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Dulhaniya Le Aayegi Review: 32 की उम्र, कई दूल्हे और ढेर सारा ड्रामा, पुरानी बॉलीवुड वाइब देती है खुशाली कुमार की फिल्म

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Jul 24, 2026 03:30 pm IST,  Updated : Jul 28, 2026 11:03 pm IST

'दुल्हनिया ले आएगी' 32 वर्षीय नव्या की शादी से जुड़ी उलझनों पर आधारित एक हल्की-फुल्की पारिवारिक फिल्म है। खुशाली कुमार का अभिनय प्रभावी है, हालांकि अनुमानित पटकथा और ढीली एडिटिंग के कारण यह सामान्य मनोरंजन तक सीमित रहती है।

dulhaniya le aayegi
दुल्हनिया ले आएगी। Photo: IMDB
  • फिल्म रिव्यू: दुल्हनिया ले आएगी
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 24.07.2026
  • डायरेक्टर: आकाशादित्य लामा
  • शैली: कॉमेडी ड्रामा

भारतीय सिनेमा में हर फिल्म का उद्देश्य किसी गहरे सामाजिक संदेश को पहुंचाना या कहानी में भारी-भरकम और जटिल मोड़ लाना नहीं होता। कुछ फिल्में केवल दर्शकों को दैनिक जीवन के तनाव से राहत देने और रिश्तों की सहज मिठास को बड़े पर्दे पर उतारने के ईमानदार प्रयास के रूप में सामने आती हैं। आकाशादित्य लामा के निर्देशन में बनी फिल्म 'दुल्हनिया ले आएगी' इसी सादगी भरे और पारंपरिक ढर्रे पर आगे बढ़ती है। 24 जुलाई 2026 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई यह फिल्म 2 घंटे 7 मिनट के अपने रन-टाइम में दर्शकों को एक बेहद हल्का-फुल्का और तनावमुक्त सिनेमाई अनुभव प्रदान करने का लक्ष्य रखती है। किसी भी प्रकार के बौद्धिक या सामाजिक मुद्दे का भारी बोझ उठाए बिना, यह फिल्म अपनी सीधी-सादी प्रस्तुति, कलाकारों के बेहतरीन समन्वय और पारिवारिक हास्य के बल पर दर्शकों को जोड़े रखने का प्रयास करती है।

शादी के इर्द-गिर्द घूमती उलझनों, गलतफहमियों और हंसी की कहानी

फिल्म का पूरा कथानक नव्या नाम की एक आधुनिक लेकिन पारिवारिक मूल्यों से जुड़ी युवती के जीवन के इर्द-गिर्द बुना गया है। नव्या का परिवार लंबे समय से उसकी शादी के लिए एक सुयोग्य और आदर्श वर की तलाश में जुटा हुआ है। हालांकि, जब नव्या 32 वर्ष की उम्र पार करने के बाद आखिरकार विवाह के लिए अपनी रजामंदी देती है, तब से परिस्थितियां एक बिल्कुल ही अप्रत्याशित और हास्यास्पद मोड़ लेना शुरू कर देती हैं। कहानी जिस सीधी राह पर आगे बढ़ रही होती है, उसमें अचानक तब बड़ा भूचाल आता है जब नव्या के जीवन में एक-दो नहीं, बल्कि एक साथ कई दावेदार यानी दूल्हे दस्तक देते हैं। इसके बाद शुरू होता है पारिवारिक ड्रामा, गलतफहमियों का ताना-बाना, मजेदार घटनाएं और भावनात्मक उतार-चढ़ाव का एक लंबा सिलसिला। पूरे घटनाक्रम में मुख्य आकर्षण इस बात पर टिका रहता है कि इन तमाम दूल्‍हों की भीड़, भ्रम और पारिवारिक दबाव के बीच आखिरकार नव्या के लिए कौन सा जीवनसाथी सही साबित होगा। पटकथा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बिना किसी गैर-जरूरी ड्रामे या शोर-शराबे के अंत तक इस उत्सुकता को बनाए रखने का प्रयास करती है।

