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आजम खान के हाथ से छिन सकती है जौहर यूनिवर्सिटी, जल्द हो सकती है कार्रवाई

उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की जमीन सरकार द्वारा अधिग्रहित किये जाने के खिलाफ समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद आजम खान की याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा खारिज किये जाने के बाद अब यह यूनिवर्सिटी कभी भी आजम खान के हाथ से छिन सकती है। 

Bhasha Bhasha
Published on: September 08, 2021 19:54 IST
आजम खान के हाथ से छिन सकती है जौहर यूनिवर्सिटी, जल्द हो सकती है कार्रवाई- India TV Hindi
Image Source : ANI आजम खान के हाथ से छिन सकती है जौहर यूनिवर्सिटी, जल्द हो सकती है कार्रवाई

रामपुर (उत्तर प्रदेश): उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की जमीन सरकार द्वारा अधिग्रहित किये जाने के खिलाफ समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद आजम खान की याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा खारिज किये जाने के बाद अब यह यूनिवर्सिटी कभी भी आजम खान के हाथ से छिन सकती है। जिलाधिकारी रवींद्र कुमार मांदड़ ने बुधवार को बताया कि अदालत के पिछले सोमवार के निर्णय का अध्ययन किया जा रहा है, उसी के अनुसार इस मामले में कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) की अदालत ने गत 16 जनवरी को जौहर ट्रस्ट की 70.005 हेक्टेयर जमीन, उसे देने के लिए लगाई गई शर्तें पूरी नहीं करने पर सरकार में निहित करने का आदेश दिया था। 

उन्होंने बताया कि उसके बाद ही जौहर विवि की जमीन को सरकार में निहित कर लिया गया था और अब उच्च न्यायालय के निर्णय का अध्ययन किया जा रहा है। मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट को वर्ष 2005 में कुछ शर्तों पर इस विश्वविद्यालय का निर्माण करने के लिए जमीन दी गई थी और इन शर्तों का पालन नहीं करने के लिए राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू की है। आजम खान ने इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। रामपुर से सपा सांसद मोहम्मद आजम खान इस ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं, जबकि उनकी पत्नी डॉक्टर तजीन फातिमा ट्रस्ट की सचिव और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान इस ट्रस्ट के सक्रिय सदस्य हैं। 

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद विश्वविद्यालय को अपने स्वामित्व में लेने की कानूनी अड़चनें भी दूर हो गई हैं। ऐसे में आजम खान के हाथ से कभी भी जौहर विश्वविद्यालय छिन सकता है। खान, जौहर विश्वविद्यालय के आजीवन कुलाधिपति हैं। जिला प्रशासन के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, भाजपा नेता आकाश सक्सेना ने जौहर विवि की जमीन को लेकर शिकायतें की थीं। सूत्रों के अनुसार, जांच की गयी तो पता चला कि जौहर ट्रस्ट के नाम पर 2005 से लेकर अब तक 75.0563 हेक्टेयर जमीन खरीदी गई थी। 

सूत्रों के अनुसार, मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार की कैबिनेट के फैसले में जौहर ट्रस्ट द्वारा खरीदने वाली जमीन पर शुल्क से छूट दी थी। सूत्रों के अनुसार ट्रस्ट के नाम पर जो 70.005 हेक्टेयर जमीन खरीदी गई उसके लिए स्टांप शुल्क का भुगतान नहीं किया। सूत्रों के अनुसार कैबिनेट से जो प्रस्ताव पारित हुआ था उसमें शर्तें थीं कि ट्रस्ट की ओर से लोकहित से जुड़े कार्य कराने होंगे और अल्पसंख्यकों और गरीबों को नि:शुल्क शिक्षा देनी होगी लेकिन ऐसा नहीं किया गया। 

शर्तों के उल्लंघन के आरोप में अपर जिलाधिकारी (एडीएम) की अदालत में वाद दायर किया गया था जिस पर 16 जनवरी को जौहर ट्रस्ट की 70.005 हेक्टेयर जमीन सरकार में निहित करने का आदेश दिया गया था। गौरतलब है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की जमीन अधिग्रहित करने की कार्यवाही के खिलाफ दायर याचिका सोमवार को खारिज कर दी। 

न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने उस जमीन पर निर्माण के संबंध में एसडीएम द्वारा 16 मार्च, 2020 को सौंपी रिपोर्ट और जमीन राज्य सरकार को देने के लिए एडीएम (प्रशासन) द्वारा 16 जनवरी, 2021 को पारित आदेश रद्द करने के अनुरोध वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि संबंधित एसडीएम की रिपोर्ट के मुताबिक, उस जमीन पर एक मस्जिद का निर्माण कराया गया, जबकि जमीन केवल शैक्षणिक उद्देश्य के लिए थी। इस तरह से, यह राज्य सरकार द्वारा दी गई अनुमति का उल्लंघन है। 

अदालत ने कहा, “एडीएम रामपुर के आदेश में किसी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। यह एक ऐसा मामला है जहां 2005 में लाए गए एक कानून के तहत एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर जमीन खरीद की गई और साथ ही भूमिधरी और ग्राम सभा की जमीन पर एक पूर्व कैबिनेट मंत्री द्वारा अतिक्रमण किया गया। अतः संहिता की धारा 104/105 के तहत कार्यवाही के लिए पारित उक्त आदेश सही है और 12.50 एकड़ जमीन को छोड़कर बाकी जमीन राज्य सरकार में निहित है।" 

वर्ष 2005 में राज्य सरकार ने मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया था जिससे इस विश्वविद्यालय के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ था। इसके बाद, राज्य सरकार ने ट्रस्ट को 12.5 एकड़ की सीमा से परे जाकर 400 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने की अनुमति दी थी और साथ ही कुछ शर्तें लगाई थीं जिनमें एक शर्त यह थी कि उस जमीन का उपयोग केवल शैक्षणिक उद्देश्य के लिए किया जाएगा। कानून के मुताबिक, यदि शर्त का उल्लंघन किया जाता है तो राज्य सरकार द्वारा दी गई अनुमति वापस ले ली जाएगी।

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