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कैसे होता है भारत में राष्ट्रपति चुनाव, किसका है पलड़ा भारी, पढ़िए...

संसद भवन और राज्यों की विधानसभाओं में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान के लिये मतदान केन्द्र बनाये जाते हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर संसद सदस्य किसी राज्य की विधानसभा में या विधानसभा सदस्य दिल्ली स्थित संसद भवन में भी मतदान कर सकते हैं

India TV News Desk
Published : Jun 08, 2017 09:45 am IST, Updated : Jun 08, 2017 08:01 pm IST
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नई दिल्ली: राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का पांच साल का कार्यकाल 24 जुलाई, 2017 को खत्म हो रहा है जिसको लेकर आगामी 20 जुलाई तक इस पद के लिये निर्वाचन प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने बताया कि नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए 14 जून से प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। 17 जुलाई को वोटिंग होगी और 20 जुलाई को मतों की गिनती की जाएगी। ये भी पढ़ें: इस ब्लड ग्रुप के लोग हैं एलियंस, कहीं आप भी तो उनमें से एक नहीं

संसद भवन और राज्यों की विधानसभाओं में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान के लिये मतदान केन्द्र बनाये जाते हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर संसद सदस्य किसी राज्य की विधानसभा में या विधानसभा सदस्य दिल्ली स्थित संसद भवन में भी मतदान कर सकते हैं बशर्ते उन्हें चुनाव आयोग को मतदान की तारीख से कम से कम दस दिन पहले इस बाबत आवेदन करें।

राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल जिसे इलेक्टोरल कॉलेज भी कहा जाता है, करता है। संविधान के अनुच्छेद 54 में इसका वर्णन है। यानी जनता अपने राष्ट्रपति का चुनाव सीधे नहीं करती, बल्कि उसके वोट से चुने गए प्रतिनिधि करते हैं। चूंकि जनता राष्ट्रपति का चयन सीधे नहीं करती है, इसलिए इसे परोक्ष निर्वाचन कहा जाता है।

कौन करता है वोट: सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुने गए सदस्य और लोकसभा तथा राज्यसभा में चुनकर आए सांसद अपने वोट के माध्यम से राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। उल्लेखनीय है कि संवैधानिक ताकत का प्रयोग कर जिन सांसदों को राष्ट्रपति नामित करते हैं वे सांसद राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं डाल सकते हैं।

वहीं राष्ट्रपति चुनाव में भारत के 9 राज्यों के विधान परिषद के सदस्य भी मत का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। इससे यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति का चयन जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही करते हैं। इसलिए राष्ट्रपति परोक्ष रूप से जनता द्वारा ही चयनित होता है।

अगले स्लाइड में कैसे तय होता है मतों का मूल्य......

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