बागपत: देश का कानून हत्यारे को सज़ा ए मौत या उम्रकैद देता है और और बलात्कारी को कम से कम 7 साल की सज़ा लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में हत्यारे और बलात्कारी को पंचायतें क्या सज़ा देती हैं। दहेज हत्यारे को 10 जूते मारने की सज़ा और बलात्कारी को पीड़िता के पैर छूने की सज़ा।
दहेज हत्यारे को 10 जूते मारने की सज़ा
बागपत की कोमल दहेज हत्या का शिकार हो गई लेकिन जो क़ानून इसके गुनहगारों को ताउम्र सलाखों के पीछे रख सकता था, उसे पंचायत ने 10 जूते मारने की सज़ा दी और छोड़ दिया। इतना ही नहीं पंचायत ने ये भी फ़रमान दिया कि पीड़ित परिवार पुलिस से दूर रहे।
कानून का मज़ाक उड़ाती पंचायत
पंचायत के फ़रमान के बाद पीड़ित परिवार सदमे में है और इन्हें जान से मारने की भी धमकी मिल रही है। आरोप है कि उन्हें धमकी दी जा रही है कि अगर पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया तो फिर कोमल के भाई और कोमल की सवा साल की मासूम बेटी की भी हत्या कर दी जाएगी। इस धमकी से घबराकर पीड़ित परिवार पुलिस की चौखट से दूर है।
दरअसल 25 जनवरी को कोमल ने मायके जाने की जिद की तो हाथ-पैर बांधकर पिटाई की गई और फिर केरोसिन डालकर जला दिया गया। इलाज के लिए दिल्ली रेफर कर दिया गया, जहां उसकी मौत हो गई। पुलिस का कहना है कि अभी तक उनके पास तहरीर ही नहीं आई है।
बलात्कारी को पीड़िता के पैर छूने का आदेश
अगर बागपत का परिवार पंचायत के फ़रमान से सदमे में है तो बरेली के मीरगंज की पंचायत ने भी कानून से अजीबोगरीब मज़ाक किया है। बलात्कारी को प्रधान ने पीड़िता के पैर छुने के बाद दोषमुक्त करार दिया।
बलात्कार की शिकायत करने महिला थाने गई लेकिन उसकी शिकायत को तवज्जो नहीं मिली। इसी बीच प्रधान ने थाने के बाहर आरोपी को महिला के पैर छूने का आदेश दिया लेकिन इस महिला ने मामले की शिकायत पुलिस के बड़े अधिकारियों से की, तब जाकर इसकी गंभीरता को समझा गया।
ऐसी पंचायतों से भगवान बचाए !
अब ये बागपत हो या फिर बरेली दोनों घटनाएं बताती हैं कि पंचायत में बैठे लोग तुगलकी सोच के शिकार हैं। गुनाह कितना भी संगीन क्यों न हो, गुनहगारों से चाहे जितना भी घिनौना काम किया हो। पंचायतों के लिए उन्हें 10 जूते मारने और पैर छूकर माफ़ कर देना काफ़ी होता है।