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The India Story Review: थाली में जहर के कड़वे सच को उजागर करती है श्रेयस तलपड़े की फिल्म, कमियों के बावजूद आंखें खोलने वाली फिल्म

 Written By: Jaya Dwivedie
 Published : Jul 24, 2026 02:47 pm IST,  Updated : Jul 24, 2026 02:47 pm IST

'द इंडिया स्टोरी' खाद्य पदार्थों में मिलावट व कीटनाशकों से कैंसर जैसे गंभीर मुद्दे को उठाती है। श्रेयस तलपड़े का अभिनय प्रभावी है, लेकिन ढीली पटकथा, असमान गति और नाटकीयता के कारण फिल्म की कानूनी लड़ाई कमजोर पड़ जाती है।

The India Story
श्रेयस तलपड़े और काजल अग्रवाल। Photo: THE INDIA STORY PRESS KIT
  • फिल्म रिव्यू: द इंडिया स्टोरी
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: 24/07/2026
  • डायरेक्टर: चेतन डीके
  • शैली: सोशल ड्रामा

हमारे दैनिक जीवन में खान-पान की शुद्धता को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। बाजार में दूध, घी, पनीर और अनाज में मिलावट से जुड़ी खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं। ऐसे समय में जब उपभोक्ता ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब इस गंभीर विषय पर बात करना बेहद प्रासंगिक हो जाता है। लेखक सागर बी शिंदे और निर्देशक चेतन डीके की फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी’ इसी बेहद संवेदनशील और समकालीन मुद्दे को बड़े पर्दे पर उठाने का काम करती है। फिल्म एक ऐसे विषय पर रोशनी डालती है, जिस पर सिनेमा जगत में अक्सर सन्नाटा देखने को मिलता है। यह दर्शाती है कि कैसे खाद्य उत्पादन में जहरीले कीटनाशकों का अनियंत्रित उपयोग आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक साइलेंट किलर बनता जा रहा है और देश में कैंसर के बढ़ते मामलों का एक बड़ा कारण साबित हो रहा है। हालांकि अपनी प्रस्तुति में कुछ उतार-चढ़ाव और कमियों के बावजूद फिल्म एक जरूरी सामाजिक बहस की शुरुआत करने का ईमानदार प्रयास जरूर करती है। पूरा रिव्यू पढ़ने से पहले जानें कैसा था ट्रेलर।

कहानी का ताना-बाना

कहानी की शुरुआत एक बेहद भावुक पृष्ठभूमि से होती है। पूर्व आर्मी मेजर योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) अपनी सात साल की बेटी परी (त्रिषा सारडा) को खो चुके हैं, जिसकी मौत कीटनाशकों के ज़हरीले तत्वों से हुए ब्लड कैंसर के कारण हो जाती है। अपनी बच्ची की असामयिक मौत से टूट चुके योगेश न्याय के लिए संघर्ष करने का फैसला करते हैं। वह बहुराष्ट्रीय कीटनाशक कंपनियों, सरकार और यहां तक कि लापरवाही से कीटनाशक इस्तेमाल करने वाले किसानों के खिलाफ मामला दर्ज कराने के लिए पुलिस और वकीलों के चक्कर काटते हैं। शुरुआत में हर जगह से दुत्कारे जाने के बाद योगेश को अर्चना (काजल अग्रवाल) का साथ मिलता है, जो एक नई और पहली बार केस लड़ रही वकील हैं। काफी मशक्कत के बाद जब यह याचिका अदालत में स्वीकार होती है तो एक राष्ट्रव्यापी कानूनी लड़ाई की शुरुआत होती है। केस की निष्पक्ष जाँच के लिए कोर्ट द्वारा नियुक्त अधिकारी आईजी विजय राठौड़ (मुरली शर्मा) को जिम्मेदारी सौंपी जाती है, जो पूरे देश में घूम-घूमकर कृषि क्षेत्र में चल रही धांधलियों और गड़बड़ियों की पड़ताल करते हैं।

जांच के दौरान कहानी पंजाब में हरित क्रांति के प्रभाव बठिंडा और बीकानेर के बीच चलने वाली प्रसिद्ध 'कैंसर ट्रेन' और केरल के कासरगोड में हुई कीटनाशक त्रासदी जैसी वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं को भी छूती है। यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि कैसे एक जमाने में अनाज उत्पादन बढ़ाने वाला तरीका समय के साथ स्वास्थ्य संकट में बदल गया।

