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BLOG: मैं युवराज तो नहीं लेकिन मैने भी कैंसर को हराया है...

 Written By: India TV News Desk
 Published : Feb 03, 2016 11:21 pm IST,  Updated : Feb 03, 2016 11:21 pm IST

जूता न पहन पाने की टीस क्या होती है यह उस बच्चे से पूछिए जिसने यह भोगा है। पैसा, शिक्षित और संपन्न परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद एक लड़का दूसरों को अच्छे-2 और नए-नए जूते पहनते देखता है, दिल उसका भी करता है लेकिन मन मसोस कर रह जाता है।

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(कैंसर दिवस पर मेरी कहानी...)

जूता न पहन पाने की टीस क्या होती है यह उस बच्चे से पूछिए जिसने यह भोगा है। पैसा, शिक्षित और संपन्न परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद एक लड़का दूसरों को अच्छे-2 और नए-नए जूते पहनते देखता है, दिल उसका भी करता है लेकिन मन मसोस कर रह जाता है। वजह सिर्फ इतनी सी रहती है कि शुरुआती स्टेज का कैंसर बच्चे के पैर की हड्डियों को इतना डैमेज कर चुका होता है कि पैर किसी भी जूते में फिट होने लायक नहीं रहता। मीडिया कैंसर से जंग की वीरता के तमाम किस्से सिर्फ युवराज सिंह जैसे लोगों के ही दिखाता है किसी और सिंह, यादव, शर्मा, वर्मा और द्विवेदी के नहीं। क्योंकि मसला यहां इमोशन का नहीं TRP के PROPORTION (अनुपात) का है।

एक लड़का सामान्य हालत में दुनिया में जन्म लेता है। तीन साल का होने तक सब कुछ सामान्य सा दिखता है। बच्चे के परिवार में 5 से 6 लोग सीनियर लेवल के डॉक्टर होते हैं और लड़के दोनों मामा भी ऊंचे पद वाले डॉक्टर होते हैं। एक दिन घर के किसी परिजन की निगाह बच्चे के एक पैर की तरफ जाती है। कुछ असमान्य सा दिखता है। बच्चे को अस्पताल में दिखाया जाता है। एक ऑपरेशन होता है। डॉक्टर पैर खोलकर फिर से प्लस्टर बांध देता है। नतीजा शून्य पैर के एड़ियों की दोनों हड्डियां एक तरफ आकर एक मोटा सा ट्यूमर बना देती हैं जो उम्र के साथ बढ़ता जाता है। पैर के निचले हिस्से की दो हड्डियां जिन्हें साइंस में टिबिया-फेबुला (tibia-fibula) कहा जाता है वो भी इसकी चपेट में आ जाती हैं। पैर के मांस और इन दोनों हड्डियों का सामंजस्य इस कदर हो चुका होता है कि मानों पैर को फाइलेरिया मार गया हो। पैर का निचला हिस्सा मुड़ चुका होता है। इस तकलीफ के साथ यह लड़का जिंदगी के 15 बरस गुजारता है।

मगर इस बीच पढ़ाई जारी रहती है। बाकायदा। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद शहर के एक डॉक्टर लड़के के पिता से कहते हैं कि वो उन्हें एक रिस्क लेने दें, वो पैर के निचले हिस्से की सपोर्ट वाली हड्डी को डिवेलप करने की कोशिश करेंगे। महोदय शहर के एक जाने माने डॉक्टर होते हैं। लेकिन लड़के के पिता ऐसा करने से मना कर देते हैं। लड़का स्नातक करने के लिए कॉलेज की दहलीज क्रॉस करता है, पढ़ाई शुरु होती है। एक दिन फिर डॉक्टर कुछ चेकअप के लिए कहते हैं, रिपोर्ट में आता है कि वो ट्यूमर जो पैर के निचले हिस्से में गेंदनुमा रुप ले चुका है वो कैंसर की दूसरी स्टेज में पहुंच चुका है और तेजी से बढ़ रहा है। खतरा अब पहले से कहीं ज्यादा था, लिहाजा अब रिस्क लेने की स्थिति में न तो लड़का था और न ही उसके पिता। लेकिन फिर भी लंदन के एक डॉक्टर के पास रिपोर्ट भेज उनकी राय ली गई। उन्होंने जवाब दिया की पैर काटना ही अंतिम विकल्प है। इसलिए इंडिया में ही पैर को काटने का फैसला किया जाता। पूरे परिवार की सहमति के साथ। ऑपरेशन का दिन आया। वार्डब्वॉय लड़के को स्ट्रेचर पर बिठाकर ऑपरेशन थियेटर में ले गए। वॉर्ड ब्वॉय इस दौरान लड़के को समझाते हैं कि वो पैर न कटवाए, लेकिन लड़का इन दोनों वार्डब्वॉय को डांट देता है। लड़के को एनस्थीसिया दिया जाता है। दोनों हाथ बांध दिए जाते हैं। इसलिए ताकि लड़का कोई हरकत न करे।

शहर का एक जाना माना और वरिष्ठतम डॉक्टर पैर खोलकर कैंसर की स्थिति को भांपता है। कैंसर पहले की तुलना में कुछ और सीमा लांघ चुका होता है। डॉक्टर OT से बाहर जाकर लड़के के पिता को कंडीशन बताते हैं और कहते हैं कि पैर को अब घुटने के नीचे नहीं बल्कि ऊपर से काटना होगा। पिता कहते हैं जो आपको उचित लगे वही कीजिए। लड़के का पैर घुटने के ऊपर से काट दिया जाता है। पैर के कटने के साथ ही कैंसर का खतरा टल गया। आज वही लड़का कानपुर के एलिम्को में लगा एक आर्टिफिशियल पैर पहनकर सामान्य जिंदगी जी रहा है और एक ऐसे पेशे से जुड़ा है जिसमें उस जैसे लोगों को लिए तमाम मुश्किलों की बातें की जाती हैं। लड़का अब अपनी जिंदगी के दूसरे दौर को हंसी खुशी जी रहा है। इस लड़के ने भी कैंसर को 15 साल जिया और उसे जंग में मात दी।

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