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Hartalika Teej Vrat Katha: हरतालिका तीज की संपूर्ण व्रत कथा, जानें माता पार्वती और भगवान शिव के पुनर्मिलन की कहानी

 Written By: Laveena Sharma
 Published : Sep 14, 2026 06:46 am IST,  Updated : Sep 14, 2026 11:37 am IST

हरतालिका तीज का पावन पर्व इस साल 14 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और शुभ मुहूर्त में शिव-पार्वती की विधि विधान पूजा करती हैं। साथ ही हरतालिका तीज की पावन कथा भी जरूर पढ़ती हैं।

hartalika teej katha- India TV Hindi
हरतालिका तीज की कथा Image Source : INDIA TV

हरतालिका तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास होता है। कहते हैं इस व्रत को रखने से पति को लंबी आयु के साथ-साथ सुखी जीवन की भी प्राप्ति होती है। यह व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस व्रत में शिव-पार्वती की मिट्टी से निर्मित मूर्तियों की पूजा होती है। इस पूजा के लिए सुबह और शाम का समय शुभ माना जाता है। बता दें हरतालिका तीज की पूजा के लिए सुबह का शुभ मुहूर्त 06:05 AM से 07:06 AM तक रहेगा। वहीं पूजा के लिए प्रदोष काल का मुहूर्त शाम 5:54 बजे से रात 8:22 बजे तक रहेगा। इस मुहूर्त में विधिवत् पूजा करें और साथ ही हरतालिका तीज की कथा भी जरूर सुनें।

हरतालिका तीज व्रत कथा (Hartalika Teej 2026 Vrat Katha)

मान्यताओं अनुसार एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म की याद दिलाने के लिए इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी। उस कथा के अनुसार, पर्वतराज हिमालय के घर में एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम उमा रखा गया। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण वह पार्वती कहलाई। कहते हैं बचपन से ही माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने का संकल्प ले लिया था। अपनी इसी मनोकामना की पूर्ति हेतु उन्होंने बाल्यकाल से ही भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी थी। भगवान शिव को पाने के लिए माता पार्वती ने कई वर्षों तक कठिन तपस्या भी की।

देवी पार्वती की इस कठोर तपस्या को देख उनके पिता काफी चिंतित हो गए थे और इसके साथ ही उनके मन में अपनी पुत्री के विवाह का भी ख्याल आया। पर्वतराज हिमालय ये नहीं जानते थे कि देवी पार्वती ने पहले ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया है। एक दिन पर्वत राज के पास देवर्षि नारद पहुंचे और उन्होंने नारद जी का खूब आदर सत्कार किया। इसके बाद पर्वत राज ने देवर्षि नारद को बताया कि उन्हें अपनी पुत्री के विवाह की चिंता सता रही है। यह सुन नारद जी बोले, कि यदि आपको मेरी सम्मति स्वीकार हो तो आपकी पुत्री के लिए भगवान विष्णु योग्य वर हैं। 

इस पर पर्वज राज खुशी से बोले कि यदि भगवान विष्णु मेरी कन्या को स्वीकार कर लेंगे तो यह मेरा सौभाग्य होगा। इसके बाद नारद जी बैकुंठ धाम चले गए और पर्वत राज ने पार्वती जी को यह समाचार दे दिया कि उनका विवाह भगवान विष्णु जी के साथ निश्चित हो गया है। पार्वती माता को जब ये बात पता चली तो वे अत्यंत निराश और दुखी हो गईं, क्योंकि उन्होंने तो मन ही मन में भगवान भोलेनाथ को अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार कर लिया था। माता पार्वती ने यह बात अपनी सहेली को बताई। जिसके बाद उनकी सखी उन्हें एक घने जंगल में ले गईं। वहां एक गुफा भी थी।

माता पार्वती ने उस गुफा में रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और वह घोर तपस्या में लीन हो गईं। जिस दिन माता पार्वती ने शिवलिंग की स्थापना की उस दिन भाद्रपद शुक्ल तृतीया थी और साथ ही उन्होंने उस दिन निर्जला व्रत भी रखा। आखिरकार भगवान शिव माता पार्वती की सच्ची निष्ठा और तप से प्रसन्न हुए और उन्होंने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद माता पार्वती ने व्रत का पारण किया। 

वहीं दूसरी तरफ माता पार्वती के पिता पर्वत राज अपनी पुत्री को ढूंढते-ढूंढते गुफा तक आ पहुंचे। माता पार्वती ने अपने पिता को घर छोड़ने के पीछे का कारण बताया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भगवान शिव ने उनका वरण कर लिया है। इसके बाद पर्वत राज ने भगवान विष्णु से माफी मांगी और फिर उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह भगवान शिव से करवाने का निर्णय लिया। अंततः भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। 

इस पौराणिक कथा के कारण ही, इस दिन को हरतालिका के रूप में जाना जाता है क्योंकि देवी पार्वती की सखी उन्हें घने वन में ले गयी थी, जिसे हिमालयराज ने अपनी पुत्री का अपहरण समझ लिया था। हरतालिका शब्द 'हरत' एवं 'आलिका' से मिलकर बना है जिसका अर्थ है अपहरण और 'महिला मित्र'।

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