कलाकारों का प्रदर्शन

फिल्म में अभिनय के स्तर पर कलाकारों ने कहानी के भावनात्मक स्तर को बनाए रखने में अपनी तरफ से अच्छा योगदान दिया है। एक दुखी, लाचार और संघर्षरत पिता के रूप में श्रेयस तलपड़े का अभिनय बेहद प्रभावी और निष्ठावान है। अदालत के दृश्यों में उनकी सादगी और संयम प्रभाव छोड़ता है। फ्लैशबैक के दृश्यों में वे अपनी बीमार बेटी के साथ एक मजबूत भावनात्मक जुड़ाव पैदा करते हैं। क्लाइमेक्स के दौरान उनका राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत मोनोलॉग एक सैनिक और पिता दोनों के दर्द को बखूबी जाहिर करता है। अपनी पहली कानूनी लड़ाई लड़ रही वकील के रूप में काजल अग्रवाल ने अपने हिस्से की भूमिका को ठीक-ठाक निभाया है। वे अदालती भाषणों को अच्छे प्रवाह में पेश करती हैं, हालांकि कुछ भावुक दृश्यों में उनकी अभिव्यक्ति थोड़ी असमान महसूस होती है। बाल कलाकार त्रिषा सारडा का काम काफी सराहनीय है। अपनी बीमारी और इलाज के दौर से गुजरती मासूम बच्ची के रूप में उनका अभिनय दर्शकों को गहराई से प्रभावित करता है। पिता और बेटी के सुखद पलों से लेकर बीमारी के दौरान आए शारीरिक बदलाव तक का उनका प्रदर्शन बहुत ही वास्तविक लगता है। एक ईमानदार और निष्पक्ष जांच अधिकारी के रूप में मुरली शर्मा ने संयमित अभिनय किया है और कहानी को एक मजबूत सहारा दिया है। कॉर्पोरेट कंपनियों का बचाव कर रहे हाई-प्रोफाइल वकील के किरदार में मनीष वाधवा ने आक्रामक रुख अपनाया है, जो अदालती बहसों में तनाव पैदा करने का काम करता है।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

चेतन डीके का निर्देशन फिल्म के मुख्य विचार को दर्शकों तक पहुंचाने में काफी हद तक सफल रहता है, विशेषकर जब फिल्म अदालत के भीतर या अस्पताल के संवेदनशील दृश्यों में केंद्रित रहती है। मुंबई के ओवरक्राउडेड कोटा अस्पताल में इलाज के दौरान एक आम परिवार द्वारा झेली जाने वाली तंगहाली और मुश्किलों का चित्रण बहुत ही वास्तविकता के साथ किया गया है, जो दर्शकों को भावुक करता है।

हालांकि तकनीकी स्तर पर फिल्म में कुछ कमियां साफ दिखाई देती हैं। एडिटिंग में निरंतरता की कमी है और कई दृश्यों के बीच के कट्स काफी अचानक महसूस होते हैं। फिल्म की गति भी पूरी कहानी के दौरान एक समान नहीं रह पाती, कभी यह बहुत तेजी से आगे बढ़ती है तो कभी लंबी भावनात्मक यादों में धीमी पड़ जाती है। इसके अलावा, फ्लैशबैक के शुरुआती हिस्सों में मुख्य किरदार की स्टाइलिंग और हेयरस्टाइल पर थोड़ा और ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी।

वे पहलू जहां फिल्म थोड़ी कमजोर पड़ गई

फिल्म एक बहुत बड़ा और प्रासंगिक मुद्दा उठाने के बावजूद कुछ जगहों पर अपनी पकड़ खो देती है। एक इतने बड़े और तकनीकी विषय पर आधारित कानूनी लड़ाई के लिए जिस तरह की तीखी और तथ्य-परक अदालती बहसों की जरूरत थी, वे कई मौकों पर थोड़ी दोहराव भरी और सतही बनकर रह जाती हैं। कहानी में किसानों द्वारा रसायनों के इस्तेमाल पर तो उंगली उठाई जाती है, लेकिन उस पूरे तंत्र और बिचौलियों के गोदामों में होने वाले छिड़काव पर उतनी गहराई से बात नहीं हो पाती, जो किसानों को इन चीजों के इस्तेमाल के लिए मजबूर करते हैं। जब दर्शक पहले ही पीड़ित पिता के प्रति सहानुभूति महसूस कर चुके होते हैं, तब भी कहानी का एक बड़ा हिस्सा लंबे और रोने-धोने वाले फ्लैशबैक में खपा दिया जाता है, जिससे मुख्य कानूनी लड़ाई की गति धीमी पड़ जाती है। वकील अर्चना के किरदार से जुड़ा ट्विस्ट और बाजार में उनके साथ हुई बदसलूकी के तुरंत बाद लोगों का अचानक उनके समर्थन में आ जाना जैसे दृश्य थोड़े नाटकीय और जबरन थोपे हुए महसूस होते हैं। इतने व्यापक राष्ट्रीय संकट को उठाने के बाद फिल्म का अंत किसी बहुत बड़े या कड़े बदलाव के बजाय केवल सरकार द्वारा कंपनियों को 'सलाह' देने जैसे बेहद सामान्य निर्देश पर समाप्त होता है।

वर्डिक्ट

‘द इंडिया स्टोरी’ एक ऐसी फिल्म है जो समाज के एक बेहद महत्वपूर्ण और अनदेखे पहलू पर रोशनी डालने का साहसिक काम करती है। श्रेयस तलपड़े का संवेदनशील अभिनय, बीमार बच्ची का मार्मिक चित्रण और खाद्य सुरक्षा से जुड़े गंभीर तथ्य इस फिल्म को देखने लायक बनाते हैं। अगर ढीली पटकथा, असमान गति और नाटकीयता के कारण फिल्म वह तीखा असर नहीं छोड़ पाती जिसकी इससे उम्मीद थी, फिर भी एक प्रासंगिक सामाजिक संदेश देने और जागरूकता फैलाने के इसके प्रयास को सराहा जाना चाहिए। यदि आप गंभीर विषयों और सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्में देखना पसंद करते हैं तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है।

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