नई दिल्ली: समलैंगिग संबधो को लेकर भारत सहित दुनिया भर मे कई देश है जहां इसको लेकर बहस जारी है,कुछ लोग समलैंगिग लोगों के पक्ष में नजर आते हैं तो कई ऐसे है जो इसे नापसंद करते हुए इसे संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखने की वकालत करते हैं। भारत में भी आईपीसी की धारा 377 के तहत 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से अननैचुरल सेक्स करते हैं,और दोषी करार दिए जाते है तो ऐसे लोगों को 10 साल या उम्र भर की सजा हो सकती है।
- 1290 मे यूके में पहला मामला सामने आया
- समलैंगिग संबंधो का पहला मामला 1290 में इंग्लैंड के पलेटा में सामने आया था जिसके बाद पहली बार कानून बनाकर इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया।
- बगरी कानून के तहत फांसी की सजा
- बाद में 1533 के अननैचुरल संबंधो के लिए बगरी कानून के तहत फांसी देने की सजा का प्रावधान रखा गया।
- 1817 में बगरी एक्ट संसोधित हुआ
- 1817 में बगरी एक्ट के तहत संशोधन करते हए ओरल सेक्स के प्रावधान को हटा दिया गया और 1861 में डेथ पेनाल्टी का प्रावधान भी हटा लिया गया।
- भारत में लार्ड मैकाले के इंडियन पीनल कोड के साथ 377 का आगमन हुआ
- 1861 में लॉड मैकाले ने इंडियन पीनल कोड ड्राप्ट किया और उसी के तहत धारा 377 का प्रावधान किया गया।
भारत में समलैंगिग संबंधो के मामले पर सुप्रीम कोर्ट का साफ आदेश है कि जब तक आईपीसी की धारा 377 है समलैंगिग संबंधो में सजा का प्रावधान रहेगा 1 हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए गेंद भारत सरकार के पाले में डाल दी है कि संसद के पास धारा 377 को हटाने का अधिकार है,लेकिन जब तक कानून है समलैंगिग संबंधो को वैध करार नहीं दिया जा सकता है।