यूटन का इंजन बनाएंगे अमका (AMCA) के लिए, अमका मार्क 2 के लिए। अमका मार्क 1 पर फ्रांस का GE F414 इंजन होगा। अमका मार्क 2 पर हम को-डेवलप्ड इंजन साफरान (Safran) फ्रांस के साथ बनाएंगे।'
राजीव कुमार नारंग ने कहा, 'ये जो मार्क 2 है, अमका का जो इंजन है वो 120 किलो न्यूटन मतलब ज्यादा पावर वाला है। उससे थोड़ी कम पावर 100 किलो न्यूटन LCA मार्क 2, उससे थोड़ी और कम पॉवर 80 किलो न्यूटन LCA मार्क 1A चाहिए। तो मुझे लगता है हमें अब कावेरी जो है 70 किलो न्यूटन के आसपास, 70-72 किलो न्यूटन के आसपास पावर है, लेकिन उसमें आफ्टरबर्नर और जो हॉट सेक्शन है उसमें कुछ इम्प्रूवमेंट की जरूरत है। तो हमें ये जो समय मिलेगा, हमें कावेरी मार्क 2 लॉन्च करना चाहिए।'
उन्होंने कहा, 'मैंने रोडमैप बनाया है कि आप प्राइवेट सेक्टर को इन्वाइट कीजिए, जो आपके पास कावेरी की टेक्नोलॉजी है वो प्राइवेट सेक्टर को आप ट्रांसफर कीजिए और दो कंपनियां या एक कंपनी को आप बोलिए कि आप इसमें बनाइए, हम आपके साथ पार्टनर हैं और आपको 6 साल का समय देते हैं। आप बनाइए और दो साल का समय फिर भी एक हमारे पास रहेगा, जब तक हमारे फर्स्ट लॉट ऑफ GE F404 इंजन की लाइफ खत्म होगी, तो हमारा इंडीजीनस इंजन आ जाएगा। इसमें प्राइवेट सेक्टर इंजन में आएगा। देखिए गोदरेज ऑलरेडी हमारा इंजन बना रहा है। तो कावेरी मार्क 2 लॉन्च करना हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है, जबकि फ्रांस के साथ 120 किलो न्यूटन का भी करना चाहिए।'
राजीव कुमार नारंग ने आगे कहा, 'मुझे लगता है कावेरी मार्क 3 लॉन्च करना चाहिए जो 100 किलो न्यूटन, 90 से 100 किलो न्यूटन जो LCA मार्क 2 का होगा। ये हम दूसरी प्राइवेट सेक्टर एंटिटी को कर सकते हैं। इसमें भी हम कावेरी की ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी कर सकते हैं और प्राइवेट सेक्टर को बोलते हैं, आप बताइए आप इसे 90 से 100 किलो न्यूटन तक ले जा सकते हैं, इसको कैसे मॉडिफाई करते हैं और हम आपको 8 साल देंगे। आप इसको डेवलप कीजिए, हम आपके साथ हैं। Gas Turbine Research Establishment दोनों में एक पार्टनर, सपोर्टिंग पार्टनर हो जाए, वो कैसे करते हैं, किससे कोलैबोरेट करते हैं, वो भारत को एक ब्लूप्रिंट देंगे। और हमारे पास 10 साल में जब LCA मार्क 2 का इंजन खत्म होने से पहले ही हमारा इंडीजीनस इंजन चेक हो जाएगा।'
हमें एक 'प्लान बी' (Plan B) भी तैयार रखना चाहिए। अगर इंजन में देरी होती है, तो हमें नेवल फाइटर (TEDBF) के लिए फ्रेंच इंजन का विकल्प खुला रखना चाहिए। HF-24 मारुत वाली गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए, जो सिर्फ इंजन की कमी के कारण फेल हुआ था।
सवाल- चीन के J-20 के मुकाबले हमारा राफेल कितना कारगर है?
जवाब- राजीव कुमार नारंग ने बताया कि J-20 हो या राफेल, युद्ध सिर्फ प्लेटफॉर्म नहीं लड़ता, बल्कि 'सेंसर और शूटर' लड़ते हैं। राफेल के पास बेहतरीन सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर शूट हैं। पाकिस्तान के खिलाफ हमने साबित किया है कि हमारे ग्राउंड-टू-एयर सिस्टम 300 किलोमीटर दूर भी दुश्मन के अर्ली वार्निंग सिस्टम को मार गिरा सकते हैं।
उन्होंने कहा, 'भारत भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। LCA मार्क 2 और AMCA में हम नई टेक्नोलॉजी लगा रहे हैं। राफेल अभी के लिए बहुत ही सक्षम जहाज है और जब तक भविष्य की चुनौतियां बढ़ेंगी, हमारा AMCA तैयार हो जाएगा।'
सवाल- 114 राफेल आने के बाद क्या हम एशिया में सबसे बड़ी वायुशक्ति बन जाएंगे?
