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मॉनसून की लुका-छिपी और रेतीला बवंडर... कोई जादू नहीं, जानिए आसमान से बादलों के अचानक गायब होने का पूरा विज्ञान

 Written By: Priya Singh Somvanshi Edited By: Malaika Imam
 Published : Jun 25, 2026 06:02 pm IST,  Updated : Jun 25, 2026 06:15 pm IST

भारत में मॉनसून अचानक थम गया है और बादल बिना बरसे गायब हो रहे हैं। इस बेरुखी से मिट्टी सूखने के कारण देश में रेतीले बवंडर उठ रहे हैं, जो यह चेतावनी है कि अगर हम अब भी नहीं संभले तो आने वाले सालों में प्रकृति का संतुलन और बिगड़ेगा।

भारत में इन दिनों किसान से लेकर व्यापारियों और आम आदमी तक बारिश का इंतजार कर रहा है। बादल तो आसमान में आते हैं, लेकिन बरसने की जगह कुछ देर में गायब हो जाते हैं और हाथ आती है सिर्फ निराशा। 14 जून तक सबकुछ ठीक लग रहा था। सैटेलाइट तस्वीरों में भारत के बड़े हिस्से पर घने मॉनसूनी बादलों का पहरा था। किसान खुश थे कि इस बार बारिश वक्त पर राहत देगी। लेकिन अगले ही दिन, यानी 15 जून को जब मौसम वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट डेटा देखा, तो उनके होश उड़ गए।

वो सारे बादल, जो कल तक बरसने को बेताब थे, अचानक गायब हो चुके थे। अब तक सामान्य बारिश 4 से 15 जून 53.7 मिमी होनी चाहिए थी, जबकि वास्तविक बारिश सिर्फ 19.2 मिमी दर्ज की गई। यानी बारिश में पूरे 64% की भारी कमी आई। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मॉनसून आते-आते ठिठक गया? मौसम की इस लुका-छिपी के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि बड़े वैज्ञानिक कारण हैं-

1- मॉनसून का 'ब्रेक' फेज

जब मॉनसून आगे बढ़ता है, तो उसे लगातार नमी की जरूरत होती है। इस बार बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में हवा का दबाव ऐसा बदला कि मॉनसून की रफ्तार सुस्त पड़ गई। इसे मौसम विज्ञान में 'मॉन्सूनल ट्रफ' का खिसकना कहते हैं, जिससे बादल बनने की प्रक्रिया अचानक रुक गई।

2- अल नीनो का 'हैंगओवर' 

भले ही अल नीनो कमजोर हो रहा है, लेकिन प्रशांत महासागर के गर्म होने का जो असर पिछले महीनों में हुआ, उसका 'हैंगओवर' अभी भी भारतीय वायुमंडल पर है। हवाओं में वो नमी नहीं मिल पा रही है, जो बादलों को बांधकर रख सके।

3- एंटी-चक्रवात

भारत के मध्य और उत्तर-पश्चिमी हिस्से के ऊपर एक हाई-प्रेशर जोन बन गया। यह जोन हवा को ऊपर उठने से रोकता है। जब हवा ऊपर उठकर ठंडी नहीं होगी, तो बादल कैसे बनेंगे? नतीजा- बादल गायब हो गए। इन दिनों बार-बार कई इलाकों में रेतीला बवंडर भी उठ रहा है। सवाल है कि रेतीला बवंडर क्यों आ रहा है?

रेतीले बवंडर में अचानक आसमान पीला हो जाता है और धूल का एक गुबार आसमान में तेज़ी से उठने लगता है। इसके पीछे की कहानी भी मॉनसून की कमी से जुड़ी इसका सीधा गणित है, जब बारिश नहीं हुई, तो मिट्टी की नमी खत्म हो गई। मिट्टी बिल्कुल पाउडर जैसी सूखी हो गई। जब दोपहर में सूरज धरती को भट्टी की तरह तपाता है, तो जमीन के पास की हवा गर्म होकर बहुत तेजी से ऊपर उठती है। इस खाली जगह को भरने के लिए आस-पास की हवाएं चक्रवात की तरह घूमती हुई आती हैं और अपने साथ सूखी मिट्टी को आसमान में उड़ा ले जाती हैं, जिससे एक रेतीला बवंडर नज़र आता है, लेकिन आपको अगर लग रहा है कि यह सिर्फ भारत की लोकल समस्या है, तो आप गलत हैं।

