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बालाघाट जिले में अचानक फैली बीमारी को काबू में करने के लिए एक्शन में एमपी सरकार, 57 मेडिकल टीमें भेजकर कराई 43 हजार से ज्यादा लोगों की जांच

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Sep 30, 2026 08:27 pm IST,  Updated : Sep 30, 2026 08:27 pm IST

बालाघाट में अचानक फैली बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार एक्शन में है और अलग-अलग स्तर पर प्रयास कर रही है। 57 मेडिकल टीमों ने यहां 43 हजार से ज्यादा लोगों की जांच की है।

Balaghat Disease Outbreak- India TV Hindi
बालाघाट के दुर्गम स्थानों पर मेडिकल टीमें पहुंचीं। Image Source : REPORTERS INPUT

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में अचानक फैली बीमारी को लेकर एमपी सरकार एक्शन में है। मध्य प्रदेश सरकार ने इसको लेकर तत्काल एक्शन लिया है। एमपी सरकार प्रशासन ने जिले में तत्काल डिस्ट्रिक्ट रैपिड रिस्पॉन्स टीम (DRRT) को सक्रिय किया। बीमारी को देखते हुए तत्काल बाल रोग विशेषज्ञों, महामारी वैज्ञानिकों और कीट वैज्ञानिकों की विशेष टीम मौके पर भेजी गई। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर भी विशेष टीम ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी इस बात का संज्ञान लिया और अधिकारियों को जरूरी दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि सरकार जनता को लेकर संवेदनशील है। वह गंभीरता से इस विषय पर काम कर रही है।

मेडिकल टीमों ने की 43 हजार 451 लोगों की जांच

विशेषज्ञों के 57 स्वास्थ्य दलों ने 50 गांवों में जाकर 43 हजार 451 लोगों की जांच की। इनमें से 6,537 का घर पर ही इलाज किया गया। जबकि, गंभीर रूप से बीमार 647 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। बिरसा विकासखंड के 35 हजार 827 बच्चों को खसरा-रूबेला का टीका लगाया गया। दस्त से बचाव के लिए 1 लाख 63 हजार 902 परिवारों को ओआरएस और जिंक के पैकेट बांटे गए। इसके अलावा मलेरिया की रोकथाम के लिए 8 हजार 610 घरों में कीटनाशक छिड़काव और फॉगिंग की गई। 26 हजार 865 लोगों की मलेरिया जांच की गई। उनमें से 980 लोग संक्रमित पाए गए। उनका तत्काल इलाज कराया गया। प्रभावित क्षेत्रों में 3 हजार 600 मच्छरदानियां भी बांटी गईं।

बालाघाट में मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर भी मजबूत कर रही सरकार

बीमारी के संकट के बीच बड़े पैमाने पर वित्तीय और ढांचागत सुधार किए गए। गंभीर रूप से बीमार गर्भवती महिलाओं और बच्चों के सुरक्षित परिवहन के लिए बैहर, बिरसा और कटंगी विकासखंडों के लिए 3.60 लाख रुपये आवंटित किए गए। टीकों के सुरक्षित परिवहन के लिए अतिरिक्त 3.40 लाख रुपये दिए गए। जिले के 22 उप-स्वास्थ्य केंद्रों की मरम्मत के लिए 1.93 करोड़ और जरूरी उपकरणों की खरीद के लिए 24 लाख रुपये स्वीकृत किए गए। घुम्मुर उप-स्वास्थ्य केंद्र को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) में बदलने के लिए 66 लाख का प्रस्ताव मंत्रिमंडल को भेजा गया। स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए जिले में 54 नए डॉक्टरों की पदस्थापना की गई। इसके अतिरिक्त, मलेरिया नियंत्रण के लिए 1 सलाहकार और 4 तकनीकी सुपरवाइजर तैनात किए गए। महिला बाल विकास विभाग द्वारा 4 नए सीडीओपी नियुक्त किए गए और आंगनवाड़ियों में खाली पड़े 52 कार्यकर्ताओं व सहायिकाओं के पदों को भरा गया।

बीते 23 साल में संस्थागत प्रसव और टीकाकरण के मामले में आया सुधार

बालाघाट में राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर की टीमों का आपसी समन्वय और त्वरित कार्रवाई के कारण हजारों लोगों की जानें बच गईं। टीमों ने केवल बीमारी का इलाज नहीं किया, बल्कि उसके पीछे छिपे कारणों, दूषित पेयजल, अंधविश्वास, झोलाछाप डॉक्टरों की परेशानी को भी दूर किया। डॉक्टरों की पदस्थापना, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की नियुक्ति और उप-स्वास्थ्य केंद्रों का सुदृढ़ीकरण ग्रामीण स्वास्थ्य की रीढ़ हैं। यह व्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है। पिछले 23 वर्षों में बालाघाट जिले ने संस्थागत प्रसव और टीकाकरण में सुधार लाकर मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को ऐतिहासिक रूप से कम करने में सफलता पाई है।

बालाघाट के गांवों में अचानक सामने आए थे बुखार के मामले

गौरतलब है कि इस साल जुलाई के दूसरे सप्ताह में बालाघाट जिले के बिरसा विकासखंड के बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, डंडेकसा और सोनगुड्डा उप-स्वास्थ्य केंद्र क्षेत्र के आसपास के गांवों में बच्चों में अचानक बुखार और दाने होने की शिकायतें मिलीं। इसकी जानकारी लगते ही मेडिकल टीमों ने तत्काल वहां जाने की तैयारी की। टीमें दुर्गम स्थानों में भारी बारिश के बावजूद वहां पहुंचीं, जाना पहुंचना आसान नहीं था। यहां पहुंचकर टीमों ने बच्चों का इलाज शुरू किया।

92 फीसदी तक बढ़ गया संस्थागत प्रसव का आंकड़ा

यदि हम पिछले दो दशकों पर नजर डालें, तो बालाघाट जिले ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है। वर्ष 2003 और वर्ष 2026 के आंकड़ों की तुलना इस बात की गवाह है। संस्थागत प्रसव, जहां वर्ष 2003 में यह केवल 21.50 प्रतिशत था, वहीं वर्ष 2026 में बढ़कर 92.10 फीसदी हो गया। सुरक्षित प्रसव की बात करें तो यह आंकड़ा 2003 के 41.50 फीसदी से बढ़कर 2026 में 94.10 प्रतिशत हो चुका है। पूर्ण टीकाकरण के मामले में बच्चों का पूर्ण टीकाकरण 47.50 प्रतिशत से बढ़कर 92.70 फीसदी तक पहुंच गया है।

शिशु और मातृ स्वास्थ्य में भी हुआ सुधार

वहीं, मातृ मृत्यु के मामले में वर्ष 2003 में मातृ मृत्यु के लगभग 176 मामले थे, जो 2026 में घटकर 60 रह गए। इससे हर साल 116 महिलाओं की जान बचाई जा रही है। बीते 23 साल में लगभग 2 हजार 650 माताओं की जान बचाई गई। शिशु मृत्यु के केस में साल 2003 में शिशु मृत्यु के मामले करीब 3 हजार 805 थे, जो घटकर 1560 हो गए। इससे हर साल 2 हजार 245 शिशुओं को नया जीवन मिल रहा है। विगत 23 वर्षों में लगभग 51 हजार 600 शिशुओं की जान बचाई गई।

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