जवाब- राजीव कुमार नारंग बोले कि मैं 'नंबर गेम' में विश्वास नहीं करता। महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय वायुसेना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। हम एक 'इवॉल्विंग फोर्स' हैं जो न सिर्फ तकनीक खरीद रही है, बल्कि उसे बनाने में भी भागीदार है, जैसे- AMCA और मेहर बाबा कॉम्पिटिशन। मैं विश्वास दिलाता हूं कि अगर दुश्मन ने हिमाकत की, तो हम उन पर भारी पड़ेंगे।
सवाल- 'मेक इन इंडिया' के तहत राफेल बनने से हमारे डिफेंस सेक्टर को क्या फायदा होगा? हम वास्तव में आत्मनिर्भर बनने से कितनी दूर हैं?
जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा कि हमें 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भरता' में अंतर समझना होगा। मेक इन इंडिया- इससे हमारी 'सप्लाई चेन' की कमजोरियां कम होती हैं। जब राफेल भारत में बनेगा, तो उसके स्पेयर पार्ट्स और रिपेयर के लिए हमें बार-बार फ्रांस नहीं जाना पड़ेगा। यह 'सिक्योरिटी ऑफ सप्लाई' देता है। वहीं, आत्मनिर्भरता- यह तब आती है जब 'इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी' (IP) और डिजाइन हमारा हो।
उन्होंने कहा, 'हमने अतीत में 800 से ज्यादा मिग-21 बनाए, लेकिन रूस ने हमें उसकी डिजाइन टेक्नोलॉजी नहीं दी, जिससे हम अपना जहाज नहीं बना पाए। राफेल का भारत में बनना अच्छा है क्योंकि इससे हमारे संबंध मजबूत होंगे और एक इकोसिस्टम बनेगा, लेकिन इससे LCA मार्क 2 या AMCA की अहमियत कम नहीं होनी चाहिए। असली आत्मनिर्भरता LCA और AMCA जैसे प्रोजेक्ट्स को सफल बनाने से ही आएगी, जिनका कंट्रोल पूरी तरह हमारे हाथ में होगा।'
आत्मनिर्भरता के लिए हमें एक स्पष्ट रोडमैप की जरूरत है। LCA मार्क 2 के लिए हमें समय पर निवेश करना होगा और जो भी संसाधन चाहिए, वे समय पर उपलब्ध कराने होंगे। इसी तरह, अमका (AMCA) प्रोजेक्ट को भी एक 'टाइम बाउंड' तरीके से तेज करना होगा।
MP IDSA के सीनियर फेलो बोले कि इसके लिए हमें 'ब्लॉक मॉडल' अपनाना चाहिए। हमें एक स्टेज पर आकर LCA या अमका मार्क-1 के Qualitative Requirements को 'फ्रीज' कर देना चाहिए। समस्या तब होती है जब हम आखिरी समय में कोई नया QR जोड़ते हैं, जिससे टेस्टिंग और इंटीग्रेशन में समय लगता है। इसमें डिजाइनर या एजेंसी की गलती नहीं होती, क्योंकि हर नया सिस्टम सेलेक्ट करने और उसे इंटीग्रेट कर सर्टिफाई करने में वक्त लगता है। इसलिए, हमें अमका में ब्लॉक मॉडल अप्रोच जल्द से जल्द अपना लेनी चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि एयरो इंजन आदि के लिए हमें 'स्पाइरल डेवलपमेंट अप्रोच' अपनानी चाहिए। आत्मनिर्भरता तभी संभव होगी जब हम इन नीतियों को धरातल पर उतारेंगे। मैं चाहूंगा कि अमका के अलग-अलग ब्लॉक्स के लिए अभी से एक 'विजन डॉक्यूमेंट' तैयार हो जाए। यही मॉडल LCA मार्क 2 के लिए भी होना चाहिए। 'फ्रीजिंग' और ब्लॉक मॉडल से किसी के पास देरी का कोई बहाना नहीं रहेगा। हमें जवाबदेही और समय पर काम पूरा करने की संस्कृति लानी होगी, खासकर अब जब प्राइवेट सेक्टर भी इसमें शामिल है।
रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन ने कहा, 'क्रिटिकल सिस्टम्स के लिए एक 'हायर बॉडी' का होना बहुत जरूरी है- चाहे आप उसे कमेटी कहें, काउंसिल कहें या कमीशन। स्पेस सेक्टर में हमारी सफलता का कारण यही है कि वहां एक हायर बॉडी निर्णय लेती है और सभी निर्णयकर्ता उसी में शामिल होते हैं। डिफेंस एक स्ट्रैटेजिक सेक्टर है, यहां समय बर्बाद होने का मतलब है टेक्नोलॉजी का पुराना हो जाना। अगर हम एक सशक्त हायर बॉडी बना पाएं, तो हमारी आत्मनिर्भरता की गति बहुत तेज हो जाएगी।'
सवाल- हमारे स्वदेशी फाइटर जेट्स कितने खतरनाक हैं? वह समय कब आएगा जब दूसरे देश हमारे स्वदेशी फाइटर जेट खरीदने के लिए लाइन लगाएंगे?
