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यूपी चुनाव से पहले Gen Z पर सियासी दांव, राहुल-योगी की अलग-अलग पिच; Coffee Par Kurukshetra में देखें पूरी चर्चा

 Written By: Saurav Sharma
 Published : Aug 14, 2026 09:08 pm IST,  Updated : Aug 14, 2026 09:08 pm IST

‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ कार्यक्रम में यूपी चुनाव को लेकर अहम चर्चा की गई। इस बार के चुनाव पर Gen Z का कितना प्रभाव होगा और इसके लिए अलग-अलग पार्टियां किस तरह की तैयारी कर रही हैं। इन सभी विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

इंडिया टीवी के कार्यक्रम ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र’ में एंकर सौरव शर्मा ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर के साथ राहुल गांधी और योगी आदित्यनाथ की हालिया राजनीतिक बयानबाजी पर चर्चा की। बातचीत का केंद्र यह रहा कि क्या राहुल गांधी युवाओं और खासकर Gen Z को साधने की कोशिश कर रहे हैं और क्या योगी आदित्यनाथ अपनी पारंपरिक हिंदुत्व वाली पिच पर ही चुनावी रणनीति आगे बढ़ा रहे हैं।

चर्चा में कहा गया कि राहुल गांधी के हालिया भाषण में बदले हावभाव, भाषा और अंदाज को महज अचानक हुई घटना नहीं माना जा सकता। उनके भाषणों में लंबे समय से सरकार पर हमले, ‘बैलून फटने’ और ‘चौकीदार चोर’ जैसे नैरेटिव दिखाई देते रहे हैं। हालांकि, सवाल यह भी उठाया गया कि युवा वर्ग को साधने की कोशिश में कहीं विपक्ष व्यापक मतदाता वर्ग से दूरी तो नहीं बना रहा।

Gen Z का चुनाव पर कितना असर?

Gen Z यानी लगभग 18 से 29 साल के मतदाता देश की आबादी में करीब 25 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। लेकिन चर्चा में यह भी बताया गया कि केवल इस वर्ग की नाराजगी चुनावी नतीजे बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि बाकी 75 प्रतिशत मतदाता भी निर्णायक हैं। युवाओं की खासियत यह है कि वे अपनी राजनीतिक पसंद बदल सकते हैं और अपने माता-पिता व परिवार के दूसरे सदस्यों को भी प्रभावित कर सकते हैं।

तमिलनाडु चुनाव में Gen Z इफैक्ट

तमिलनाडु के हालिया चुनाव को इस बदलाव की संभावित केस स्टडी बताया गया, जहां Instagram ने चुनावी नैरेटिव पर बड़ा असर डाला और युवाओं ने अपने परिवार के बड़े सदस्यों को भी प्रभावित किया। इसी संदर्भ में जंतर-मंतर के युवा प्रदर्शन, Instagram और सोशल मीडिया पर बने नैरेटिव को गंभीरता से लेने की बात कही गई। यह भी कहा गया कि संघ परिवार और सरकार की तरफ से युवाओं को संबोधित करने की कोशिशें दिख रही हैं।

'बटोगे तो कटोगे' की पिच पर खेलेंगे सीएम योगी

दूसरी तरफ, योगी आदित्यनाथ की ‘बटोगे तो कटोगे’ वाली पिच को उनकी पुरानी और आजमाई हुई रणनीति बताया गया। चर्चा के मुताबिक 2017 और 2022 में इसी तरह के ध्रुवीकरण से उन्हें राजनीतिक फायदा मिला, इसलिए अपनी स्थापित पिच छोड़ना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है। कांवड़ यात्रा में युवाओं की बड़ी भागीदारी का उदाहरण देते हुए कहा गया कि युवा केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय शहरी वर्ग तक सीमित नहीं हैं।

चर्चा में यह भी सामने आया कि युवाओं को केवल एकसमान वोट बैंक मानना सही नहीं होगा। जाति, धर्म, ग्रामीण-शहरी पृष्ठभूमि, शिक्षा और आर्थिक स्थिति उनकी राजनीतिक पसंद को प्रभावित करते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी के वोट प्रतिशत, 2019 के मुकाबले गिरावट और 2022 के विधानसभा चुनाव से तुलना को लेकर भी अलग-अलग नजरिए सामने आए। यह माना गया कि किसी भी वोट ब्लॉक को एक जैसा मानना गलत होगा।

रोजगार और बेरोजगारी को युवाओं का बड़ा मुद्दा बताया गया, लेकिन सवाल उठाया गया कि राहुल गांधी की हालिया बयानबाजी में रोजगार का स्पष्ट मॉडल या समाधान उतनी मजबूती से सामने नहीं आया। सरकार की जिम्मेदारी भी बताई गई कि वह रोजगार, अर्थव्यवस्था और उपलब्धियों से जुड़े तथ्यों को प्रभावी ढंग से युवाओं तक पहुंचाए।

यूपी चुनाव में क्या होंगे मुद्दे?

यूपी चुनाव को लेकर चर्चा में विधायक स्तर की नाराजगी और नौकरशाही में भ्रष्टाचार को संभावित एंटी-इनकंबेंसी मुद्दा बताया गया। विपक्ष के सामने जातीय समीकरण साधने की चुनौती होगी, जबकि सत्ता पक्ष हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के जरिए चुनावी मुकाबला प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है। राम मंदिर, पेपर लीक, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे भी चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बन सकते हैं।

डिटेल में पूरी चर्चा देखने के लिए सबसे ऊपर दिए गए वीडियो पर क्लिक करें।

(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)

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