इस समय में जब ज्यादातर फिल्में किसी खास जॉनर या फार्मूले के इर्द-गिर्द घूम रही हैं, वहीं इस हफ्ते रिलीज हो रही फिल्म 'मन्नू क्या करेगा' एक ऐसी फिल्म है जो अपनी सादगी और सच्चाई से दिल जीत लेती है। शरद मेहरा द्वारा निर्मित और संजय त्रिपाठी द्वारा निर्देशित ये फिल्म न तो बड़े-बड़े ट्विस्ट्स का शोर मचाती है, न ही इमोशन्स का ओवरडोज देती है, यह फिल्म धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से आपके दिल में उतरती है। आप थिएटर से बाहर निकलते हैं तो चेहरे पर एक मुस्कान होती है और दिल में एक हल्की-सी सोच, लेकिन इसके साथ ही फिल्म कुछ हिस्सों में भटकती भी है, लेकिन वापस पटरी पर लौटना ही इसे बचा रहा है। शुरुआत करते हैं फिल्म की कहानी के साथ।
फिल्म की कहानी
फिल्म की कहानी है मानव चतुर्वेदी, जिसे सब प्यार से मन्नू कहते हैं। देहरादून में रहने वाला ये कॉलेज स्टूडेंट एक ऐसा लड़का है जो सबका चहेता है, हंसमुख, बेफिक्र और लोगों की मदद करने वाला। लेकिन मन्नू की सबसे बड़ी दिक्कत है कि उसे ये ही नहीं पता कि उसे जिंदगी में करना क्या है। कई बार हम सब भी ऐसे ही दौर से गुजरते हैं, एक ऐसी उम्र जब सपने तो बहुत होते हैं, पर दिशा नहीं मिलती। इसी बीच उसकी जिंदगी में आती है जिया, एक बेबाक, आजाद ख्यालों वाली लड़की, जो खुद की शर्तों पर जीना जानती है। जिया से मन्नू की मुलाकात सिर्फ एक मोड़ नहीं, बल्कि एक नया रास्ता बन जाती है।
धीरे-धीरे दोस्ती गहराती है और वही रिश्ता मन्नू को उसकी जिंदगी का मकसद समझाता है। प्यार, भ्रम, असफलताएं और खुद की तलाश, मन्नू का ये सफर बेहद खूबसूरत ढंग से दर्शाया गया है। निर्देशक संजय त्रिपाठी ने एक बेहद सिंपल कहानी को इतने ईमानदार और सुलझे हुए अंदाज में परदे पर उतारा है कि फिल्म कभी बनावटी नहीं लगती। उन्होंने किरदारों को बोलने नहीं, महसूस होने दिया है। कुछ सीन जरूर ऐसे हैं जिन्हें हटाया जा सकता था। फिल्म में कई गाने ऐसे हैं, जिन्हें या तो छोटा किया जा सकता था या हटाया जा सकता था, 2 घंटे 20 मिन की फिल्म और बंधी हुई लगती अगर इसे 2 घंटे में खत्म करने का प्रयास किया जाता और इसके बोझिल करने वाले क्षण भी कम हो जाते।
कैसा है अभिनय?
व्योम यादव ने मन्नू के किरदार को जैसे जिया है। यह उनका डेब्यू है लेकिन कहीं से भी ऐसा नहीं लगता। उनके चेहरे पर जो मासूमियत और उलझन है, वही उन्हें इतना रिलेटेबल बनाती है।साची बिंद्रा भी बतौर जिया एक दमदार छाप छोड़ती हैं, उनका आत्मविश्वास, बिंदास अंदाज और संवेदनशीलता, तीनों खूब जचते हैं। सहायक कलाकारों में कुमुद मिश्रा और चारु शंकर ने मानव के माता पिता के रूप में बहुत अच्छा काम किया है और खासतौर पर विनय पाठक (जो एक मजेदार और यादगार किरदार में हैं) सभी ने अपने-अपने हिस्से को शानदार ढंग से निभाया है।
तकनीकी पक्ष
कैमरे का काम फिल्म में कमाल का है। देहरादून की वादियां, पहाड़ों की सादगी और छोटे शहर की खुशबू पर्दे से बाहर तक महसूस होती है। सिनेमैटोग्राफर ने हर फ्रेम को इतना नैचुरल रखा है कि दृश्य सिर्फ देखने लायक नहीं, जीने लायक लगते हैं। फिल्म का संगीत इसकी रूह है। नौ गानों की एल्बम में से 'मन्नू तेरा क्या होगा', 'फना हुआ', 'हमनवा' और 'तेरी यादें' जैसे गाने पसंद आएंगे। गाने सिर्फ सिचुएशन के लिए नहीं बनाए गए हैं, बल्कि ये कहानी को भावनात्मक ढंग से आगे बढ़ाते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भी फिल्म की टोन से मेल खाता है न ओवरडन, न अधूरा, एकदम सधा हुआ।
निर्देशन और लेखन
सौरभ गुप्ता और राधिका मल्होत्रा की लिखी स्क्रिप्ट कहीं भी फिसलती नहीं है। कहानी बहती है, कभी तेज, कभी शांत, लेकिन दर्शक को हमेशा अपने साथ लिए चलती है। संवाद भी आम जिंदगी के हैं, लेकिन वही उन्हें असरदार बनाते हैं। कहानी की शुरुआत थोड़ी स्लो है, जो आपको थोड़ा संयम बनाए रखने पर मजबूर करती है, लेकिन फिर क्लामेक्स तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म को सही दिशा मिल जाती है। प्रोड्यूसर शरद मेहता और क्यूरियस ऑय फिल्म्स ने एक ऐसी फिल्म बनाई है जो न तो ज्यादा लाउड है और न ही दिखावटी। यह एक साफ-सुथरी, दिल से निकली हुई कहानी है जो दर्शकों से सीधे जुड़ती है। कमर्शियल एलिमेंट्स के बिना भी फिल्म में वो सब कुछ है जो एक अच्छी फिल्म में होना चाहिए। ठीक जैसे 'सैयारा' से जेन जी रिलेट कर पाए थे, इस फिल्म से भी कर पाएंगे, पूरी तरह से ये फिल्म युवाओं और कॉलेज जाने वाले नौजवानों के लिए है।
क्यों देखें ये फिल्म?
अगर आप ओवरडोज ड्रामा और मसालेदार फिल्मों से थोड़ा ब्रेक लेना चाहते हैं और अगर आप एक सच्ची, साफ-सुथरी और दिल छूने वाली कहानी देखना चाहते हैं तो 'मन्नू क्या करेगा' आपके लिए ही बनी है। 'मन्नू क्या करेगा' एक ऐसी फिल्म है जो अपने किरदारों की मासूमियत, रिश्तों की सच्चाई और जिंदगी की जद्दोजहद को बहुत ही खूबसूरत अंदाज में दिखाती है।