नितेश तिवारी की फिल्म 'रामायण' का नया गाना 'मंगल रंग' रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि इस बार गाने को लेकर हो रही चर्चा की वजह इसकी धुन या गायकों की आवाज नहीं, बल्कि इसका म्यूजिक स्टाइल है। भगवान राम और माता सीता के विवाह समारोह को दर्शाने वाले इस गाने में कथित कव्वाली और सूफी संगीत के प्रभाव को लेकर कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाए हैं। संगीतकार एआर रहमान को भी इस वजह से आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि गाने का संगीत रामायण जैसे पौराणिक महाकाव्य की पृष्ठभूमि के अनुरूप नहीं लगता, जबकि कई यूजर्स ने इसकी तुलना रहमान के पुराने गानों से की है। रणबीर कपूर और साई पल्लवी की मुख्य भूमिकाओं वाली इस फिल्म के गाने को लेकर शुरू हुई बहस अब संगीत की शैली और धार्मिक कथाओं पर बनने वाली फिल्मों की प्रस्तुति तक पहुंच गई है।
'मंगल रंग' में अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल की आवाज
'मंगल रंग' को भगवान राम और माता सीता के विवाह उत्सव के संगीतमय चित्रण के तौर पर फिल्म में शामिल किया गया है। इस गाने को अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल ने अपनी आवाज दी है। इसका संगीत एआर रहमान ने तैयार करने के साथ प्रोड्यूस और अरेंज भी किया है, जबकि इसके बोल कुमार विश्वास ने लिखे हैं। फिल्म में रणबीर कपूर भगवान राम और साई पल्लवी माता सीता की भूमिका निभा रही हैं। गाना सामने आने के बाद जहां कुछ श्रोताओं ने इसकी धुन और गायकी पर चर्चा की, वहीं दूसरे लोगों ने संगीत में सुनाई देने वाले कथित कव्वाली और सूफी प्रभाव पर आपत्ति जताई। सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर बहस शुरू हो गई कि रामायण जैसे महाकाव्य पर आधारित फिल्म के विवाह गीत का संगीत कैसा होना चाहिए।
एआर रहमान के पुराने गानों से हुई तुलना
गाने को लेकर एक्स पर कई यूजर्स ने इसकी तुलना एआर रहमान की पुरानी रचनाओं से की है। कुछ लोगों ने साल 2000 में आई तमिल फिल्म 'कंदुकोंडेन कंदुकोंडेन' के गीत 'एन्ना सोला पोगिराई' का जिक्र किया। यूजर्स का दावा है कि 'मंगल रंग' की धुन और संगीत संयोजन में उन्हें रहमान के पुराने काम की झलक सुनाई देती है। इसके अलावा रणबीर कपूर की साल 2011 में रिलीज हुई फिल्म 'रॉकस्टार' के लोकप्रिय गाने 'कुन फाया कुन' से भी इसकी तुलना की गई। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने 'मंगल रंग' को कव्वाली से प्रभावित बताते हुए निराशा जताई। हालांकि, ये प्रतिक्रियाएं श्रोताओं की व्यक्तिगत राय हैं और संगीत की शैली को लेकर सभी की एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं है।
किसी ने उठाए संगीत पर सवाल तो किसी ने गीतों के बोल पर
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि रामायण की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए गाने में भारतीय शास्त्रीय संगीत वाद्ययंत्रों का अधिक इस्तेमाल किया जा सकता था। इनमें वीणा, सितार, मृदंग और तबले जैसे वाद्ययंत्रों का नाम लिया गया। कुछ यूजर्स ने गीतों में संस्कृत शब्दों के इस्तेमाल की वकालत भी की और कहा कि इससे पौराणिक कथा के अनुरूप माहौल तैयार करने में मदद मिल सकती थी। वहीं कुछ लोगों ने गीत के बोल में इस्तेमाल किए गए सामान्य शब्दों पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें इसमें भक्ति और आध्यात्मिकता का अपेक्षित भाव महसूस नहीं हुआ। इन प्रतिक्रियाओं के बीच गाने के संगीत और उसके कथानक से मेल को लेकर बहस जारी है।
'रामायण' में रहमान के संगीत चयन पर भी उठे सवाल
कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने केवल 'मंगल रंग' ही नहीं, बल्कि फिल्म के लिए एआर रहमान को संगीतकार चुनने के फैसले पर भी सवाल उठाए हैं। आलोचकों ने उनकी पिछली फिल्मों के संगीत का हवाला देते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की। कुछ पोस्ट में 'छावा' के संगीत का भी जिक्र किया गया और दावा किया गया कि ऐतिहासिक तथा पौराणिक फिल्मों के लिए संगीत तैयार करते समय उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि सोशल मीडिया पर सामने आई ये प्रतिक्रियाएं फिल्म या उसके संगीत की अंतिम स्वीकार्यता तय नहीं करतीं। फिलहाल 'मंगल रंग' को लेकर छिड़ी बहस ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है कि भारतीय महाकाव्यों पर आधारित फिल्मों में संगीत की आधुनिक शैली और पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।