इस मॉनसून के गायब होने और बवंडर आने के पीछे कुछ ऐसे फैक्ट्स हैं जो आपको हैरान कर देंगे-

पहला- मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) का खेल

यह समुद्र के ऊपर चलने वाला बादलों और हवाओं का एक ऐसा चक्र है जो पूरी दुनिया का चक्कर लगाता है। इस समय यह चक्र हिंद महासागर से दूर, प्रशांत महासागर की तरफ शिफ्ट हो गया है। जब तक MJO भारत के पास नहीं लौटता, यह मॉनसून को "सप्रेस" (दबाकर) रखता है। यानी बादल चाहकर भी भारी बारिश नहीं कर पाते।

दूसरा- जेट स्ट्रीम की मनमानी

धरती से करीब 10-12 किलोमीटर ऊपर बहने वाली तेज हवाओं को 'जेट स्ट्रीम' कहते हैं। आमतौर पर जून में इन्हें भारत के उत्तर में खिसक जाना चाहिए था। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण इस बार ये हवाएं भारत के ऊपर ही रुकी हुई हैं, जो ऊपर से गर्म हवा को नीचे की तरफ धकेल रही हैं और बादलों को बनने ही नहीं दे रहीं।

तीसरा- अर्बन हीट आइलैंड

ये रेतीले बवंडर गांवों से ज्यादा शहरों (जैसे दिल्ली-NCR, जयपुर) के आस-पास क्यों दिख रहे हैं? क्योंकि कंक्रीट के जंगल (इमारतें और सड़कें) सूरज की गर्मी को सोख लेते हैं। इससे शहरों के ऊपर का तापमान आस-पास के ग्रामीण इलाकों से तक ज़्यादा हो जाता है। यह भयानक गर्मी उन धूल के बवंडरों के लिए 'फ्यूल' (ईंधन) का काम करती है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह मॉनसून का एक अस्थायी ठहराव है। जून के ख़त्म होते होते हवाओं का रुख दोबारा बदलेगा। जैसे ही अरब सागर से नमी वाली हवाएं दोबारा रफ्तार पकड़ेंगी, ये रेतीले बवंडर शांत हो जाएंगे और गायब हुए बादल एक बार फिर गरज-चमक के साथ लौटेंगे। लेकिन ये समझना होगा प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण अब मौसम के मिजाज को भांपना कितना मुश्किल होता जा रहा है। 24 घंटे में बादलों का गायब होना और धूल का तांडव, इसी बदलते क्लाइमेट का एक ट्रेलर है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हवा गर्म हो रही है, और गर्म हवा की पानी सोखने की क्षमता ज़्यादा होती है। इसका नतीजा क्या होता है? बादल कई दिनों तक बिना बरसे हवा में नमी सोखते रहते हैं और फिर अचानक किसी एक जगह पर 'क्लाउड बर्स्ट' (बादल फटना) या तीन दिन की बारिश तीन घंटे में गिरा देते हैं। इसी वजह से हमें एक तरफ तो 64% का सूखा-सूखा दिखता है, और अगले ही हफ्ते किसी शहर में बाढ़ आ जाती है।

पहले मॉनसून 1 जून को केरल आता था और धीरे-धीरे पूरे देश को तरबतर करता था। अब मॉनसून की टाइमिंग बदल चुकी है। यह कभी पहले आ जाता है, तो कभी आकर हफ्तों तक एक ही जगह अटक जाता है। यह जो बादलों का अचानक गायब होना है, यह इसी असंतुलन का नतीजा है। हम सिर्फ एक खराब मौसम का सामना नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम इंसानों ने धरती के थर्मोस्टेट को इतना बिगाड़ दिया है कि अब कुदरत भी असमंजस में है। आज आसमान से बादल गायब हैं, कल शायद नदियां गायब हो जाएं। अब वक्त है संभल जाने का, नहीं तो आने वाले सालों में प्रकृति का संतुलन और बिगड़ेगा, तो हमे और समस्याओं का सामना करना पड़ेगा।

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