जवाब- राजीव कुमार नारंग ने कहा कि हमारी पब्लिक सेक्टर कंपनियों (PSUs) ने भारत के लिए अच्छे सिस्टम बनाए हैं, लेकिन वैश्विक पटल पर उनकी कुछ सीमाएं थीं। उनके 'अप्रूवल सिस्टम' में सुधार की गुंजाइश थी, जो पिछले 10 सालों में काफी बेहतर हुआ है। लेकिन वैश्विक स्तर पर आपको चपलता चाहिए, जो प्राइवेट सेक्टर बेहतर कर सकता है। मुझे उम्मीद है कि प्राइवेट कंपनियां टेक्नोलॉजी की ओनरशिप और आईपीआर भारत में क्रिएट करेंगी।
उन्होंने कहा, 'LCA मार्क 2 और अमका बेहद घातक सिस्टम बनने वाले हैं। LCA मार्क 1 और 1A में हमने काफी सुधार देखे हैं। मार्क 2 में हमें तेजी से सुधार करने होंगे ताकि फील्ड में आने तक यह आउटडेटेड न हो। इसमें मॉड्यूलर अप्रोच है, जिससे भविष्य में इसे अपग्रेड करना आसान होगा। वहीं, अमका एक नेक्स्ट जनरेशन फाइटर है- हम इसे 4.5 नहीं, बल्कि 5.5 जनरेशन कह रहे हैं।'
राजीव कुमार नारंग बोले कि हमारे वैज्ञानिक और टेस्ट पायलट्स दुनिया के बेहतरीन प्रोफेशनल्स में से हैं। बस एक कमी है- 'एयरो इंजन' का अपना होना। इसके लिए हमें 'कावेरी 2', 'कावेरी 3' और 120 किलो न्यूटन इंजन प्रोग्राम को सफल बनाना होगा। जिस दिन ये सफल हो गए, भारतीय फाइटर जेट्स विश्व स्तर पर अपनी क्षमता सिद्ध कर देंगे।
वे बोले, 'ये फाइटर्स सिर्फ अकेले नहीं उड़ेंगे, ये अपने साथ स्वार्म और मैन-अनमैन्ड टीमिंग क्षमता लेकर जाएंगे। इनके साथ एक अनमैन्ड कॉम्बैट सिस्टम आगे चलेगा, जिसमें मिसाइल्स होंगी। यह बहुत ही फ्यूचरिस्टिक अप्रोच है। हमने HLFT यानी Hindustan Lead-in Fighter Trainer प्रोग्राम से भी काफी कुछ सीखा है, जो हमारी वायुसेना को न केवल सक्षम बनाएगा बल्कि विश्व में स्थापित भी करेगा।'
सवाल- हम अनमैन्ड सिस्टम्स में अभी कितने आत्मनिर्भर हैं और आगे क्या करने की जरूरत है?
