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Narasimha Dwadashi Vrat Katha: नरसिंह द्वादशी पर जरूर पढ़ें भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की ये कथा, व्रत का मिलेगा पूरा फल

Written By: Arti Azad @Azadkeekalamse Published : Feb 27, 2026 04:26 pm IST, Updated : Feb 27, 2026 04:27 pm IST

Narasimha Dwadashi Vrat Katha in Hindi: नरसिंह द्वादशी पर व्रत और विष्णु जी की विधि-विधान से पूजा करना बहुत फलदायी माना जाता है। इस व्रत को करने वाले को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। नरसिंह द्वादशी की पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। यहां पढ़िए कथा।

Narsimha Dwadashi Vrat katha- India TV Hindi
Image Source : PINTEREST नरसिंह द्वादशी व्रत कथा का जरूर करें पाठ

Narasimha Dwadashi Vrat Katha in Hindi: नरसिंह द्वादशी का पावन व्रत भगवान नरसिंह को समर्पित है, जो भगवान विष्णु के उग्र और दिव्य अवतार माने जाते हैं। नरसिंह द्वादशी का हर साल फाल्गुन माह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है, पापों का नाश होता है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन व्रत कथा का पाठ विशेष फलदायी माना गया है। यहां पढ़िए नरसिंह द्वादशी व्रत की संपूर्ण कथा। 

पौराणिक कथा (Narasimha Dwadashi Vrat Katha)

प्राचीन समय में महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप (हिरण्यकशिपु) थे। हालांकि, वे ऋषि पुत्र थे, लेकिन उनकी प्रवृत्ति अत्यंत क्रूर और असुरों जैसी हो गई थी। दोनों भाइयों ने अपने अत्याचारों से पृथ्वी और स्वर्ग लोक में भय का वातावरण बना दिया।

जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को पाताल लोक में ले जाकर संकट में डाल दिया, तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण कर उसका वध किया और पृथ्वी की रक्षा की। अपने भाई की मृत्यु से हिरण्यकश्यप क्रोधित और शोकाकुल हो उठा। उसने उसी क्षण से भगवान विष्णु को अपना सबसे बड़ा शत्रु मान लिया।

हिरण्यकश्यप का अहंकार

प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया कि वह न किसी मनुष्य से मरेगा, न किसी पशु से, न तो दिन में मरेगा और न ही रात में, न घर के भीतर उसकी मृत्यु होगी और न ही बाहर, न किसी अस्त्र से मर सकेगा न ही शस्त्र से।

इस वरदान के प्रभाव से वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया। उसने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। शक्ति के मद में चूर होकर वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा और प्रजा को भी अपनी पूजा करने का आदेश देने लगा।

भक्त प्रह्लाद

कुछ समय बाद उसकी पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। जब हिरण्यकश्यप को यह ज्ञात हुआ कि उसका पुत्र उसके स्थान पर विष्णु की भक्ति करता है, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ।

उसने प्रह्लाद को समझाने, डराने और अनेक यातनाएं देने का प्रयास किया, किंतु बालक प्रह्लाद का विश्वास अटल रहा। अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रह्लाद को अग्नि में जलाने की योजना बनाई। होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका अग्नि में भस्म हो गई।

स्तंभ से प्रकट हुए भगवान नरसिंह

जब सभी उपाय विफल हो गए, तब हिरण्यकश्यप ने सभा में प्रह्लाद को एक स्तंभ से बांध दिया और उपहास करते हुए कहा, "यदि तुम्हारा भगवान सर्वत्र है, तो क्या वह इस स्तंभ में भी है?"

प्रह्लाद ने निडर होकर उत्तर दिया, "हां, भगवान कण-कण में विद्यमान हैं।"

क्रोध में आकर हिरण्यकश्यप ने गदा से स्तंभ पर प्रहार किया। तभी उस स्तंभ से आधा-मनुष्य और आधा-सिंह रूप में भगवान नरसिंह प्रकट हुए। संध्या समय (जो न दिन था न रात), राजमहल की देहरी पर (जो न भीतर थी न बाहर), उन्होंने हिरण्यकश्यप को अपनी जांघों पर रखकर अपने नाखूनों से उसका पेट चीरकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान की प्रत्येक शर्त पूर्ण हुई और धर्म की विजय हुई।

नरसिंह द्वादशी व्रत कथा का महत्व

इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति और अटूट विश्वास से भगवान स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। नरसिंह द्वादशी के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा और कथा-पाठ करने से भय, बाधाएं और पाप दूर होते हैं तथा जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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