गीता के श्लोक आत्मा और परमात्मा का रहस्य समझाते हैं। इन श्लोकों में जीवन जीने का सही तरीका बताया गया है। भगवान कृष्ण के ये उपदेश मन को शांति तो देते ही हैं साथ ही मार्गदर्शन करने का भी काम करते हैं। गीता बताती है कि हमें कर्म करते रहना चाहिए बिना किसी फल की इच्छा के। आज के समय में देखा जाता है कि बच्चे कर्म पर कम उसके परिणाम पर ज्यादा ध्यान देते हैं जिस कारण से उन्हें असफलता का सामना करना पड़ता है। ऐसे में गीता के ये श्लोक उनके जीवन को बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
श्लोक का अर्थ– इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि क्रोध से भ्रम (मोह) उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति (याददाश्त) का नाश होता है, स्मृति के नष्ट होने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, और जब बुद्धि नष्ट हो जाती है, तो मनुष्य पूरी तरह से विनाश की ओर चला जाता है।
श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
श्लोक का अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जो श्रद्धावान (आस्थावान) होता है, जो ज्ञान प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है, और जिसने अपनी इंद्रियों को संयम में रखा है, उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त कर लेता है।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥
श्लोक का अर्थ- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो भी भक्त प्रेम और श्रद्धा से मुझे पत्र (पत्ता), पुष्प (फूल), फल या जल अर्पित करता है, मैं उसे भक्तिपूर्वक अर्पित किए गए उस पवित्र उपहार को स्वीकार करता हूँ।
बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥
श्लोक का अर्थ- जिसने मन पर विजय प्राप्त कर ली है, उसके लिए मन सबसे अच्छा मित्र है; लेकिन जो ऐसा करने में असफल रहा, उसका मन ही सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)