जवाब- राजीव कुमार नारंग ने बताया कि छोटे अनमैन्ड सिस्टम्स में हमने बहुत अच्छा काम किया है। ऑपरेशन सिंदूर से हमने सीखा कि क्रिटिकल सिस्टम्स में इम्पोर्ट डिपेंडेंसी को कैसे कम करना है। हमने इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, कमांड एंड कंट्रोल, डेटा लिंक्स और नेटवर्किंग में काफी सुधार किया है ताकि हमारे स्वार्म सिस्टम्स वर्ल्ड क्लास बन सकें।
उन्होंने आगे कहा, 'हायर क्लास सिस्टम्स की बात करें तो रुस्तम-1 यह शॉर्ट रेंज UAV है। तपस- मीडियम ऑल्टिट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस ड्रोन है, जो मुख्य रूप से निगरानी के लिए है। वहीं, आर्चर एनजी- तपस का नया वर्जन है। यह 300-400 किलो पेलोड के साथ मिसाइल और सेंसर दोनों ले जा सकेगा। इसके अलावा, DRDO की लैब ADE घातक (Ghatak) पर काम कर रही है। यह एक 'फ्लाइंग विंग डिजाइन' है, जिसमें स्टेल्थ फीचर्स हैं यानी यह रडार पकड़ में नहीं आता। इसकी टेक्नोलॉजी छोटे मॉडल पर टेस्ट हो चुकी है।'
वे बोले कि HAL 'कैट्स वॉरियर' बना रहा है, जो 'मैन-अनमैन्ड टीमिंग' का हिस्सा है। यह एक अनमैन्ड फाइटर है जो पायलट के साथ जाएगा, खतरों को पहले भांपेगा और जरूरत पड़ने पर हमला भी करेगा। साथ ही, हम 'हाई ऑल्टिट्यूड स्यूडो सैटेलाइट' (HAPS) पर काम कर रहे हैं जो सौर ऊर्जा से चलेगा और 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर महीनों तक उड़कर सर्विलांस कर सकेगा।
उन्होंने विश्वास दिलाते हुए कहा कि भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन हमें 'हैंड होल्डिंग' और प्रोजेक्ट्स को बंद होने से बचाने पर ध्यान देना होगा। हमें 'स्पाइरल डेवलपमेंट' अपनाना होगा। यानी अगर ब्लॉक-1 में कम क्षमता है तो उसे स्वीकार करें और ब्लॉक-2 में सुधार करें, बजाय इसके कि पूरा प्रोजेक्ट बंद कर दें। एक और चुनौती इंटीग्रेशन की है। हमारे बॉर्डर पर ITBP और BSF तैनात हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आर्मी, एयरफोर्स और पैरामिलिट्री फोर्सेस के ड्रोन और 'काउंटर-ड्रोन सिस्टम' आपस में इंटर-ऑपरेबल हों। दुश्मन भी अपनी तकनीक विकसित कर रहा है, इसलिए हमें लगातार इवॉल्व होना पड़ेगा।
मुझे लगता है कि भारत के लिए चार डिफेंस रिफॉर्म्स अत्यंत जरूरी हैं।
- जॉइंटनेस और R&D वर्टिकल- डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (DMA) और हेडक्वार्टर IDS में एक 'रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन वर्टिकल' होना चाहिए। इससे मिलिट्री इंजीनियर्स और डिजाइन टीम्स मिलकर काम कर सकेंगी, जिससे प्रोजेक्ट्स के फेल होने की दर कम होगी।
- डिफेंस फाइनेंस में तकनीकी विशेषज्ञता- डिफेंस फाइनेंस में जो अधिकारी टेक्नोलॉजी से डील करते हैं, उनका बैकग्राउंड इंजीनियरिंग का होना चाहिए। इसके लिए एक SOP बनना चाहिए।
- लीडरशिप में तकनीकी समझ- सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस प्रोडक्शन जैसे पदों पर ऐसे अधिकारियों को नियुक्त करना चाहिए जिनका इंजीनियरिंग बैकग्राउंड हो और जिन्होंने पहले डिफेंस टेक्नोलॉजी या DRDO में काम किया हो। इससे वे बेहतर तकनीकी निर्णय ले पाएंगे।
- विजन डॉक्यूमेंट- डिफेंस और एयरोनॉटिक्स के लिए आत्मनिर्भरता का एक 'विजन डॉक्यूमेंट' और रोडमैप होना चाहिए, जिसमें टाइमलाइन और जवाबदेही तय हो। अगर हम ऐसा इकोसिस्टम बना पाएं, तो भारतीय इंजीनियर्स की क्षमता का सही उपयोग होगा और भारत विश्व पटल पर अग्रणी भूमिका निभा पाएगा।