कलाकारों का प्रदर्शन

अभिनय के दृष्टिकोण से देखा जाए तो फिल्म का मुख्य आकर्षण इसकी स्टारकास्ट की बेहतरीन परफॉर्मेंस है। मुख्य भूमिका निभा रही खुशाली कुमार ने इस पूरे प्रोजेक्ट को न केवल मजबूती से लीड किया है, बल्कि अपने अभिनय से इसे एक मजबूत आधार भी दिया है। नव्या के किरदार में उनकी संवाद अदायगी बेहद स्वाभाविक है और कैमरे के सामने उनका आत्मविश्वास लगातार प्रभावित करता है। भावुक दृश्यों में उनका अभिनय बहुत गहराई और संवेदनशीलता दिखाता है, वहीं रोमांटिक और कॉमिक पलों में उनका सहज अंदाज दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान लाने में पूरी तरह सफल रहता है। एक अनुभवी और मंझे हुए अभिनेता के रूप में वे अपने किरदार में विशेष गरिमा और परिपक्वता लाते हैं, जिससे पारिवारिक ढांचा बेहद मजबूत लगता है। अपनी अलग अभिनय शैली और अनूठे संवाद अदायगी के जरिए वे हर दृश्य में एक नया आकर्षण जोड़ते हैं।

कहानी के प्रवाह में काफी सहजता से फिट बैठते हैं और उन्होंने अपने हिस्से की भूमिका को काफी न्यायपूर्ण तरीके से निभाया है। अपनी खास मौजूदगी से फिल्म के हास्य और पारिवारिक माहौल को और अधिक रंगीन बनाने का काम करती हैं। पूरी स्टारकास्ट के बीच एक बहुत ही जीवंत तालमेल दिखाई देता है, जो पर्दे पर एक असली और आत्मीय परिवार का अहसास कराने में सक्षम होता है।

सरल निर्देशन, मनमोहक संगीत और तकनीकी पक्ष

आकाशादित्य लामा का निर्देशन काफी सीधा, स्पष्ट और व्यावहारिक है। उन्होंने कहानी को बेवजह जटिल, डार्क या अति-सिनेमाई बनाने की बिल्कुल कोशिश नहीं की है, जो इस तरह के हल्के-फुल्के पारिवारिक ड्रामे के लिए सही साबित होता है। तकनीकी मोर्चे पर फिल्म का कैमरा वर्क काफी साफ-सुथरा और रंगीन है। शादी-ब्याह के माहौल, भव्य समारोहों और भारतीय पारिवारिक उत्सवों को बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कहानी के भावनात्मक और हास्य से भरे मोड़ों को प्रभावी ढंग से निखारता है। संगीत भी पटकथा की गति में बाधक बनने के बजाय उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है। अगर एडिटिंग की बात करें तो फिल्म का पहला हाफ काफी कसा हुआ और चुस्त है, जिससे दर्शक शुरुआत से ही कहानी के साथ सहजता से जुड़ जाते हैं।

वे पहलू जहां फिल्म का प्रभाव थोड़ा कमजोर पड़ता है

तमाम सकारात्मक और मनोरंजक पहलुओं के बावजूद फिल्म में कुछ ऐसी कमियां भी मौजूद हैं जो इसके समग्र असर को थोड़ा सीमित करती हैं। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी का बहुत ज्यादा प्रेडिक्टेबल होना है। दर्शक पहले से ही आने वाले मोड़ों और घटनाक्रमों का अंदाजा काफी आसानी से लगा लेते हैं। कई जगहों पर मुख्य संकटों और समस्याओं को बहुत ही आसानी और सुविधाजनक तरीके से सुलझा दिया जाता है, जिससे जो तनाव या रोमांच बनना चाहिए था, वह बीच में ही खत्म हो जाता है। जहां पहला हाफ काफी चुस्त और मनोरंजक है, वहीं दूसरे हिस्से में एडिटिंग थोड़ी ढीली महसूस होती है। कुछ दृश्यों को यदि छोटा किया जाता तो फिल्म अधिक प्रभावी बन सकती थी। सस्पेंस को लंबे समय तक खींचने के प्रयास में कुछ परिस्थितियां दोहराव भरी लगने लगती हैं।

वर्डिक्ट

संक्षेप में कहें तो 'दुल्हनिया ले आएगी' एक ऐसी फिल्म है जो दर्शकों पर किसी बड़े या भारी-भरकम संदेश का बोझ डाले बिना, केवल प्यार, रिश्तों की गर्माहट और हल्के-फुल्के हास्य के सहारे एक मनोरंजक माहौल तैयार करती है। खुशाली कुमार की आत्मविश्वास से भरी परफॉर्मेंस और वरिष्ठ कलाकारों का मजबूत साथ इसे एक देखने योग्य फिल्म बनाता है। अगर अनुमानित पटकथा और दूसरे हाफ की ढीली एडिटिंग के कारण यह कोई बहुत गहरा या ऐतिहासिक प्रभाव नहीं छोड़ पाती, फिर भी यदि आप अपने परिवार के साथ बिना किसी तनाव के दो घंटे का शांत, रंगीन और सहज मनोरंजन चाहते हैं तो यह 3-स्टार रेटिंग वाली फिल्म एक अच्छा और सुखद विकल्प साबित होती है।

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